गुरुवार, 26 फ़रवरी 2015

मौसम



"सुन, ये पत्ते रहने दे. सिर्फ कचरा उठा ले जहाँ जहाँ दिखता है। "
"पर दीदी, रोज तो ये पत्ते हटाती हूँ!" मीना हैरान थी।
"दो तीन दिन में उठा दिया करना !" पूर्वा कहीं खोई सी थी।  मीना महारानी को तो जैसे मुँहमांगी मुराद मिल गयी।  पाँच पाँच घर पकड़े थे, बर्तन चौके के. दिनभर इस घर से उस घर कूदती रहती थी।  आँधी तूफान की तरह चलती थी।  उसपर पूर्वा के घर बागान साफ करने का काम और पकड़ लिया था। सूखकर काँटा होती  जा रही थी , पर साल में एक बार कहीं तीरथ कर आती थी तो फिर जोश में उड़ने लगती थी।

पूर्वा ने चाय का कप लिया और बाहर कुर्सी डालकर बैठ गयी।  पतझड़ में गिरी पत्तियाँ मौसम के बदलने का एहसास दिला रही थीं।  इधर सर्दियों ने दस्तक दी थी , और उधर पूर्वा की चाय में अब अदरक और जाने क्या क्या डलने लगा था।  रजाइयां ,स्वेटर, शॉल सब को धूप दिखा दी गयी थीं।  चेहरा फटकर लाल होने लगा था।  यही तो मज़ा था , बदलते मौसम का।  एक बोझिल सी किसी ढर्रे पर चल रही ज़िन्दगी जैसे नींद से जागती थी, और मौसम के अनुसार खुद को ढालना शुरू करती थी। मौसम बदलें तो ज़िन्दगी को गुज़ारना ही चुनौती हो जाए।

आज रविवार था।  नाश्ता करके मम्मी पापा के पास जाना था। एक ही शहर में रहते थे , रोज जाना होता था।  सच तो ये था कि रोज जा सकने के लिए ही इस तरह नवित से शादी की थी।  मेट्रिमोनियल साइट में ही जाहिर कर दी थी ये इच्छा ! करती भी क्या।  एक भैया थे वो शादी के बाद विदेश में बस गए।  वापस आने का कोई इरादा नहीं था। आना भी चाहते तो भाभी और बच्चे टांग अड़ा देते, स्वच्छंदता की आदत जो हो चली थी ! तो अब पूर्वा कैसे मम्मी पापा से दूर चली जाती? उसने देखे थे उनके चेहरे पे उदासी के साये , जब भैया लम्बे वक़्त के लिए बाहर जा रहे थे।  शायद जान गए थे दोनों कि अब एक दूसरे  का हाथ थामकर ही बुढ़ापा काटना था, बेटी तो एक दिन ससुराल जानी ही थी।  लेकिन बेटी तो बेटी होती है, इतनी आसानी से थोड़ी सब देखते बूझते उनसे दूर चली जाती ! पूर्वा ने कुछ वक़्त तो शादी से ही ना नुकर की , फिर इसी शर्त पर तैयार हुई कि उसी शहर में  रह रहा कोई ठीक ठाक लड़का मिल गया तो कर लेगी।

और ठीक ठाक लड़का मिला भी।  नवित उसी कॉलेज में लेक्चरर था जहाँ पूर्वा भी पढ़ाती थी। यूँ  तो वो अन्य जगह नौकरियों के लिए भी कोशिश कर रहा था , पर उसका परिवार भी इसी शहर में था , तो घूम फिर कर इस शहर से नाता तो नहीं टूटना था।  यही सोचकर पूर्वा शादी के लिए तैयार हो गयी थी।  दोनों ने कुछ वक़्त एक दूसरे को जाना समझा, फिर शादी के बंधन में बंध गए।  उनका कॉलेज शहर से थोड़ा दूर था तो उन्होंने कॉलेज के पास ही एक घर किराए पे ले लिया।  बहुत सुन्दर और शांत जगह थी , आस पास उन्ही की तरह फैकल्टी के लोग बसे हुए थे। खूब मस्ती मजाक चलता रहता था. त्यौहार हो या बिपद सब संग होते थे।  जिन्दगी धुली चाँदनी सी लगती थी।    


पर चाँदनी का भी एक उसूल था, उसको भी अमावस की अग्निपरीक्षा से गुजरना होता था। अंधेरों से निकलकर चमक के उसी आकाश को छूना होता था।

 *

सर्दियों की कुनकुनी धूप थी। पूर्वा ने चाय चढाई ही थी कि मीना गयी। आज कुछ ज्यादा थकी सी लग रही थी, बाल बिखरे से थे, कपडे अस्तव्यस्त। पूर्वा ने एक कप पानी बढा दिया। मालूम ही था, फिर से पति से पिटके आयी होगी। कितने टोने टोटके किये, कितने व्रत रखे, पर इसकी ग्रहस्थी वहीं से शुरू होकर वहीं खत्म हो जाती थी।
अदरक वाली चाय पीकर थोडा माथा हल्का हुआ उसका। झाडू बर्तन करके हवा हो गयी। बागान तो अभी साफ ही था।पूर्वा और उसके बीच एक अनकहा सा समझौता था, दोनों एक दूसरे के जख्म नहीं कुरेदते थे। किसके जख्म कितने गहरे हैं, कब रिसे हैं, ये मगर दोनों को मालूम रहता था। शायद इसीलिये अब तक मीना ने 'साहब' के आने के बारे में कुछ नहीं पूछा था, जबकि उन्हेँ एक महीना पहले आना था और अब तक आए नहीं थे। मौसम फिर करवट ले रहा था।  
पर पूर्वा की उदासी भी किसी से छुपी नहीं थी। शायद उसे खुद ही नहीं पता था उसकी जिन्दगी में क्या चल रहा था और क्यों चल रहा था। वर्ना ऎसा कभी हुआ था कि मौसम बदलते रहें और पूर्वा के चेहरे पर एक उल्लास, एक बचपने वाली खुशी दिखे। उसकी डायरी भी तो यही बयाँ करती आई थी। मौसम की पहली फुहार में भीगी मिट्टी की सौँधी खुशबू, गर्मियों के बड़े होते दिन, जाडे की कोहरे वाली सुबहें, पतझड़  के पत्तों से सने रस्ते, बसंत की सुहावनी शामें, सब कुछ कितने रुमानी लगते थे। इनके रहते जिंदगी में ठहराव कैसे सकता था?

पर ठहराव आया था। और जाने का नाम नहीं लेता था।    
 क्या ये उसी डायरी की करतूत थी? वही डायरी जो अनगिनत ऋतु परिवर्तनों की गवाह बनी थी, क्या आज किसी ठहराव की वजह बनने जा रही थी?
हो सकता था। आधी पढी किताब,  अधकचरा ज्ञान,  शक के उस बीज की तरह होता है जो रिश्तों में पहले तो दरार डालता है, फिर उसी की जर्जर मिट्टी को एक कब्रगाह में तब्दील होते देखता है, उपहास करता है। जितनी जल्दी एक माली बागान में पनप रही दीमक को दवा से मार गिराता है इससे पहले कि वो उसकी जतन से उगाई फल सब्जियाँ खा जाएँ, उतनी ही तत्परता और जतन से हम अपने रिश्तों पर लगी घुन की दवा क्यों नहीं करते?  क्यों सामना करने के बजाय भाग जाना पसंद करते हैं? भाग ही तो गया था नवित।

ये अमावस था या कोई ग्रहण? ये उसकी रोज मम्मी पापा से मिलने की जिद की पराकाष्ठा थी या पन्नों में भूले भटके जिक्र हो आये एक नाम से? जो भी था, बात करके हल निकाले जाने लायक अवश्य था, एक मौका देने लायक अवश्य था। पर वो करती भी तो क्या? कहके तो यही गये थे कि ट्रेनिंग में जा रहे हैं। एक महीने की ट्रेनिंग थी, फिर वापस आना था। पर आया उनका इस्तीफा, फैक्स से। और पूर्वा को फोन पर दी एक संक्षिप्त सी सफाई। आगे बढना चाहते थे, करियर में। ऊब गये थे छोटे से शहर की ठहरी हुई जिंदगी से। पूर्वा की जिद की खातिर अब तक समझौता करते रहे थे, अब और नहीं करना चाहते थे। चुपचाप से नौकरी ढूँढ ली थी शहर में, पूर्वा से सहयोग की अपेक्षा रखते थे। कुछ वक्त उधर ही नौकरी करके फिर तबादला करवाने का आश्वासन दिया था पूर्वा को। पर पूर्वा को आभास हो गया था, ये बात इतनी आसान, इतनी सुलझी हुई नहीं थी। कम बोलने वाले नवित अपने भीतर कितने तूफान समेटे थे, ये तो या उनको पता था या भगवान को। पूर्वा का कुछ भी टोकाटोकी करना मतलब उनकी तरक्की की राह में बाधक बनना। ये उससे हो पाया। दिन महीने गुजरते रहे। मौसम बदलते रहे।

 अब पूर्वा ने फैसला कर लिया था। अग्निपरीक्षा से गुजरेगी। पति का साथ देने के लिये माँ पिता का साथ छोड़ना पडे तो छोड़ देगी। वैसे भी अब वो अकेले थोड़ी थे, नवित का परिवार भी तो था उसी शहर में। नवित का छोटा भाई वहीं से तो पढ रहा था। वही कर लेगा दौड़भाग दोनों परिवारों के लिये, जरूरत पडने पर। पर जाने क्यों, ये सोचते ही दिल भर आता था। क्या बेटियाँ इतनी असहाय, इतनी बेबस थीं। माँ पिता के लिये सोच तक नहीं सकतीं थीं। शादी से पहले तक तो इतना नहीं सोचना पड़ता था ऎसे फैसले लेने के लिए। उसी का तो परिणाम था कि आज साहिल की जगह नवित के साथ थी।

और क्या सिला मिला उस फैसले का। क्या रह पायेगी वो इस शहर में, सब जानते हुए? अगर यही हश्र होना था तो साहिल क्या खराब था? क्या खराब था साहिल?

और फिर एक दिन उसने मीना से पूरा बागान साफ करवाया। पत्तों का बड़ा ढेर जम गया था। उसने मीना को थोड़ा केरोसिन और माचिस पकड़ा दी। पत्तों के ढेर के नीचे, मीना से छुपाकर, एक  डायरी रख दी।  

उधर आग धूधू करके जलती थी, इधर पूर्वा की सिसकियाँ बढ़ती जाती थीं। कोई मर गया हो, जल  गया हो जैसे। मीना खामोश देख रही थी। धीरे धीरे पूर्वा ने अपना सामान समेटना शुरू किया। नवित को बता दिया था अपने फैसले के बारे में। वो तटस्थ था, मानो कहना चाहता हो जो होना था वो तो हो ही गया। उसके अतीत के वो पन्ने जिनपर किसी और का नाम कभी लिखा गया था, जलकर  भस्म होने वाली चीज थोड़ी थी वो। उससे आगे भले ही पूर्वा के पास बताने के लिऎँ बहुत कुछ था, पर नवित के कानों ने तो जैसे जवाब दे दिया था।पहले एक बार देख आएगी सब कुछ, फिर आकर इस्तीफा वगैरह देती रहेगी।

ससुराल फोन लगाया तो पता चला उसका देवर रोहन दो दिन बाद एक कालेज टूर पे जा रहा था, एक हफ्ते के लिये। उसने थोड़ा और रुककर रोहन के आने के बाद ही निकलने का फैसला किया। वैसे भी नवित को कहाँ कुछ फर्क पड़ रहा था। हाँ लेकिन इतने दिन उसने सास ससुर के साथ जाके रहने का फैसला लिया। कालेज से वैसे भी छुट्टी ले ली थी तो कोई समस्या नहीं थी। मीना को बताया अगले दिन, कल से काम पे नहीं आना है। उदास तो हुई वो भी। नया घर ढूँढना पडेगा, पैसे तो कमाने थे कैसे भी। पता नहीं कैसे होंगे नये लोग, कितने पैसों में कितना काम लेंगे। पूर्वा तो फिर भी काफी भली निकली थी। खैर, उसने खूब अच्छे से काम किया, घर चमका दिया। उड़ने की आदी मीना भी दो पल ठहर गयी थी।

उस शाम जब मीना घर आई तो भीग गयी थी। बिन मौसम बारिश हो रही थी। पति बच्चे सब कहीं बाहर गये थे। उसने कपड़े बदले, खाना बनाकर थोडी देर फुर्सत से लेट गयी। सिरहाने छुपाके रखी डायरी निकाली। 

किनारे काले पड़ गये थे। पता नहीं क्या सोचके जलती आग में हाथ डालके बचाया था इसे। शायद इसके संग जलती पूर्वा की कुछ अजीज यादों को बचा लेना चाहती थी। शायद चाहती थी वो खोई मुस्कान फिर से तैर जाए उन लबों पर, जिसकी कुंजी, जिसकी गवाह ये डायरी कभी हुआ करती होगी।पर उसे तो पढना भी नहीं आता, और किसी दूसरे से पढवा भी नहीं सकती थी। फिर भी, एक बार खोलके देखने में क्या हर्ज था। 
 उसने डायरी खोली।

*
 पूर्वा ने पूरी तैयारी कर ली थी। खाने पीने का बचा खुचा सामान पैक  करके शाम को घर में ताला लगाके निकल गयी।   यूँ तो कुछ दिनों या महीनों में फिर वापस आना था, पर जाने क्यों कुछ पीछे छूटता सा दिख रहा था।  एक मिलजुलकर देखा सपना , एक खुशियों का घरोंदा, आज टूटने के पहले चरण में था।
आधे घंटे की ड्राइव के बाद अपने सास ससुर के घर पहुँच गयी।  रोहन घर पर ही था , सामान उतरवा दिया गाड़ी से। घर पर सास बेसब्री से इंतज़ार कर रही थी।  उन्हें बातें करने के लिए कोई चाहिए होता था।  रोहन और पापाजी  तो अपनी ही दुनिया में रहते थे।

पूर्वा थोड़ी देर बैठकर हाथ मुँह धोकर किचन घुस गयी। यूँ तो कुक खाना  बनाके गयी थी पर पूर्वा जब भी आती कुछ अपने हाथों से बनाके खिलाती , और मम्मीजी को इसी का इंतज़ार रहता।  पूर्व के हाथों में बड़ा स्वाद था, बुढ़ापे की एक ख़ास बात ये है कि घूमफिर के जो चीज़ें बचपन में पसंद आती थी वही फिर पसंद आने लगती हैं , बचपना लौट आता है। शायद इसलिए कि कोई भी दिन आखिरी दिन हो सकता है, ऐसे में बिना किसी ढोंग, पाखण्ड के, बच्चों जैसी मासूमियत और सच्चाई के साथ जीने का मन करता है।  चटपटी चीज़ें खाने का,  दोस्त रिश्तेदारों के साथ गप्पबाजी करने का, भरपूर जीने का मन करता है।  और बच्चे समझते हैं कि बूढ़े लोगों को शान्ति  चाहिए , आराम चाहिए ! बस यहीं दिक्कत हो जाती है।
पूर्वा ने कोफ्ते बनाये।  मम्मीजी उंगलियां चाटती रह गयीं। शायद सोच रही थीं , अब तक तो हफ्ते में एकाध बार पूर्वा का साथ मिल जाता है , इसके बाद क्या होगा।  फिर कहाँ आना जाना हो पायेगा ? ये कैसी ज़िद पकड़ ली थी नवित ने।
*
एक सूखा  लाल फूल डायरी से बाहर निकल आया था।  मीना  ने सहेजकर वापस रख दिया। ये तो बसंत में खिलता है।  सुर्ख लाल।  ,मौसम में, फ़िज़ा में, जैसे लहू का संचार  कर देता है, जान फूँक  देता है।

 दूर कहीं दो साये चले जा रहे थे, हाथों में हाथ डाले।
"क्या करोगी छुट्टियों में?"
"लिखूंगी। "
"अच्छा? प्रेम पत्र लिखोगी मुझे ? "
"शट अप ! और भी बहुत कुछ है लिखने के लिए, रोमांटिक होने के लिए। "
"लिखने के लिए होगा।  रोमांटिक होने के लिए के लिए तो मैं इकलौता हूँ तुम्हारे पास। "
"इतनी गलतफहमियाँ ! छुट्टियों से लौटकर आओ, बताती हूँ।  "
"अरे अभी बताओ , ऐसा मत करो !"
"हम्म, ये जो मौसम देख रहे हो , ये जब अपने रंग बदलता है, कुछ महसूस होता है ? "
" तो मौसम के साथ चक्कर चल रहा है तुम्हारा? "
"हाहा ! समझ लो ऐसा ही कुछ।  उसकी अठखेलियों के साथ , उसके रूठकर चले जाने और फिर लौटकर आने के आश्वासन के साथ। उसके रंगों, उसकी रंगीनियों के साथ। "
"समझ गया।  ऐसा करो, तुम मौसम को प्रेम पत्र लिखा करो। ज्यादा प्यार रहा हो तो शादी भी कर लेना  "
" प्रेम पत्र तो तब से लिखती रही हूँ जब से सोलहवाँ सावन आया है ज़िन्दगी में !"
" हम्म ! अब के हमारा ज़िक्र भी कर लेना थोड़ा।  इन्सिक्युरिटी भी तो हो उसे किसी से। "
"तुम्हारा ज़िक्र मेरी डायरी में ! सोच भी कैसे लिया तुमने  !"
"अच्छा जी, तो डायरी लिखती हो!"
वो झुका, ज़मीन पे गिरा  एक सुर्ख लाल फूल उठाया। 
"इस फूल को वहीं सहेजकर रख देना जहाँ अबके बसंत का ज़िक्र करो   मेरी नहीं ,  इस मौसम की खातिर  "

*

"इतने सारे आँवले ?"
"तुम लोगों के लिए अचार मुरब्बा भी तो बनाना है मुझे। नवित को  तो बहुत पसंद है। "
"पसंद तो मुझे भी हैं मम्मीजी ! पर आपको इतनी सारी मेहनत भी तो करनी पड़ेगी।"
"तो तुम हो , तुमको सिखाना भी तो है !"
"हाँ हाँ बिलकुल मम्मीजी, इस बार  तो सीखकर रहूंगी। "

नाश्ते में पूर्वा ने पोहा बनाया था, साथ में दूध और फल। नाश्ता करके मम्मीजी  अपने साजो सामान के साथ बाहर बरामदे की तरफ निकलने लगी।  पूर्वा किचन साफ कर रही  थी।

पता नहीं क्या हुआ , मम्मीजी दरवाजे के सहारे बैठ गयी। पूर्वा घबराकर उनकी तरफ दौड़ी।
"कुछ नहीं बेटा, ऐसे ही चक्कर आता रहता है। तू चिंता मत कर। " मम्मीजी थोड़ा संभलकर बोलीं।
"अरे ऐसे कैसे ! आप पहले लेट जाइए। " पूर्वा ने मम्मीजी को बिस्तर पर लिटा दिया।
"पहले भी आया था आपको चक्कर ? तब भी आपने ऐसे ही टाल दिया था ! रुकिए अभी डॉक्टर के पास चलते हैं। "

पूर्वा ने अपनी गाइनेक से अपॉइंटमेंट लिया। शाम को दोनों क्लिनिक पहुंचे। डॉक्टर ने पहले कुछ टेस्ट्स करवाये फिर पूर्वा को बुलाया।
"इनका ऑपरेशन करना पड़ेगा यूटेरस का। फाइबर हो गए हैं। इनकी तकलीफ , चक्करों का कारण यही है। यूटेरस निकालना पड़ेगा। तुम घर जाकर ये बात डिस्कस करो फिर मुझे बताओ। "
"  ओह! ऑपरेशन ? " पूर्वा टेंशन में गयी थी ये सुनकर। पता नहीं कब से मम्मीजी इस दर्द  को अकेले सह  रही थीं।  एक बार पहले भी पूर्वा के सामने हल्का सा चक्कर आया था।  तभी दिखा देना  चाहिए था डॉक्टर को। रोहन  या पापा को तो मम्मीजी अपनी तकलीफें बताने से रहीं।

घर आकर पूर्वा ने नवित को फ़ोन किया।  पापा से भी डिस्कस किया। अंत में ऑपरेशन करवाने  की बात फाइनल हो गयी। मम्मीजी तो अब तक हिचक रही थीं , पर उनकी बेहतर सेहत के लिए कुछ कड़े फैसले तो लिए जाने थे।
पूर्वा के पास कार थी , साधन थे , हिम्मत थी।  नवित को इस महीने छुट्टी मिलने की दिक्कत थी , उसके बॉस खुद छुट्टी पर थे , बैंक का पूरा कामकाज उसके जिम्मे था। पर पूर्वा ने उसको आश्वासन दिया, उसके आने की ज़रुरत नहीं।  रोहन और वो तो हैं  , कर लेंगे मैनेज।
अब तो फिलहाल कहीं नहीं जाना था , ऑपरेशन और उसके बाद पूरी तरह रिकवरी तक। और मम्मी का होने के बाद पापाजी का भी पूरा चेक अप करवाना था। तब जाकर वो यहाँ से हिलने के बारे में सोचने वाली थी। नवित और उसकी नय्या का तो भगवान ही मालिक था।

*

"अरे अरे , गाड़ी रोको !"
"क्या हुआ ?"
"अरे रोको तो। बताती हूँ। "
"हम्म , लो रोक ली।  अब बताओ। "
"अरे , देखते नहीं ? मौसम की पहली लीची गयी है !"
"हे भगवान ! ये लीची खरीदवाने के लिए तुमने इतना हल्ला मचाया ? बाद में नहीं ले सकती ?"
" जी नहीं।  लीची के साथ कोई समझौता नहीं।  पूरे साल तरसाया है इसने।  भइया , कैसी दी लीची ? दो किलो लेंगे ठीक ठीक लगाना। "
"तुम  ! पागल हो। "
" पागल कौन नहीं ,  कोई चॉकलेट के लिए , कोई फूल के लिए। "
"और तुम, लीचियों के लिए ?"
इस मौसम में तो फ़िलहाल इन्ही के लिए! '
"और हमारा नंबर किस मौसम में आएगा ?"
" तुम बिन मौसम की बरसात हो। "
"अच्छा ! अभी बरस लेते हैं ! "
"किसी और पे बरसना  "
"अच्छा ये बताओ , अगर कोई बन्दा तुम्हें सर्दियों  में प्रोपोज़ करना चाहे तो ? गोभी का फूल अच्छा खिलता है सर्दियों में ?"
"बकवास बंद हो गयी हो तो हमें  घर  छोड़ने का कष्ट करेंगे ? लीची खानी है। "

*

मीना पहले से ज्यादा बदहवास होती जा रही थी। पैसे भी  कम कमाती थी, और पति की हरकतों में भी कोई  सुधार नहीं था।  कई दिनों से दूसरे  घर की तलाश कर रही थी काम के लिए। दो घर मिले भी थे , पर  एक खुद छोड़ दिया दूसरा सामने से छूट गया।  मन ही नहीं लगता था ,  गलतियों  पे गलतियां करती जाती थी, और अब तो पुराने घर भी छूटने के आसार बन रहे थे। पूर्वा दीदी की बहुत याद आती थी उसे।  खाली वक़्त में उनकी डायरी को खोलके निहारती रहती थी , उससे पूछती रहती थी कि बता , क्या कहती थी पूर्वा दीदी , जब उनकी  ज़िन्दगी में बसंत ही बसंत था , जब एक निश्छल सा प्यार उन्हें छू के गुज़रा था। और बदले में वो डायरी भी उसे चुन  चुन के किस्से सुनाने लगी थी। अब अक्षर पढ़ने की दरकार रही थी। पन्नों से उठती खुशबुओं से, उनमें संजोये पत्तों से मौसम का हाल पता चल जाता था।
और अबके शायद सावन बरसने वाला था , स्याही फैली हुई थी।

*

"सब ठीक हो जाएगा। आप बिलकुल अच्छी हो जायेंगी।  डॉक्टर बहुत अनुभवी हैं, ऐसे कितने ही ऑपरेशन किये हैं उन्होंने। " पूर्वा मम्मीजी के पास बैठी थी। थोड़ी देर में डॉक्टर आके ऑपरेशन शुरू करने वाली थीं।
"हाँ पर मेरा तो पहला है  !" मम्मीजी भी मुस्कुराके अपने डर को छुपा रही थीं।
"हम सब हैं यहीं, आपके पास। " पूर्वा की  बात ख़त्म होते होते डॉक्टर गयीं। मम्मीजी को ऑपरेशन थिएटर ले जाया गया। पूर्वा की आँखें नम थीं। अपनी मम्मी जैसा ही मानती थी उन्हें  , उनका दर्द खुद का दर्द लगता था।  रोहन पापा को संभाले हुए था। मम्मीजी के इलाज के बाद उनको भी दिखाना था, बात बात पर घबराने लगे थे।
सुबह सुबह नवित का भी फ़ोन गया था। वो भी काफी टेंशन में था , पर पूर्वा  ने संभाल लिया था। मम्मीजी में सबकी जान बसती थी , वो थीं ही इतनी प्यारी।
पूर्वा के मम्मी पापा भी गए थे। दोनों परिवार सुख दुःख में एक दूसरे के साथी रहते आये थे।
ऑपरेशन ख़त्म हुआ , और कुछ दिनों के आराम के बाद मम्मीजी को घर ले आया गया। पूर्वा ने घर की पूरी ज़िम्मेदारी संभाल ली थी। मम्मीजी की सेवा , पापाजी को वक़्त पर खाना, रोहन की लॉन्ड्री, कोई काम मम्मीजी की इस अवस्था के कारण रुक नहीं पाया था। पूर्वा को भी काफी सुकून मिलता था , ज़िन्दगी को एक मकसद  मिल गया था , कुछ वक़्त  के लिए ही सही।

धीरे धीरे मम्मीजी की सेहत में सुधार होता गया।  आधा सुधार तो इसी बात से हुआ था कि पूर्वा पास में थी , गप्पें मारने को मिल जाती थीं। परहेज  वाला खाना वही बनाती थी खुद, और उसमें भी उँगलियाँ चाटने लायक स्वाद रहता था।  ऐसा खाना खाके किसकी सेहत सुधरे!

पापा को भी एक दिन रोहन के साथ भेज दिया था। सारे टेस्ट्स करवा लिए थे।  बीपी और शुगर थोड़ा हाई निकला था तो दवाइयाँ शुरू हो गयी थीं उनकी भी।

*

"अरे , ये बारिश अचानक से  ?"
"बारिश का मौसम है तो  आएगी ही। "
"हाँ भूल गया था , तुमसे ही तो पूछके मौसम बदलते हैं !"
"नहीं ,इनपर  मेरा कोई जोर नहीं , पर मुझपे इनका है। "
"हम्म , जैसे तुमपर मेरा कोई जोर नहीं, पर मुझपे तुम्हारा है। "
"फिर शुरू हो गए तुम ! "
"मैं  वो कहानी हूँ जो शुरू होने से पहले ख़त्म हो जायेगी  "
"अच्छा ! अभी कहानी खत्म नहीं हुईकितनी और खिंचेगी !"
"बस ये मौसम और। "
दो पल की खामोशी।
"तुम्हें ये सब मज़ाक लगता है ,  पर जानती हो, ये है नहीं। "
"हम्म। तुम सीरियस अच्छे नहीं लगते। चलो वापस नार्मल हो जाओ। "
" कब तक?"
"क्या कब तक ?"
"तुम जानती हो। हायर स्टडीज के लिए बाहर जा रहा हूँ। ज्यादा वक़्त नहीं मेरे पास। "
जाने वो बारिश की बूँद थी या पसीने की , जो उसके माथे पर ठहर आई थी, जिसे पोंछने के लिएएक काँपता  हाथ हौले से आगे बढ़ा था। जाने वो वक़्त की सुई थी या किसी के दिल की  धड़कन , जो ठहर  सी गयी थी 
और उन पीछे हटते क़दमों में उस कहानी का अंत लिखा था।
जानते तो तुम भी हो... मैं देश तो क्या, ये शहर भी नहीं छोड़ सकती। "

मीना घबराकर उठ गयी।  कोई बुरा सपना  देखा था शायद।

*

एक महीना होते होते नवित भी  छुट्टी लेकर गया था।  हालांकि उसका आगे का प्लान अब तक स्पष्ट नहीं था।  कितना रुकेगा, पूर्वा को साथ लेकर जाएगा या बाद में आने को बोलेगा।
अपनी माँ को खुश देखकर बहुत खुश था वो।  घर में एक अलग सी रौनक रहती थी।   पर साथ में चिंता की लकीरें भी पढ़ ली थीं उनके चेहरे पे। शायद उन दोनों के दूसरे  शहर जाने के नाम से। इतना तो समझ गया था कि बहू ने भरपूर सेवा की थी सास की।

एक सुबह नवित ने पूर्वा से उनके वाले घर की चाबी ली और कॉलेज की तरफ निकला।  कुछ पुराने दोस्तों से मिलना था  ,कुछ इस्तीफे की फोर्मेलिटीस बाकी थीं, यही बोलके निकला था।
घर तो कुछ दिनों के खालीपन से घर जैसा रहा नहीं था। धूल , काई , बदबू, और जाने क्या क्या। बागान की तरफ गया तो वहाँ भी पत्तों का जमावड़ा लगा था।  उसे याद आया , पूर्वा को तो इन बिखरे पत्तों से भी प्यार था। नवित  ने ही जिद करके मीना को रोज बागान साफ़ करने के लिए कहा था वरना पूर्वा का बस चलता तो गार्डन जंगल लगने लगता।
बाहर से किसी ने कुछ फेंका। बंद चारदीवारी के कारण नवित देख नहीं पाया। तुरंत सामने के दरवाजे से बाहर निकलके देखा।  मीना दूर पहुँच चुकी थी। तो क्या उसी ने कुछ गिराया था गार्डन में ? उसने मीना को आवाज दी।  साहब की आवाज सुनकर मीना चौंककर पलटी।  दो पल के लिए स्तब्ध रह गयी, फिर तेज़ चलकर उनके पास आई।
"तुमने क्या फेंका बागान में? "
" साहब वो..  दीदी की एक चीज़ मेरे पास रह गयी थी , मुझे परेशान कर रही थी।  पर साहब दीदी कहाँ हैं ? वो नहीं आईं ?"
 "दीदी आएँगी।  तुमने कोई घर तो नहीं पकड़ा इस बीच ? "
नहीं साहब, अभी तक तो नहीं। "
"ठीक है।  कल से काम पे जाना  "
मीना के चेहरे पर जो चमक आई , उसे देखकर नवित भी हैरान हो गया।

गार्डन में मीना क्या गिराके गयी थी, ये नवित के लिए कोई पहेली नहीं थी। पूर्वा के पास अगर कोई चीज़ थी जिसमें किसी को परेशान करने का दम था तो वो एक ही थी।  पहेली तो नवित के लिए ये थी कि वो चीज़ मीना के पास कैसे पहुँची। नवित गार्डन में गया। अखबार में बेतरतीब लपेटी डायरी को उठाया। काले पड़ गए किनारे अपनी कहानी खुद बयाँ कर रहे थे। ऐसा क्यों किया पूर्वा ने।  और कितने बलिदान देने बाकी थे उसे, अपने प्रियजनों को खुश रखने के लिए। प्रियजन, क्या नवित इस शब्द के लायक रहा था ?
उसने कलम निकाली।  डायरी में अभी एकाध पन्ना बचा था। एक और मौसम लिखे जाने की जगह थी।

*

खबर सुनाना एक चीज़ है , और उसपर किसी के चेहरे पर उमड़ आई ख़ुशी देखना और। नवित ने जब कल रात मम्मीजी को अपने यहीं रुकने के फैसले के बारे में बताया था तो उनके चेहरे पर जो भाव थे, लगता था जैसे जीने की वजह मिल गयी हो।  अब कोई चिंता , कोई परेशानी रह गयी हो।
मम्मीजी अब ठीक हो गयी थीं। उसने मम्मीजी से सलाह करके अपने कॉलेज जाकर वापस ज्वाइन करने की इच्छा जताई थी , जो कि कॉलेज द्वारा सहर्ष स्वीकार भी कर ली गयी थी। अब उन्हें अपने घरोंदे में वापस कदम रखना था।  पूर्वा को कुछ समझ नहीं रहा था , जैसे जैसे नवित बताता जाता था, करती जाती थी।

अगली सुबह दोनों नाश्ता करके और कुछ जरूरी सामान लेकर मम्मी पापा का आशीर्वाद लेकर अपने घर लौट आये। पूर्वा ने मम्मीजी से और खुद से वादा किया था कि हफ्ते में कम  से कम दो दिन तो उनके पास आएगी , अपने हाथों से बनाके खिलायेगी , अचार मुरब्बा बनाना सीखेगी।
मीना बाहर ही खड़ी थी।  उसकी चमक अभी बरकरार थी। उनको देखते ही बढ़कर सामान हाथ में ले लिया।
दो घंटे सबने मिलकर काम किया , तब जाकर घर रहने लायक हुआ। मीना के जाने के बाद पहले पूर्वा नहायी फिर नवित बाथरूम में घुसा।
ड्रेसिंग टेबल  के सामने खड़ी ही हुई थी कि नज़र ठहर गयी।  कंघे के बगल में वही चीज़ रखी  थी।  पर ये तो उसने जला दी थी , ख़त्म कर दी थी !

उसने डायरी खोली। अंतिम पन्ने पर नवित की हैंडराइटिंग थी।
"और सब मौसम लिखे जा चुके थे , तुम्हारी ज़िन्दगी में।  बस पतझड़ लिखा जाना बाकी था , वो मैंने आके लिख दिया। है  ?
तुमने जब किया , जिससे किया , निश्छल प्यार किया। और मैंने  उस प्यार पे शक किया।   तुमने अपनी ज़िन्दगी खुली किताब की तरह मेरे सामने रख दी , और मैंने उसी में मीन मेख निकालके रख दिया  आज मैं तुमसे नज़रें मिलाने लायक नहीं, और तुम फिर भी मेरा हाथ थामे खड़ी हो।
जो हुआ, उसे मैं बदल नहीं सकता।  पर एक वादा ज़रूर कर सकता हूँ , और कर रहा हूँ। ये मौसम अब बदलेगा।  अबके तुम्हारे ज़िन्दगी में बसंत आएगा।  और मैं उसे कभी जाने नहीं दूँगा। "

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"क्यों  री मीना , बिना बागान साफ़ किये कहाँ भाग रही है ?"

"अरे दीदी , साहब ने मना किया है रोज रोज करने के लिए! "  मीना के चेहरे पर शरारत भरी मुस्कान थी। 



2 टिप्‍पणियां:

Rangraj Iyengar ने कहा…

कहानी की बुनाई बहुत ही खूबसूरत व मार्मिक है.

इतनी सुंदर रचना पढ़ाने हेतु मेरा आभार स्वीकारें.
समझ नहीं पाया कि अब तक इसपर कोई टिप्पणी क्यों नहीं आई.

varsha ने कहा…

जी शुक्रिया, अच्छा लगा ये जानकर क़ि आपको पसंद आई।