रविवार, 14 फ़रवरी 2016

थिंचौणी


बस आधा घंटा और था घर पहुँचने में। पहाड़ की सर्पीली सड़क में जीएमवीएन की बस दौड़ी जा रही थी। सबको घर पहुँचने की जल्दी थी शायद। अंगीठी के पास बैठकर   सर्द हो चुकी शाम से खुद को बचाने की चाह में।  अदरक डली चाय की चुस्कियों की चाह में। गप्पों, कहकहों संग भुनी मूंगफलियां तोड़ने की चाह में। और  घर जितना पास आता जाता था, नीतू की सिहरन बढ़ती जाती थी। वर्षों बाद अपनों से मिलने की सिहरन। जाने कैसा होगा वो घर, किस हाल में होंगी  उसकी माँ।  फ़ोन पर तो उनका बुढ़ापा साल दर साल बढ़ने की आहट देता था, अब बालों का रंग भी गवाही देगा।
 ऐसा क्यों था, क्यों अभिशप्त थे पहाड़ी लोग एक बार बाहर निकले तो फिर बरसों दूर रहने के लिए? क्यों यहाँ  आना जाना इतना आसान नहीं था जितना देश के बाकी हिस्सों में पहुँचना। और अब जब आर्यन चार साल का होने वाला था तो उसने जिद करके पति अजय को मायके चलने के लिए राजी किया था। अजय का घर तो ट्रेन से ओवरनाइट का सफर था, आधिकांश छुट्टियाँ वहीं बीत जाया करती थीं। पर अब पहाड़ नीतू को चीख चीखकर पुकारता था।  अब दूरी सही नहीं जाती थी।  कुछ क़र्ज़ था उस मिट्टी का, उस माँ का जो अब  चुकाना था। कुछ था जो पिछले कुछ सालों से अंदर ही अंदर उसको कचोटता जाता था,  खासकर जब से आर्यन के आने की पहली आहट   हुई थी।

"रुद्रप्रयाग  वाली सवारी आगे आ जाएँ। " बस कंडक्टर ने उन नए लोगों की खातिर ऎलान किया था जो पहली बार पहाड़ आ रहे थे। अजय ने सीट के नीचे से बैग निकाला। आर्यन जो खिड़की से पहाड़ और नदी को निहारने में मग्न था अब पहुँचने  की खबर सुनकर और भी खुश हो गया था। इतनी सुन्दर जगह तो अब तक टीवी में ही देखने को मिलती थी।

"मम्मा यहाँ आपका घर है?"
"हाँ बेटा , यहीं रहती थी आपकी मम्मा बचपन में। "
"कितनी सुन्दर जगह है! हम लोग हमेशा के लिए यहाँ नहीं रह सकते?"

कितना मासूम सवाल था , और इसके जवाब में उसके पास सिर्फ एक शब्द था।  काश।

*

" आज क्या आया है लंच में?" रोज दोपहर दो बजे स्वाति ये रूटीन प्रश्न करती थी और नीतू जैसे नींद से जागती थी। एक ही  कंपनी में जॉब करते थे पर विभाग अलग थे और थोड़े दूर भी।  लंच के बाद अक्सर चाय का प्लान बनाके कैंटीन पहुँच जाते थे। दिन भर के बोरिंग कामों का ब्यौरा एक दूसरे को देते थे।
"आज जो आया है वो अझेल है। "
"क्यों बैंगन आ गया लहसुन डला?"
"नहीं लौंकी है उबली वाली। "
"ओह फिर तो समोसे पे मिलते हैं। "
"हाँ यार कुछ तो खाना पड़ेगा ये डब्बा तो जान ले लेगा। " डब्बा सुबह ८  बजे उसकी कुक आके पका जाती थी। उसके पति को भी मिलता था यही खाना दूसरे डब्बे में। पास में ही ऑफिस था पर काम ज्यादा रहता था, मिलना नहीं हो पाता था।
और वो कैंटीन पहुँच चुकी थी, समोसे से अपनी भूख मिटाने के लिए। स्वाति पहले ही पहुँच चुकी थी, आर्डर भी दे दिया था।

"क्या खाने का मन करता है तेरा? मैं खिला दूँगी एक दिन। " स्वाति ने काफी गंभीरता से प्रश्न किया था।  गंभीर होने की बात भी थी। पहले की बात अलग थी, खाया न खाया कोई फर्क नहीं पड़ता था। पर अब बात अलग थी, नीतू प्रेग्नेंट थी। तीसरा महीना चल रहा था।

"कुछ नहीं, रहने दे। "
"बता न! मैं बनाके  खिलाऊँगी तुझे। "
"नहीं खिला पाएगी तू। "
"अरे बता न!   गूगल पर सबकी रेसिपी  मिल जाती है। मास्टर शेफ बन गई हूँ मैं!"
"अच्छा? तो थिंचौणी खिला दे। "
"थिंचौणी? ये क्या है? "
"मैंने कहा था न। रहने दे।  "
" तू रहने दे। मज़ाक सूझ रहा है!"
"नहीं। सच में। थिंचौणी ही खाने का मन कर रहा है। पहाड़ की डिश है, गूगल पे नहीं मिलेगी। "
स्वाति ने लम्बी साँस  ली।  थिंचौणी मज़ाक नहीं, हकीकत थी !
"तो तू रेसिपी बता दे मैं कोशिश करूंगी बनाने की। "
"नहीं यार, माँ के हाथ की। बस माँ के हाथ की। एक बार खा लूँ , तृप्त हो जाऊँगी। "
"और कैसे मिलेगी वो एक बार? न आंटी यहाँ आ सकती है न तू वहाँ जा सकती है !"
"वही तो। " नीतू काफी उदास थी।
"चल अब मुँह मत लटका। ये खुश रहने का वक़्त है। जो यहाँ मिलता हो उसी में खुश रह। देख समोसा भी आ गया !"

दोनों भुक्खड़ों की तरह समोसों पर टूट पड़े।

शाम को मम्मीजी ने बेटे बहू का डब्बा खोला।  अजय का खाली था, और नीतू का बचा हुआ।  कुछ दिनों से यही सिलसिला चल रहा था। नीतू का टेस्ट बदल रहा था। कुक का बनाया कुछ अच्छा नहीं लगता था। एकाध बार मम्मीजी ने खुद सब्जी बनाके भेजी तो डब्बा थोड़बहुत  खाली आया था। पर वो पहले वाली बात नहीं रही थी जब नीतू जो भी मिल जाए चाट पोंछके ख़त्म करती थी। कोई नखरे नहीं हुआ करते थे उसके खाने के मामले में, बिलकुल अजय की तरह।
और अब तो हर दिन ये टेंशन रहता था कि क्या बनवाएं जो डब्बा खाली आये।  आखिर प्रेग्नेंट थी नीतू, उसकी भूख और सेहत का ध्यान तो रखना था।

अगले दिन नीतू सुबह जल्दी उठी। एक तरफ चाय चढ़ाई और एक तरफ आलू  मटर की  सब्जी। माँ के हाथ का नहीं तो कमसे कम अपने हाथ का खाना मिल जाए, पेट तो भरे। मम्मीजी देख रही थीं। उसके ऑफिस निकलने के बाद उन्होंने वो सब्जी चखी, शायद देखने के लिए कि नीतू की पसंद कैसी है।  सब्जी में रस ज्यादा था, और मिर्ची भी। लाल और हरी दोनों डाली हुई थीं! तो ये राज़ था नीतू के टेस्ट का?

उन्हें समझ आ गया था।  सास के साथ वो एक माँ भी थीं। कभी इस दौर से वो भी गुजरी थीं।  पर तब तो पहली डिलीवरी मायके में होती थी, माँ के हाथ का खाना वैसे ही मिल जाता था। और दूसरा बच्चा होने तक बहू ससुराल की नब्ज़ पकड़ लेती थी , अपने घर जैसी सहज हो जाती थी।
यूँ तो अब भी पहली डिलीवरी मायके में ही होती थी, पर बहू का मायका था ही ऐसी जगह पहाड़ों  में, जहाँ आधुनिक सुविधा वाले अस्पताल दूर दूर तक नहीं मिलते थे।  ऐसे में कोई रिस्क कैसे ले सकते थे? इसलिए वही अपने पति को छोड़  शहर  आ गयी थीं बेटे बहू के पास।

आजकल की लडकियाँ यूँ तो शादी के बाद काफी सहज रहती थीं पर नीतू चाहकर भी अपनी बदली हुई पसंद घर पर जाहिर नहीं कर पा रही थी। ऐसा खाना वो लोग खा भी तो नहीं पाते।  अब नीतू ने सोच लिया था , कभी कभार खुद ही जल्दी उठकर सब्जी बना दिया करेगी। बाकी दिन कैंटीन के समोसे या चाउमीन तो है ही।

*

मिसेस रावत पिछले कुछ दिनों से परेशान सी लग रही थीं।  उनकी ये ख़ास बात थी कि मन में जो चल रहा होता था चेहरे पर दिख ही जाता था, कितना भी छिपाने की कोशिश करें। और इस बार भी उनकी बहू ने मन की बात पढ़ ली थी।
" क्या बात है माँजी ? तबियत ठीक है?"
"हाँ बेटा तबियत तो ठीक है। "
'फिर?'
मिसेस रावत कुछ देर सोचीं, फिर बोलीं।
"जब से नीतू की खबर मिली है, थोड़ी चिंता लगी रहती है। '
"चिंता की क्या बात है? उसकी सास तो आ गयी हैं साथ में। पूरा ध्यान रखती होंगी। "
"नहीं बेटा वो बात नहीं। "
"फिर?"
कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कही नहीं जा सकतीं। उन्हें समझना पड़ता है।  और ये काम सिर्फ माँ कर सकती है। "
"पर हमने तो बोला था उसको यहाँ आ जाने के लिए। वही लोग डर रहे हैं।  कभी पहाड़ से पाला नहीं पड़ा है न उनका। "
"हम्म। "
"पर आप परेशान क्यों हो रही हैं? कुछ कहा उसने फ़ोन पे? सास के साथ एडजस्ट करने में कुछ दिक्कत? "
"ना ना एडजस्ट तो मेरी बेटी कहीं भी कर लेती है। उसकी मुझे चिंता नहीं।"
"फिर ?"
"कुछ नहीं बेटा ऐसे ही। " उन्होंने टाल दिया।
पर मन से वो सवाल नहीं जाता था। कुछ दिन पहले नीतू ने फ़ोन पर 'गुड न्यूज़' दी थी। बहुत खुश हुई थीं वो, और पहली बात मुँह से यही निकली थी, घर कब आ रही है? फिर याद आया कि ये तो गलत प्रश्न था।  कोई शहर की सुविधाओं को छोड़कर पहाड़ थोड़ी लौटेगा डिलीवरी करवाने। और नीतू ने भी वही जवाब दिया था, डिलीवरी वहीं होगी। सासूमाँ आ जाएंगी उसका ध्यान रखने के लिए।  अब माँ की ज़रुरत किसको थी।
पर उसके बाद से नीतू का फ़ोन अक्सर आ जाता। और हर बार वो पूछती कि क्या बन रहा है खाने में। बहुत कैज़ुअली पूछती थी , पर माँ का दिल समझ जाता था कि बेटी को माँ के हाथ का खाना खाने का मन है। शुरू शुरू में तो बड़े चाव से बताती थीं कि आज कढ़ी है तो आज राजमा है तो आज थिंचौणी, पर फिर समझ गयीं कि फ़ोन के दूसरी तरफ उनकी बेटी की आँखें भर आई हैं, बात इतनी कैज़ुअल नहीं है।  उनका मन करता कि बस कहीं से पंख मिल जाते और वो उड़ जाती, पहुँच जाती अपनी बेटी के पास, जी भर के खिलाती अपने हाथ का खाना। पर बात फिर वहीं अटक जाती।  काश। 

*

स्वाति का मैसेज था। " समोसा?"
"नहीं, आज सिर्फ चाय !" नीतू ने रिप्लाई किया।  आज पसंद की सब्जी खायी थी पेट भर के।

चाय पर मिली तो काफी खुश लग रही थी नीतू।
" तुझे हँसी आ रही होगी न मुझे देखके? हर वक़्त खाने की ही बातें।  देश दुनिया की कोई परवाह ही नहीं !"नीतू चहकते हुए बोली।
" नहीं यार मैं समझ सकती हूँ। भूखे भजन न होय गोपाला!"
"हाहा !"
"और वैसे भी पहले हम कौन सी देश दुनिया की बातें कर लेते थे? वही कामवालियों की झिकझिक, इसको छुट्टी चाहिए उसको एडवांस ! हम लोग अफोर्ड थोड़ी कर सकते हैं इन सबसे ऊपर उठना। "
" हाहा! ये भी सही है। "
"आज अच्छी लग रही है। रोज टाइम निकालके अपनी सब्जी बना दिया कर। "
"देखती हूँ। मम्मीजी तो खराब तो नहीं लगेगा? कहीं वो कुक की छुट्टी करवाके खुद खाना बनाने न बैठ जाएँ !"
"उनके हाथ का भी तो बहुत टेस्टी होता है।  तूने ही बताया था। "
" हाँ पर इतनी सुबह उठेंगी वो भी ठण्ड में। जोड़ों में दर्द की शिकायत रहती है उनको। "
"ओह्हो। "
"और सच तो ये है कि अभी कोई मास्टरशेफ भी आके खिला दे तो भी याद माँ के हाथ के खाने की ही आएगी।  लार उसी के लिए टपकेगी। "
"हाँ मेरा भी वही हाल था अनीश के टाइम। लकिली मेरी माँ आके रही थीं साथ में। खूब बना बनाके खिलाया। "
"सच में लकी थी यार तू। "
"अरे ये क्या? चाय में मक्खी !"
" समीर!" नीतू ने  आवाज दी तो मैनेजर दौड़ा चला आया।  तुरंत एक आलसी स्टाफ को डाँट  के चाय बदलवाई।
"सॉरी मैडम। आगे से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। " कहकर समीर वापस काउंटर पर चला गया।
नीतू उसे जाते हुए देख रही थी। "पता नहीं इतने कामचोर लड़के रखे क्यों हैं इसने। खुद आधा काम करना पड़ता है। " समीर की कैटरिंग एजेंसी को यहाँ का कॉन्ट्रैक्ट दो महीने पहले ही मिला था। बाकी का स्टाफ ठीक था बस एक लड़का जीता जागता आलस की मूर्ति लगता था। पीक आवर्स में भी उसकी चाल हथिनी सी रहती थी। कभी प्लेट गन्दी मिले या खाने में मक्खी मिले तो सबका शक पहले उसी पर जाता था।

"खैर, तूने बताई नहीं चिंचौणी की रेसिपी ?"
"चिंचौणी नहीं थिंचौणी। "

*

फ़ोन बज रहा था।  नीतू का कॉल था।

"हाँ बेटा। कैसे हो?"
"बढ़िया। "
"अच्छे से खाना खा रही हो न? सही खुराक बहुत ज़रूरी है आजकल। " नीतू की दुखती रग पर हाथ रख दिया था माँ ने।
"हाँ खा तो रही हूँ। और आज क्या बन रहा है आपके किचन में ?"
माँ ने थोड़ा सोचा। बन तो थिंचौणी रही थी। 
"आज वही पुरानी अरहर की दाल। "
"यक्क ! उस दाल से तो मुझे उलटी आने लगती है आजकल। बंद करवा रखी है अपने लिए। "
"हाँ बेटा पर  यहाँ  आजकल  तुम्हारे पापा और भैया भाभी सबका कुछ कुछ  परहेज चल रहा है। ज्यादा मिर्च मसाले को मना कर दिए हैं डॉक्टर। खट्टा भी नहीं खाना तो कढ़ी भी बंद।  थाइरोइड के चक्कर में मूली से परहेज ! अब तो बस पीली दाल बची खाने के लिए !"
"ओह्हो! " पता नहीं क्यों ये सुनकर नीतू को एक सुकून सा मिला।   मतलब वो  कुछ मिस नहीं कर रही थी। मायके जाने से भी वही पीली दाल खाने को मिलती। 
माँ ने झूठ बोल तो दिया पर उस दिन एक निवाला उनके गले से नहीं उतरा।

*

समीर का पूरा दिन यूँ  तो आर्डर लेने या स्टाफ को डाँटने डपटने में निकल जाता था पर कभी कभार वो खुद के लिए वक़्त निकाल लेता था।  मोबाइल में गेम्स वगैरह खेल लेता था, गाने सुन लेता था । नीतू मैडम लोग जब चाय के लिए आते थे तो कैंटीन लगभग खाली रहती थी। बैठे बैठे उन लोगों की गप्पें उसके कानों में पड़ती रहती थीं। और उस दिन जब स्वाति ने नीतू को जोर से डाँटा तो उसके कानों तक आवाज पहुंची थी।

"पूरा डब्बा छोड़ दिया तूने? "
"नहीं खाया जा रहा था यार।  उलटी आ जाती। "
"अरे पर इतनी देर खाली पेट रहना, इस हालत में ! ये ठीक नहीं है नीतू। कुछ तो करना पड़ेगा।  ये कैंटीन के समोसे लंच की जगह नहीं ले सकते। पता नहीं कैसा तेल यूज़ करते होंगे। कितनी पुरानी सब्ज़ियाँ रहती होंगी। ये सब एक लिमिट में ही खाना है , समझी। ये लंच  को रिप्लेस  नहीं कर सकते।"

ऐसी हालत? किस हालत की बात कर रही है स्वाति मैडम ? तो क्या नीतू मैडम प्रेग्नेंट हैं?
एक अजीब सी सिहरन उठी थी समीर के अंदर।  उसके ऊपर एक प्रेग्नेंट महिला की जिम्मेदारी थी। उसे अपने खाने की क्वालिटी को उनके हिसाब से उच्च स्तर का रखना था।  कितना भरोसा करके आती होंगी नीतू मैडम उसकी कैंटीन।  कहीं यहाँ  के खाने से किसी दिन उनकी तबियत न गड़बड़ा जाय।  हे भगवान, ये कैसी जिम्मेदारी उसके कंधे पर डाल दी थी।
उसके बाद से समीर को जाने क्या हुआ, उन दोनों  का आर्डर वो खुद प्लेट में सर्व करता। हर चीज़ को पैनी निगाह से चेक कर लेता कि कहीं कोई गन्दगी तो नहीं है। काउंटर से टेबल तक प्लेट खुद ग्राहक को ले जानी होती थी। उससे पहले वो सब भलीभांति देख लेता। नीतू का उसकी कैंटीन में आना उसके लिए गर्व की बात हो गयी थी।  वो उन्हें बिलकुल शिकायत का मौका नहीं दे सकता था।
बीच में एक हफ्ता उसकी तबियत खराब थी तो छुट्टी लेने से पहले उसने अपने स्टाफ को अच्छे से समझाया। सबसे सीनियर लड़के को मैनेजर का जिम्मा भी दिया। उसको समझाया कि आलसी  मोनू को काबू में रखे।

*

"अजीब बात है। " नीतू आज समोसा खाते हुए दार्शनिक मूड में थी।
"क्या?"
"इस दुनिया में हर इंसान को खुश रखने लायक ख़ुशी बिखरी पड़ी है।  बस क्रॉस कनेक्शन हो जाता है, किसी को किसी की ख़ुशी मिल जाती है और वो उसकी कदर नहीं कर पाता। "
"कैसे ?"
"मेरी माँ अगर मेरे साथ होती तो वो भी खुश होतीं और मैं भी।  वो वहाँ हैं जहाँ उनकी पाक कला का कोई मोल नहीं।  मेरी सास भी बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं पर वो मेरे साथ हैं जिसके लिए उनके हाथ के खाने का मोल नहीं। सब कुछ उल्टापुल्टा नहीं है ?"
"है पर थोड़े समय के लिए। कुछ महीनों बाद सब नार्मल हो जायेगा। इतना फलसफा मत झाड़। "
"जो भी हो, पर एक बात तो है। "
"क्या ?"
"माँ की कदर माँ बनने पर ही होती है!"
" हाहा ! सही बात है। "

समोसे आ गए थे , और साथ में खाली प्लेट इन्हें शेयर करने के लिए। नीतू ने गौर से देखा तो उसमें जूठन लगी थी। उसने स्वाति को दिखाया। आज समीर भी नहीं था जिससे शिकायत कर सकते। दोनों चुपचाप उठकर चले गए।


*

शाम को घर लौटते हुए नीतू ने थोड़ी सी मूली खरीदी।  सुबह जल्दी उठकर  सिल बट्टे में उसको कूटा। दिमाग पे बहुत ज़ोर डालके माँ के हाथ की थिंचौणी याद करने की कोशिश की और उसी हिसाब से थिंचौणी बनाकर डब्बे में पैक कर दी। 
दोपहर को जब उसने चावल के साथ थिंचौणी खायी तो उसकी ख़ुशी की सीमा नहीं थी। वही मम्मी के हाथ का स्वाद भरा था उसमें। आज उसे तृप्ति मिल गयी थी। थिंचौणी नामक हव्वे पर उसने काबू पा लिया था। 

एक हफ्ते  बाद समीर जब काम पर लौटा तो हवा में एक अजीब सी खामोशी थी। समीर चार बजने का इंतज़ार कर कर रहा था जब उसकी मैडम लोग चाय पीने आतीं। पर आज चार से पाँच बज गए वो लोग नहीं आये। अगले दिन भी ऐसा हुआ।  समीर परेशान था, उसने काउंटर क्लर्क  सुधीर से पूछा तो पता चला कि आलसी मोनू ने गन्दी प्लेट परोस दी थी और वो लोग बिना कुछ कहे चले गए थे।  फिर लौटकर नहीं आये।  

"हमें तो इस बात का डर है साब कि कहीं उन्होंने हमारी शिकायत न कर दी हो ।" सुधीर ने अपनी बात ख़त्म की। 
"नहीं सुधीर , वो ऐसा नहीं करेंगी। पर.." 
"पर क्या ?"
बहुत बुरा हुआ सुधीर, बहुत बुरा हुआ। " बस इतना ही कह पाया समीर। 

शाम को घर आकर समीर ने बीवी सरिता के सामने ऐलान किया। 

"तुम्हारा भाई मोनू अब हमारे साथ नहीं रह सकता।  घर भेज दो उसको। "
"ऐसा कैसे ? " बीवी ने सवाल किया। 
"उसके कारण मेरा नाम खराब हो रहा है।  जिस काम में हाथ डालता है गन्दगी मचा देता है। कुछ सीखने का नाम नहीं लेता। बहुत मौका दे दिया उसको अब और नहीं। ग्राहकों को साफ़ सुथरा खाना चाहिए वरना वो लौटके नहीं आएंगे। "
" छोड़िये न बच्चा ही तो है। ज्यादा हो तो बिठाके रखिये उसे।  आप भूल रहे हैं मेरे चाचा की बदौलत आपको ये काम मिला है। "
" नहीं ये मेरा आखिरी फैसला है।  मोनू को घर भेजो। मेरे यहॉं उसके लिए जगह नहीं। बिज़नेस में रिश्तेदारी नहीं चलती। "

ये कदम समीर बहुत पहले से लेना चाहता था  पर रिश्तेदारी के कारण रुक जाता था।  पर अब जब उसकी प्रेग्नेंट मैडम नाराज़ होकर लौट गयी थीं तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। हर धंधे का कुछ ईमान होता था, आज उसके ईमान को चोट पहुंची थी।   इस बात की सज़ा तो मोनू को मिलनी ही थी। हाँ सरिता ज़रूर उससे रूठ गयी थी , और उसे मनाने का उपाय समीर के पास फिलहाल नहीं था।

और अब अगला काम था मैडम लोगों को वापस लाना।  एक दिन उसने सुधीर को चाय पहुँचाने के बहाने नीतू के डिपार्टमेंट भेजा। सुधीर ने मैडम को ढूँढ निकाला और मोनू को भगाने वाली बात बतायी।

उसके जाने के बाद नीतू ने स्वाति को कॉल किया।
"वो हथिनी की चाल वाला लड़का भाग गया। "
"अच्छा! चल फिर समोसा हो जाय ?"
"बिलकुल!"

*
अगले दिन जब नीतू ने डब्बा खोला तो उसमें आलू मटर की तीखी और रस वाली सब्जी रखी थी। नीतू समझ गयी कि सासूमाँ ने बनायी होगी। उसके होंठों पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी। तो क्या हुआ अगर माँ के हाथ का खाना नहीं मिला, उनके जैसा प्यार तो मिला। बस ऐसा ही चलता रहे।

दिन बीतते रहे।  आखिर के दिनों में स्वाति का ट्रांसफर दूसरे विभाग में हो गया जो काफी दूर था।  पर नीतू अकेली ही कैंटीन आती।  समीर उसकी टेबल तक चाय समोसा भिजवाता। फिर कभी नीतू को शिकायत का मौका नहीं मिला।

और फिर नीतू ने भी आना बंद कर दिया। मैटरनिटी लीव पर चली गयी। समीर का वो ग्राहक जिसके कारण उसने अपनी बीवी से बैर मोल ले लिया था, अब चला गया था, लम्बे वक़्त के लिए। धीरे धीरे वो भी सब भूलकर काम में मशगूल हो गया।
 पर काउंटर पर बैठे बैठे  उन दोनों की बातें सुनने से समीर को  एक बात
 जानने को मिली, जो शायद वो खुद कभी न जान पाता। बेटी  कोई भी हो, चाहे पढ़ लिखकर अफसर बन गयी हो या गृहणी, कुछ बातों में वे भीतर से एक जैसी होती हैं। माँ की याद सबको आती है।   प्रेगनेंसी में चटोरी सब हो जाती हैं। 

*

नीतू ने ड्यू डेट से एकाध हफ्ते पहले छुट्टी ले ली। अब वक़्त था आराम करने का , जीवन में शुरू होने जा रहे नए अध्याय का भरपूर आनंद लेने का।  अब नीतू अपनी पसंद का खाना बना पाती थी। मम्मीजी के साथ मिलकर कभी दही वड़े बनाती कभी भेल पूरी।

और फिर वो दिन भी आया जब ईश्वर ने उसकी  कोख में एक प्यारा सा बेटा दिया। नौ महीने के तमाम उतार चढ़ाव, नए नवेले अनुभव अब  जाकर अंजाम पर आये थे। सब लोग बहुत खुश थे। मम्मीजी फ़ोन पर अपनी सखियों को बताती नहीं  थकती थीं कि वो दादी बन गयी ! अजय दिन भर गोद में बच्चे को खिलाता रहता।

 एक दिन नीतू और अजय बच्चे को गोद में लिए बैठे थे तो नीतू ने उसे अपने मोबाइल में स्वाति को भेजे मैसेज दिखाए।
"उबली लौकी।  समोसा?"
"अझेल बैंगन।  समोसा ?"
"थकेला कद्दू।  समोसा?"
"यम्मी थिंचौणी! फाइनली! "

दोनों काफी देर तक पढ़ पढ़कर हँसते रहे। 

समीर को भी कुछ दिन बाद नीतू की खबर मिली।  बहुत खुश हुआ, उसके समोसे कसौटी पर खरे उतरे ! और भी एक बात पता चली, उसकी कैटरिंग एजेंसी इस कंपनी में ब्लैकलिस्ट होने से बाल बाल बची थी। एक भी शिकायत और ऊपर साहब तक पहुँचती तो वो एक्शन ले लेते। समीर मन ही मन नीतू मैडम का शुक्रिया अदा कर रहा था जिनके कारण उसने मोनू को भगाया और शिकायतें आनी बंद हुईं।
और अब जब वो उनके दायित्व से मुक्त था, अब वक़्त था अपनी रूठी हुई बीवी को मनाने का , जो उसे अच्छे से पता था कि कैसे करना है, मैडम लोगों की बातें सुन सुनकर। शाम को घर आकर समीर ने वो बात कही जिसे सुनने को सरिता के कान तरस गए थे।

" सामान पैक कर दो। कल तुम्हारी माँ के पास चल रहे हैं। "

सरिता को समझ नहीं आ रहा था कि पहले हैरान होना है या खुश।

*

घर आ गया था।   आर्यन का ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। पूरे आँगन में दौड़ लगा रहा था। भाभी ने गरमागरम चाय पिलाई।  माँ वाकई बूढी हो चली थी, पर योग वगैरह करने से तबियत ठीक रहती थी। खाना अब भी वही बनाती थीं।
खाने की टेबल पर सब साथ में बैठे थे।  माँ ने बहुत प्यार से खाना बनाया था । मिर्च मसालेदार  थिंचौणी खासकर बनायी थी। नीतू ने एक निगाह सबकी प्लेट्स पर डाली। सबने वही खाना लिया था। पीली दाल नदारद थी।
"अरे आप हमारे कारण परहेज नहीं कर पा रहे! "
"परहेज?" भाभी हैरान थी, "यहाँ कौन परहेज करता है ? हम सब यही खाना खाते हैं। "
नीतू  और भाभी दोनों माँ की तरफ देख रही थी। माँ हौले से मुस्कुरा दीं। भाभी को पाँच साल पहले   उनकी कही बात याद हो आई।

"कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कही नहीं जा सकतीं। उन्हें समझना पड़ता है।  और ये काम सिर्फ माँ कर सकती है। "



4 टिप्‍पणियां:

M. Rangraj Iyengar ने कहा…

बहुत सुंदर चित्रण.
इस बार नासाजी की वजह से समय पर देख नहीं सका.

धन्यवाद.

varsha ने कहा…

शुक्रिया अयंगर जी।

M. Rangraj Iyengar ने कहा…

वर्षा जी ,

फरवरी के बाद आपकी पोस्ट का इंतजार काफी लंबा हो रहा है.

अधीर हो रहा हूँ...


सादर,
अयंगर.

varsha ने कहा…

जी शुक्रिया, अभी थोड़ा व्यस्तता है वर्ना कहानी लिखने का मन काफी करता है।