शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

मौसीजी

                 
गर्मी बेतहाशा थी। राजस्थान बाॅर्डर से सटे रेगिस्तानी कस्बे में लू उठने लगी थी। लड़कियाँ दुपट्टे से मुँह ढाँके, लड़के फाइल सर पर चढाए काॅलेज निकलते। कोई रास्ता नहीं था, एसी वगैरह आम लोगों की पहुँच से बाहर थे, कोई ज्यादा ही रईस होता तो कूलर लगवा लेता।

हम लोगों के लिये एक सीनियर का रूम था जो थोड़ा पेड़वेड़ से ढंका था तो उतना नहीं गरमाता। सब लड़के मुँह उठाए वहीं धमक जाते। आड़े तिरछे उल्टे सीधे जैसेतैसे सब कोई हिस्सा कब्जाके मुँह खोलकर सोते रहते। सीनियर बड़े दिलवाला था, शुरू में जितनी रैगिंग लेता, बाद में उतना ही दुलार भी देता। सब कुछ ठीक था, बस इस रेगिस्तानी गर्मी को छोड़कर।

मैं थोड़ी मोटी खाल का था, काॅलेज के बाद अपने रूम में रहता। गर्मी एक सच था जिससे मैं भागकर किसी मिथ्या की शरण नहीं लेना चाहता था। पुराने से कैसेट प्लेयर में लकी अली की ‘सिफर’ डालता, और हर मुश्किल, हर पसीने की बूंद को भूलकर एकाध घंटे के लिये जिन्दगी से ब्रेक ले लेता। जहाँ गीत ले जाते, चल पड़ता।

पर पूरे हफ्ते की दौड़भाग के बाद वीकेंड जैसे एक बोझिल फिल्म की तरह आता। मेरे आसपास वाले सब अपनेअपने घरों के लिये बस पकड़ने निकल जाते, घरों में मम्मियों का लाड़ और फ्रिज का ठंडा पानी उनका इंतजार जो कर रही होती। पर मैं कहाँ जा सकता था, मेरा तो घर इतना दूर था कि आनेजाने में ही तीन दिन लगते। शुरुआत के दोचार हफ्ते वहीं रहा, पर फिर एक दिन मम्मी से टेलीफोन बूथ पर बात करते हुए मौसीजी का जिक्र आया।
और अगला फोन मैंने उन्हें ही कर डाला, बताने के लिये कि कल सवेरे पहुँच रहा हूँ।

*
मौसीजी मेरे काॅलेज के पास वाले शहर में थीं, ये बात मैं जानता था। जब पहले दिन पापा छोड़ने आए, तो उनसे मिलने गये भी थे। उन्होंने कहा भी था कि बेटा आते रहना जब भी छुट्टियाँ पड़ें। पर मैं तो मैं था, अपने अंतर्मुखी स्वभाव के सामने सुखसुविधा की किसी संभावना को बलि चढाने को तत्पर। वर्ना क्या मैं भी नहीं उन सीनियर के ठंडे रूम में जाकर डला रहता!

खैर, अब वीकेंड अझेल हो रहे थे, पापा रिटायर हो चुके थे तो मैं ज्यादा फिजूलखर्च भी नहीं करता था। गन्ने का रस भी सोचसोच कर पीता। ऐसा नहीं कि पिताजी कम पैसे भेजते थे, वो तो जितना माँगूँ उसका दुगुना देते थे, जाने कैसे। इसलिये मैं ही कम मांगता था। कोई भी कड़वा सच,  मुझे जिन्दगी से डगमगा नहीं पाता था। मैं और मेरी सहनशक्ति कभी एक दूसरे से सवालजवाब नहीं करते। मैं जो कहता, वो सर झुकाकर मान लेती। गर्मी सहनी है तो सहनी है। गन्ने का रस नहीं पीना है तो नहीं पीना है।

पर इस बार दबे शब्दों में मेरी सहनशक्ति ने पलटकर कह दिया था, एक बार होके तो आओ। चार साल इस रेगिस्तान में बिताने ही थे, एक बार मिल आने में क्या हर्ज था। कलेजे को नहीं तो ठंडा पानी पीके पेट को ही ठंडक मिले।

अगले दिन सुबह मैं मुँह उठाए उनके घर पहुँच गया। मेरे दिमाग में पूरा प्लान था, इस पहली ट्रिप में मौसीजी का व उनके परिवार का मेरे प्रति रिएक्शन देखना। एक भी नकारात्मक तरंग मेरे रडार में आई तो भावी यात्राएं कैंसिल। मैं स्वभिमानी था, किसी पर बोझ की तरह लदने वाला नहीं। मौसीजी मेरी माँ की चचेरी बहन थी, और बुरी खबर ये थी कि दोनों चाचाओं की आपस में कुछ खास नहीं बनती थी। चाचियों ने अलग ही होड़ लगा रखी थी, किसका बेटा कितनी मोटी तनख्वाह लाया, किसकी बेटी कितने अच्छे घर में ब्याही गई, बस यही सब। स्वाभाविक था कि अगली पीढी यानी मेरी माँ व मौसियों में भी थोड़ीबहुत होड़ लगती। तो अब जब मैं सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज पहुँच चुका था, और उनका बड़ा बेटा दुनियाभर की कोचिंग करके भी एक दूरदराज के प्राइवेट काॅलेज में बाकी के पैसे फुँकवा रहा था, तो मुझे अपना खुले दिल से स्वागत होने के आसार कम लग रहे थे।
खैर, ये सब तो सुनीसुनाई बातें थीं। हकीकत तो अब सामने आनी थी।

*
मौसाजी ऑफिस निकल चुके थे। छोटी बेटी जो अभी ग्यारहवीं कक्षा में गई थी, स्कूल जा चुकी थी। मौसीजी ने दरवाजा खोलते ही पूरी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। नाश्ता दूध फल सब तैयार थे। मैंने नहाधोकर भरपेट नाश्ता किया। बड़े बेटे अजय का रूम खाली था तो मेरा दो दिन का डेरा वहीं जम गया। यूँ तो मैं भी जानता था कि ये सिर्फ गरमियों की बात थी, फिर तो इतना काम होगा कि मुझे फुरसत ही नहीं होगी वीकेंड में कहीं जाने की। खैर, वो सब बाद की बात थे।

नाश्ते के बाद मौसीजी ने खूब गप्पें मारीं। गाँव में कौन क्या कर रहा, सबकी खबर ली। अपने द्वारा जुड़ाए कुछ रिश्तों का बखान किया। किसी किसी बात पर नई पीढी को कोसा। पता नहीं क्यों, मुझे अपनी माँ की याद आ गई। ऐसी ही यो थीं वे, सब कुछ खुले दिल से कह देने वाली। घर आए मेहमान को ठूँसठूँसकर खिलाने वाली। एक पल भी मुझे नहीं लगा कि इन्होंने कभी अपने बेटे की तुलना मुझसे की होगी और कुढी होंगी।

दोपहर खाने के ठीक बाद उनके घर में दस्तक हुई। कोई दूर का रिश्तेदार था, शहर में किसी काम से आया था। मौसीजी ने झट से उन्हें खाना परोस दिया। वो भी आराम से खाने लगे जैसे जानते हों कि उनके लिये तो खाना बना ही होगा। पर जहाँ तक मुझे खबर थी, ये अकस्मात आए मेहमान थे। खैर, मैं आराम करने चला गया।

शाम को उठा तो मौसाजी भी आ चुके थे और छुटकी (उनकी बेटी) भी एक ट्यूशन से लौटके दूसरी को जा रही थी। चाय के साथ गप्पें चलीं, काॅलेज का माहौल, रैगिंग, प्लेसमेंट वगैरह, जो नौर्मल चिंताएं अभिभावकों को होती हैं। बड़े बेटे से मिली निराशा के बाद उन्होंने अपना ध्यान छुटकी पर लगा दिया था, पर मुझे ये भी बता दिया गया था कि इसके पीछे पैसा पानी की तरह नहीं बहा पाएंगे। आखिर इसकी शादी के लिये भी तो जोड़ने हैं। किसी सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज में निकल जाए तो ठीक है वर्ना कुछ और कर लेगी।

डिनर पर मैंने छुटकी से उसकी पढाई का हालचाल पूछा। कुछ अच्छी किताबों के नाम गिनाए। इतने में ही वो मुझसे इतनी प्रभावित हो गई कि अगले दिन कुछ फिजिक्स के डाउट्स लेके आ गई। मैंने भी थोड़ा यहाँ वहाँ के उदाहरण देके कांसेप्ट क्लीयर करवा दिया। आखिर सबसे प्रिय विषय था ये मेरा। फिजिक्स से इन्सान को या तो बहुत प्यार हो सकता है या बहुत नफरत। कोई बीच का रास्ता नहीं।

और शाम को जब मैं निकलने के लिये तैयार हुआ तो इससे पहले कि मैं अगले विजिट के बारे में कोई राय बना पाता, मौसीजी खुद मेरे पास आई। “इसी तरह आते रहना बेटा, छुटकी बहुत तारीफ कर रही थी तुम्हारी। थोड़ा थोड़ा तुमसे पढती रहेगी तो भविष्य बन जाएगा उसका। तेज है वो, बस सही गाइडेंस नहीं दे पा रहे हम उसको। अजय का तो मन नहीं लगता था पढने में, इसका खूब लगता है। इंजीनियर न सही, कुछ तो बन ही जाए।“

अब मुझे कुछ सोचने की जरूरत नहीं थी। अगले दो साल तक मैं बेझिझक कभी भी आ जा सकता था। छुटकी का भविष्य संवारने जैसा नेक काम थोड़ाबहुत मेरे कंधों पर खिसका दिया गया था, जिसकी मुझे खुशी ही थी। किसी के काम आऊँ अच्छा लगता था।

वो गरमियाँ अब उतनी अझेल नहीं रहीं थीं। हफ्तेभर की झुलस को दो दिन की ठंडक मिल जाती तो आगे की झुलस के लिये शरीर-मन तैयार रहता। पढाई भी ठीकठाक चल रही थी, मेरी भी व छुटकी की भी। फिजिक्स अब उसका पसंदीदा विषय था।

और मौसीजी के तो क्या कहने। वही माँ के हाथ वाला स्वाद, वही ‘कमजोर हो गया है एक परांठा और खा’ वाला अपनापन। धीरेधीरे मैं उनके परिवार से घुलमिल सा गया। और फिर उनकी अंदरूनी बातें मेरे कान में पड़ने लगीं।

 उनका घर शहर में था जहाँ हाॅस्पिटल से लेके दुनियाभर की परीक्षाओं का सैंटर पड़ा करते था। करीबी से लेके दूरदराज तक के सब दोस्त-रिश्तेदार मुँह उठाए चले आते थे। और मौसीजी सबकी यथासंभव सहायता करती, कभीकभी खुद के बजट में कटौती करके। मौसाजी व बच्चों को ये बात पसंद नहीं थी। उन्हें तो ये भी लगता था कि बड़े बेटे अजय के औसत रिजल्ट के पीछे इस मेहमाननवाजी का भी हाथ था। और पैसे भी नहीं बच पा रहे थे। खाने खिलाने में ही सब खप जाता था। कभी कभी तो छुटकी भी आवाज उठाने लगती थी। उसकी चिंता भी जायज थी, आगे की पढाई दाँव पर थी।

पर जाने क्यों, मौसीजी खुद को बदल नहीं पातीं। आना जाना, खाना-खिलाना लगा रहता। यह स्वभाव उनके खून में था,, भूखे को प्रेम से खिलाना। अक्सर मैं सोचता था कि दिन के किसी भी पहर कोई आ जाय, भूखा नहीं जाता था। पता नहीं कहाँ से खाना निकल आता। और सच तो ये था कि मैं नहीं चाहता था कि ये बदले। हम जैसों का भी यही तो सहारा था। घर से दूर, जीवन में संघर्षरत किसी को दो पल ठंडी छाँव मिलती तो उसका मनोबल ही बढता।

खैर, मैं कौन होता था अपनी राय देने वाला? आता, छुटकी को पढाता, खापीकर निकल लेता। दो साल गुजर गये। मुझे अब उतना वक्त नहीं मिल पाता। पर गर्मियों के वे अझेल वीकेंड तो वहीं कटते।

और फिर छुटकी का समय आया। बहुत अच्छे नंबरों से बोर्ड की परीक्षा में पास हुई थी, पर दुर्भाग्य से प्रतियोगी परीक्षा में इतनी अच्छी रैंक न आ पाई कि किसी सरकारी या कम खर्च वाले काॅलेज में दाखिला मिल सके। मुझे इसका अंदेशा था, इन परीक्षाओं का स्तर अलग ही होता था, बिना सही कोचिंग के,  सामान्य ट्यूशन्स से इनको पार करना मुश्किल था।
छुटकी उदास थी। मैंने उसे समझाया कि किसी अच्छे काॅलेज से साइंस में ग्रेजुएशन कर ले, फिर रिसर्च के लिये दुनियाभर के मौके मिलेंगे। एक इंजीनियर जिस फाॅरमुले का उपयोग करके काम करता है, वे किसी वैज्ञानिक ने बनाए होते हैं। बनना है तो वैज्ञानिक बनो, नए फाॅरमूले इजाद करो। एक रास्ता बंद हुआ तो दूसरा खुला भी है।

 पता नहीं उसने कितना सुना और कितना गंभीरता से लिया, पर उसके बाद मेरी उससे कभी मुलाकात नहीं हुई। मैं ही नहीं जाता था अब, मौसीजी के घर। क्या करता जाकर? पहले ही मौसीजी अपनी थाली से बचाबचाकर कितनों का पेट भरती थीं, घरवालों के ताने सुनती थीं। अब कमसे कम अपना बोझ तो न डालता।

*
काॅलेज खत्म हुआ। नौकरी मिली। शादी हुई। मौसीजी से संपर्क लगभग टूट गया था। अंतर्मुखी था, ज्यादा रिश्तेदारी निभाना आता नहीं था मुझे। पर एक हसरत थी कि कभी उनके पास जाकर एक अच्छी सी साड़ी उनके चरणों में रख दूँ। दिन महीने साल बीतते जाते पर हसरतें मन में रह जातीं। काफी दूर पोस्टिंग थी मेरी, उनकी तरफ आने की कोई वजह ही नहीं मिल पाती।

पर कल जब काम के सिलसिले में बैंगलौर गया था, पता चला कि छुटकी भी उसी शहर में है। मेरी माँ को सबकी खबर रहती थी, उन्होंने ही बताया था कि वो एक सरकारी रिसर्च इंटिट्यूट में कनिष्ठ वैज्ञानिक बन चुकी है। मेरे चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी। अब तो मुझे उससे मिलना ही था, वर्ना फिर कब मौका मिले। मेरी मीटिंग काफी लेट चली थी, लंचटाइम में भी खिंच गई। तीन बजे छूटा, और छः बजे की लौटने की फ्लाइट थी। सौभाग्य से शनिवार था और उसकी छुट्टी थी। मैंने फोन किया और आधे घंटे में मैं उसके घर पर था।

उसने लंच के लिये पूछा तो मैंने कह दिया कि करके आया हूँ। फिर बहुत सी बातें हुईं, मौसीजी का हाल चाल पता चला। मैं सोच रहा था, क्या अब भी वो अपनी माँ के बारे में वही सोचती होगी जो स्कूल के वक्त सोचा करती थी। फिजूलखर्च करने वाली, मेहमानदारी जमाके पढाई में खलल डलवाने वाली? काश अब ऐसा न हो, आखिर उन जरूरतमंदों की दुआएं भी तो लगी होंगी, जो आज वो इस मुकाम पर है।

और फिर, थोड़ी देर में, वो खाने की थाली ले आई।  जाने कैसे वो जान गई कि मैं भूखा था। मैंने पूछा उसका खाना कहाँ है, तो बोली कि पहले ही खा लिया था।

मैं जानता था, कि वो झूठ बोल रही थी। अपना लंच मुझे खिला रही थी। मैं हँस भी रहा था, रो भी।