मंगलवार, 3 फ़रवरी 2015

मुल्लू सिंह

उफ़, ये कुत्ते भी न! रात को बारह बजे सब मिलके भोंकेंगे। वैसे ही नींद नहीं आ रही, और ये और ऊपर से.

नमिता आधी नींद में पहुँच ही चुकी थी, दो घंटे बिस्तर में करवट बदलने के बाद, कि इधर कुत्तों की सभा शुरू हो गयी। वे बेचारे तो रोज ही भोंकते थे , पर इन दिनों नमिता को ज्यादा सुनाई देती थी उनकी आवाज।  नींद नहीं आती थी जल्दी। डेढ़ दो घंटे फेसबुक व्हाट्सऐप पर बर्बाद करके तब जाके कहीं उसकी लाल आँखें  बंद हो पाती थीीं। आज तो शायद रतजगा ही होने वाला था।

थोड़ी देर में कुत्ते भी सो गए। उनकी भी एक दुनिया थी, अपने थे, सुख दुःख के साथी।  नमिता का तो अब फिलहाल दूर दूर तक कोई नहीं दिखता था. कुछ  दिन पहले विवेक दूसरे  घर में शिफ्ट हो गया था।  अब और साथ नहीं रहा जाता था।  तलाक के लिए अप्लाई किया था पिछले हफ्ते।  अब छह महीने और गुजारने थे।  क़ानून की तरफ से एक और मौका मिलता था सबको, रिश्ता निभाने की आखिरी कोशिश की तरह।  पर इतना वक़्त भी दोनों साथ नहीं रह पा रहे थे। 

मम्मी पापा से तो कब का नाता टूट गया था, जब से उनकी बात न मानकर विवेक से कोर्ट मैरिज कर ली थी, प्यार मुहब्बत के नशे में।  अब तो न परिवार साथ था, न विवेक।  कल अमन से भी बात करने की कोशिश की थी , उससे काफी अच्छी दोस्ती थी, उसकी और विवेक दोनों की।  पर अमन अब दोनों से नाराज़ हो चुका था, उनके इस फैसले के कारण।  न इसकी बात सुनता था न उसकी।

तो इस तरह नमिता कुछ दिनों से अकेली अपने खालीपन से जूझ रही थी।  दिन भर तो ऑफिस में कट जाता था पर शाम और रात काटना मुश्किल होता जा रहा था।  रियल फ्रेंड्स का अकाल पड़  रहा था तो वर्चुअल दोस्त तलाशने शुरू कर  दिए थे, फेसबुक पर।  जिनके शौक या कोई भी और चीज़ उससे मिलती हो, जो उससे दोस्ती के लायक हों या वो जिनके लायक हो।  बस ऐसे ही।  पर वहाँ भी लगता था सब बकवास लोग ही भरे हुए थे। दो चार बार कैज़ुअल चैट करके फिर मुद्दे पर  उतर आते थे।  पर्सनल लाइफ के बारे में पूछने लगते थे , जिससे  नमिता खुद ही दूर भागना चाहती थी। तो बात कुछ जम सी नहीं रही थी।

नमिता का फ़ोन बजा।   मैसेज था फेसबुक पर। नमिता ने एक सेकंड की देर नहीं लगाई खोलने में।

''भों भों "

लो , इधर कुत्तों का भोंकना बंद हुआ और उधर उन्होंने मैसेज करना शुरू कर दिया! कुछ देर तो उसको समझ नहीं आया कि हँसना है या सर पीटना है ! अब ये दिन आ गए कि कुत्ते चैट करना चाहते हैं फेसबुक पर।

फिर उसको याद आया। परसों  ही तो एक नया मित्र अनुरोध स्वीकार किया था उसने फेसबुक पर , एक क्यूट से कुत्ते का।  उस वक़्त भी यही सोच रही थी कि अब ये दिन आ गए! कुत्ते रिक्वेस्ट भेज रहे हैं। पर उसने ये  सोचकर स्वीकार कर दिया कि देखें माजरा क्या है। कुछ खोने को तो बचा नहीं था , जो हुआ उससे खराब भी कुछ होना नहीं था।

ऐसा ही एक उसके बचपन का साथी भी था , शेरा।  बहुत कम लोग जानते थे उसके बारे में। शायद विवेक और अमन , बस। कितना वफादार था वो । कुछ भी कर लो, साथ  नहीं छोड़ता था।  अगर अभी वो होता उसके पास तो वो कितना रोती उससे लिपट के। और वो कितने धैर्य से बिना कुछ पूछे उसकी बात सुनता , उसपर यकीन करता।  उस कमबख्त अमन से तो बेहतर ही होता जो उसकी बात सुनने को ही तैयार नहीं था !

 इधर ये कुत्ता, जिसका प्रोफाइल नेम ''मुल्लू सिंह '' था , शायद उसके रिप्लाई का इंतज़ार कर रहा था ।  कितनी अजीब बात है , वो भी कोई इंसान ही है जो कुत्ते के रूप में एफबी पे घूमता है।  पर दिलचस्प सा है। एक बार मौका तो दे ही सकते हैं। क्या पता ये सच में सिर्फ उसकी बात सुने , उसपर यकीन करे। उसके अकेलेपन का साथी बन जाए। क्या पता  ये शख्स ब्रैड पिट निकले ! हा हा ! ख्याली पुलावों का कोई ओर छोर नहीं होता।

तो उसने रिप्लाई किया। सामने से स्माइली आते रहे और इधर से वो खुलती गयी , खुलती गयी।  मुल्लू सिंह उसके बचपन के दोस्त शेरा जैसा ही लगने लगा था। सिर्फ उसको सुनता जाता ,  वो आँखों से तो ये स्माइली से कुछ कुछ प्रतिक्रिया  देते।  उनमें बस प्यार होता, बिना किसी शर्त वाला प्यार।

सबसे अच्छी बात ये थी कि मुल्लू कुछ पूछता नहीं था। बस सुनता जाता था। नमिता उसको अपने दुखड़े सुनाती जाती और उसके मन का बोझ धीरे धीरे कम होता जाता।  नमिता ने पिछले हफ्ते अपने प्रोफाइल में थोड़ा  फेरबदल  किया था।  विवेक को हटाया था , अपनी प्राइवेसी सेटिंग्स बढ़ा दी  थी ताकि कोई वहाँ से उसकी रियल लाइफ में घुसके तंग न करने लगे। वर्चुअल दोस्त वर्चुअल ही अच्छे।

तो इस तरह मुल्लू सिंह नमिता के सुख दुःख का साथी बनता  जा रहा था।  अब रात को कुत्तों  का भोंकना सुनाई नहीं देता था।  नींद आ जाती थी उससे पहले ही। कभी कभी हँसी भी आती थी,  अपने हाल पर। पर कोई ऑप्शन भी तो नहीं था , जीने की कोई वजह, कोई रौशनी , कुछ नहीं।

क्यों हो गए थे वो दोनों अलग? ऐसा क्या नया हो गया था जो पहले से पता नहीं था उनको ? विवेक एक नंबर का फ़्लर्ट था, ये बात तो नमिता को हमेशा से पता थी।  उसके साथ ये भी पता था कि वो सब सिर्फ हँसी मज़ाक हुआ करता था , और ये भी कि वो नमिता को दिलो जान से प्यार करता था। सब कुछ जान समझकर ही तो रिश्ते में बंधे थे दोनों। और यही बात विवेक आखिर तक कहता भी तो आया था। ये सब मज़ाक है नमिता, इसको दिल पे मत लो।  मुझे बदलने की कोशिश मत करो, मत करो।  भरोसा करो मुझपर। तुम्हारे सिवा किसी के बारे में सोच भी नहीं सकता हूँ मैं। पर खुद को बदल डालूँ, हँसी मज़ाक बंद कर दूँ , ये कैसी ज़िद है तुम्हारी।

ज़िद तो थी।   और उसका कारण भी था , जो शायद वो बोल नहीं पाती थी। साधारण सी दिखने वाली नमिता , अव्वल दर्जे के खूबसूरत विवेक के सामने फीकी पड़ जाती थी। जो उन दोनों को साथ देखता , एक बार यही सोचता कि शायद नमिता में कोई और खूबी हो जो उनको दिख नहीं रही हो। इस तरह की तीखी नज़रों की अग्नि परीक्षाओं से गुज़रते गुज़रते कभी कभी उसको खुद ही अपने रिश्ते पर शक होने लगता था। पर विवेक का बेइन्तहां प्यार उसके सारे शक दूर कर दिया करता  था।
सच तो ये था कि सांवली सी नमिता एक बहुत आकर्षक व्यक्तित्व की मालकिन थी। बहुत प्यारा नेचर था उसका , बाकी सबसे अलग। दुनिया भर के शौक थे उसके , पढ़ना , घूमना , कुकिंग , पेंटिंग, प्रकृति के बीच वक़्त गुज़ारना , बच्चों से खेलना, उनमें खुशियाँ बांटना।  बहुत ही खुशमिजाज़ स्वभाव था उसका, विवेक  को जीने की नयी राह दिखाई थी उसने। ऐसा वो खुद कहता था।

पर जब से शादी हुई थी, पता नहीं क्या हो गया था। वही पुरानी फ्लर्टिंग , हँसी मज़ाक जो विवेक पहले भी किया करता था , अब उसे तीर की तरह चुभता था। ऐसा लगता था जैसे उसने विवेक को किसी ख़ुशी से वंचित कर दिया हो , उससे कहीं ज्यादा खूबसूरत लड़कियों का प्यार पाने की, जो अब भी उसके आस पास मंडराती सी रहती थीं। और जब विवेक उनसे हँसी मज़ाक या हल्का फुल्का फ़्लर्ट करता तो वो कनखियों से विजयी मुस्कान लिए नमिता को देखतीं , मानो नमिता की ज़िन्दगी में सिर्फ विवेक का शरीर ही है, दिलो दिमाग तो इन हसीनाओं के कब्ज़े में है।  ये तीखी नज़र सिर्फ नमिता को दिखती, विवेक को नहीं। एक अजीब सी ग्लानि से भर जाती नमिता। बड़े बुज़ुर्ग शायद ठीक ही कहा करते थे कि रिश्ते हमेशा बराबरी वालों के साथ होने चाहिए, हर मामले में। बस यही सब एहसास अब उसका बिस्तर पर भी पीछा करने लगा था। एक इन्फीरिओरिटी काम्प्लेक्स  आने लगा था उसके भीतर धीरे धीरे।  उसने विवेक को समझाने की भी कोशिश की थी कि  उसके हँसी मज़ाक से अब उसको हर्ट होता है।  उसका आत्मविश्वास कम होता जाता है।   अपनी तरफ से एक ईमानदार कोशिश की थी नमिता ने सब ठीक ठाक रखने के लिए। पर विवेक को शुरू में तो मज़ाक लगा, और बाद में अनावश्यक टोकाटोकी। कुछ चीज़ें भीतर से बदली नहीं जा सकती , जैसे विवेक का मस्तमौला नेचर।  उसपर रोकटोक करना मतलब उसके नथुनो पर हाथ रख देना। दम घोंट देना उसका। अगर अपनी ख़ुशी से वो खुद को बदल लेता तो भी ठीक रहता, पर उसको भी तो लॉजिक समझ में नहीं आ रहा  था इसका। कभी नमिता की नज़रों से देखने की कोशिश भी तो नहीं करता था।

कुछ वक़्त बाद नमिता ने टोकना बंद कर दिया।  भीतर से घुटती रही।  जब भीतर दुखी रहती तो बाहर भी खुश रहने  का अभिनय नहीं कर पाती।  विवेक को नमिता के अंदर चल रही चीजों का कारण कभी समझ नहीं आया , और बात  कभी न बन पाने वाले मोड़ तक आ  गयी।  दोनों अब भी एक दूसरे को प्यार करते थे , पर एक दूसरे को प्यार को किसी अदृश्य तराजू से तोलना शुरू कर दिया था उन्होंने . दोनों की यही शिकायत रहने लगी थी कि उनके प्यार की खातिर सामने वाला इतना भी नहीं बदल सकता खुद को।
जब तराजू प्यार के रिश्ते को तोलने लगती है तो दोनों पलड़े कभी बराबर नहीं रह पाते . तुलनाएं, अपेक्षाएं सदियों से प्यार के पतन का कारण रही हैं . बस जो इनसे गुज़र रहा होता है उसी को पता नहीं चलता , कि रिश्तों में दीमक लग चुकी है, जो उन्होंने खुद लगाई है , कोई बाहर से लगाके नहीं गया।

उस दिन जब अलग होने के बावजूद नमिता ने विवेक को किसी और लड़की के साथ घूमते देखा तो कुछ पल के लिए उसका सर झन्ना सा गया।  पता नहीं क्यों, अब जब उसका कोई नैतिक हक़ भी नहीं रहा था विवेक पर, तब भी ये दृश्य देखना , आखिरी उम्मीद की डोर टूट जाने जैसा लगा था ।   अँधेरा सा छा गया था।  उस दिन नमिता घर आकर फूट फूट कर रोई थी।  और उस रात उसने घंटों अपने दोस्त से बातें की , रोज़ की तरह, वो कहती रही, वो सुनता रहा।  अपनी अपेक्षाएं, अपना वहम , अपना डर , अकेलापन सब कुछ उड़ेल दिया उसने।   तब जाकर कहीं दिल हल्का हुआ उसका।

पर अब नमिता को उसका चुपचाप रहना क़ुबूल नहीं था। वो चाहती थी कि सामने वाला अपनी राय बताये , उसे सांत्वना दे , समझाए कि ज़िन्दगी अभी ख़त्म नहीं हुई है।  ये कोई सच्ची का मुल्लू थोड़ी था, कोई इंसान ही तो था जो फोटो में दिख रहे कुत्ते का मालिक होगा।  फिर  वो क्यों उससे खुलकर बात नहीं करता था ? क्यों कोई सलाह नहीं देता था ?
नमिता से अब और नहीं रहा जाता था।  आज वो बहुत अकेली थी, टूट चुकी थी।  उसने अगले सन्देश  में सामने वाले की राय जानने  की इच्छा ज़ाहिर की। जब विवेक दूसरी लड़कियों को पा सकता था तो वो क्यों नहीं तलाश सकती वैसी आत्मीयता कहीं और। यहाँ  बात न बनी तो न सही , कोशिश तो करनी ही थी।  अब तो प्यार की जगह बदले की भावना ने ले ली थी। अब उसे मुल्लू सिंह के मालिक में रुचि सी होने लगी थी।

और फिर फ़ोन बजा। मैसेज था, मुल्लू सिंह का। पर इस बार स्माइली नहीं था। हम्म, तो  मुल्लू सिंह के मालिक को अंततः उसकी सुध आई।

उसने धड़कते दिल से पढ़ना  शुरू किया।

"आपने एक कुत्ता समझकर मुझसे दोस्ती की।  मैंने उसका फ़र्ज़ निभाया। आपको  सुना, और सुनता गया।  आपका  साथ देता गया।  कुत्ते ऐसे ही होते हैं न?  और तो कोई अपेक्षा नहीं की थी न आपने मुझसे ? कुछ दिन बहुत ख़ुशी दी मैंने आपको , शायद।

पर अब , आपकी अपेक्षाएं बदल गयी हैं। एक कुत्ते से बुलवाना चाहती हैं आप। और क्या बुलवाना चाहती हैं, ये भी जानता हूँ। हमदर्दी के बोल, हैं न ? क्यों बुलवाना चाहती हैं, क्योंकि नितांत अकेली हैं आप।

कौन ज़िम्मेदार है इस नितांत अकेलेपन का? आपकी ज़िन्दगी में हो रही किसी भी घटना का, आपके सिवा कोई और ज़िम्मेदार हो सकता है भला ? किसके खिलाफ खरी खोटी सुनाके हमदर्दी दे दूँ आपको ? आपके खुद के ? आपको बुरा भला कहकर आपको ही खुश कर दूँ ? ये इंसान सबके सब ऐसे ही क्यों होते हैं ? प्यार को अपेक्षा की जंग लगती रहती है , और ये देखते रहते हैं।  प्यार तो सिर्फ दिया जाता है।  क्या ये बात हर बार एक कुत्ते को आके समझानी पड़ेगी ? या फिर कुत्ते गलत हैं , और इंसान सही ?

मैं एक इंसान हूँ।  मैंने इंसानों को प्यार खोते देखा है ।  कितना दुःख देते होंगे वो , अपनी अपेक्षाओं , तुलनाओं के तराजू में अपने हमसफ़र को तोल तोल  के। बस इसीलिये कुत्ता बना फिरता हूँ , दूसरों को कान देता हूँ। निस्वार्थ प्यार देता हूँ।

और अब जब आप मुझसे कुछ बोलने की उम्मीद कर रही हैं तो न मैं कुत्ता रहा न हमारी दोस्ती दोस्ती रही।    ये दोस्ती आज ख़त्म हो चुकी।  जाइए नए सिरे से ढूँढिये किसी को , अपने दुःख दर्द सुनाने , सिर्फ सुनाने के लिए। याद रखिये , प्यार में कोई अपेक्षा नहीं , कोई तुलना नहीं। जब ऐसा प्यार किसी को देंगी तो फिर आपको अपनी तन्हाइयों को काटने के और तरीके ढूँढने की ज़रुरत न रहेगी।  आप कभी अकेली न होंगी।"

नमिता ने एक बार पढ़ा , बार बार पढ़ा। सर घूमने  लगा था। तन्हाई काटने का ये जरिया भी ख़त्म हो चुका  था। मुल्लू सिंह अलविदा कह चुका था।
नमिता सोच रही थी, क्या वाकई अब ये हालत हो गयी थी कि कोई भी आके उसे ज्ञान देने लगा था। क्या दुनिया में किसी से भी उसे समझने की उम्मीद नहीं की जा सकती थी ? उम्मीद, ये तो अपेक्षा से मिलता जुलता शब्द है न।

बिना अपेक्षा के कोई जीवित कैसे रह सकता है ?

उस रात नमिता को नींद नहीं आई। अब किसके सहारे जीना था उसे ?  उसके स्कूल कॉलेज और नौकरी के दौरान बने सब दोस्त अपनी अपनी ज़िन्दगियों में मस्त थे। सब खुश रहते थे और रहना चाहते थे। ग़म से साये से भी दूर भागते थे। वो तो चलता फिरता ग़म का पिटारा बन चुकी थी , किसी तो ख़ुशी देने में पूरी तरह असमर्थ। सबका कोई अपना था,  उन अपनों से बाहर आने का किसी का मन ही नहीं नहीं करता था। पर ऐसा कैसे हो गया कि उसका कोई अपना नहीं बचा ?

अगले दिन कोई और नहीं मिला तो नमिता ने विवेक को ही कॉल कर लिया। पक  तो रही ही थी। इत्तेफ़ाक़ से वो भी पक रहा था। शाम को वो उसके घर गयी , दोनों  ने कॉफ़ी भी पी, मिलकर डिनर भी बनाकर खाया।  फिर विवेक ने उसको घर ड्राप कर दिया।

उस रात नमिता को अच्छी नींद आई। मतलब कभी कभार विवेक को एक दोस्त की ही तरह मानकर उसके साथ वक़्त बिताया जा सकता है। इतनी भी तनहा नहीं है वो , वक़्त की एक पूँजी जो उसने विवेक पर झोंक दी और जो सब किसी न  किसी पर झोंकते थे  उन्हें अपना बनाने के  लिए , वो पूरी बर्बाद भी नहीं गयी थी।  दोस्ती अब भी बाकी थी।  सहजता , सुकून अब भी था।

पर ये सब तब तक ठीक था जब तक वो दूर थे। दिन रात एक दूसरे  की शक्ल नहीं दिख रही थी।  साथ रहकर फिर वही बर्तन बजने थे, आवाजें होनी थी। यही तो सच था , कुछ बदला थोड़ी था।  उनका अहम , उनका वहम।  कोई बात नहीं , कुछ  नहीं से तो कुछ बेहतर होता  है ।  कम से कम कुत्ते तो नहीं मिस करने पड़ेंगे। दिन के पाँच मिनट अच्छे गुज़र जाएँ , बाकी का दिन तो वैसे ही बढ़िया गुजर जाएगा।  वो खुश रहेगी तो बाकी और खुश लोग भी मिलेंगे , फिर तो बस ख़ुशी ही ख़ुशी। अलविदा मुल्लू सिंह , तुम्हें  क्या लगा था नमिता कभी खुश नहीं रह पाएगी ?

इस हफ्ते तो पीके भी लगी  थी। सोच रही थी एक बार पूछ ले विवेक से , पर फिर लगा, नहीं ज्यादा हो जाएगा।  गुलाब सी  नाजुक है उनकी दोस्ती  अभी , कोई ना नुकर , कोई अप्रिय घटना या कुछ भी उसको चोट पहुंचा सकता है। पूछूंगी तो फिर अपेक्षा होगी हाँ की , नहीं करेगा तो फिर दुःख होगा। तो पूछती ही नहीं।

अपेक्षा , ये  शब्द कहीं सुना सा नहीं था ? उफ़ , ये मुल्लू सिंह भी। पीछा नहीं छोड़ रहा।

तो वो शनिवार को अकेली ही तैयार हो गयी फिल्म देखने के लिए।  और क्या।  देख ही सकते हैं। उसके और दोस्त भी जा रहे थे पर सब कपल थे। वो किसी दूसरे हॉल में जाके  देखने वाली थी। 

और फिर विवेक का फ़ोन आया।  फिल्म देखने जा रहा था , पूछ रहा था उसका भी टिकट ले ले या नहीं। नेकी और पूछ पूछ ! उसने हाँ कर दी। पर मन में ये बात घूम रही थी, गुलाब की पंखुड़ी सी उनकी दोस्ती , क्या आज शाम सब सही होगा , कहीं मुरझा तो नहीं जाएगा वो गुलाब ज्यादा छूने से। दूर से देखने से इत्मीनान तो था कि वो अब भी खिला है। इस गुलाब को सहेजकर रखना  था उसे , मुरझाने नहीं देना था।  आज विवेक  को वो खुलकर जीने देगी , अब तो वैसे भी उसका कोई हक़ नहीं रहा टोका टोकी करने का। अब अपने दायरे में रहकर उससे पेश आएगी।

तो वो फिल्म देखने गए। बहुत कैज़ुअल थे दोनों ,बिलकुल पहले की तरह , जब नए नए दोस्त बने थे।  नमिता ने ज्यादा मेक अप नहीं किया था , पर वो खुश थी और वही ख़ुशी उसकी खूबसूरती को निखार रही थी।  दोनों ने फिल्म देखी , फ़ूड कोर्ट में डिनर भी किया। इस दौरान कुछेक परिचित सुन्दरियां विवेक से टकराई भी पर नमिता ने बिलकुल ध्यान नहीं दिया।

नमिता की ज़िन्दगी में खिले उस नए  गुलाब ने उसको जीने का नया कारण दिया था, छोटा सा ही सही । उसने  खुद से वादा किया कि चाहे कुछ भी हो , उसे नया बन्दा मिल जाए या विवेक को नयी बंदी , उनकी दोस्ती पर कभी आँच नहीं आने देगी।

दोनों इसी तरह कभी कभार मिलते रहे।  वक़्त बिताते रहे। दोस्ती का वो गुलाब खिलता चला गया।  शायद इसलिए कि अब वो विवेक से किसी चीज़ की कोई अपेक्षा ही नहीं रखती थी।  जो था, जैसा था, उसका दोस्त था वो। 

उस दिन कॉफ़ी शॉप में जब वो दोनों  गप्पें मार रहे थे तो स्निग्धा मिली , वही जिसके साथ विवेक पहले हँसी मज़ाक , फ्लर्टिंग करता  था और फिर घूमते  हुए भी  पाया गया था। नमिता के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी , पर फिर अपनी दोस्ती की याद करके वापस नार्मल हो आई।  अब स्निग्धा विवेक को उसके सामने किस भी कर दे तो उसको कोई मतलब नहीं था। उनकी दोस्ती ऐसी छोटी मोटी चीज़ों से बिखरने या  मुरझाने वाली थोड़ी थी ! उसका अपना स्पेस था , अपना कम्फर्ट लेवल था, जो सिर्फ और सिर्फ वही दे सकती थी।  और वो देती रहेगी।

स्निग्धा  आई , कुछ देर बैठी , आदतानुसार विवेक को लाइन देने की कोशिश की।  और विवेक थोड़ी हाय  हेलो के बाद वापस नमिता को अपना अधूरा किस्सा सुनाने लगा।

ये बात नमिता ने नोट की , और उस वक़्त उसको एक बात महसूस हुई।  दोस्ती के इस गुलाब को मुरझाने न देने की कोशिश सिर्फ उसकी तरफ से नहीं , दोनों तरफ से हो रही थी। वो बहुत हल्का महसूस कर रही थी, बड़ी मुश्किल से अपनी ख़ुशी विवेक से छुपाकर वापस उसके किस्से सुनने में मशगूल हो गयी।

शनिवार की शाम विवेक तीन चार डीवीडीज़  उठा लाया , डिनर बाहर से पैक करवा लिया था। दो मूवीज ख़त्म होते होते डिनर का टाइम हो गया।  रात हो आई थी , पर न नमिता का मन घर लौटने को करता था न विवेक का उसे छोड़ने का। विवेक ने एक आखिरी मूवी और देखने का आग्रह किया। दोनों सोफे पर एक दूसरे पर टिके मूवी देखते रहे। कब दोनों की आँख लग गयी , पता ही नहीं चला।

अगले दिन वैसे भी रविवार था , कोई हड़बड़ी नहीं।  नमिता ने विवेक के पसंद की कॉफ़ी बनायी।  दोनों अंगड़ाई लेते  हुए बालकनी में पसर गए , आराम से पेपर पढ़ा।  नाश्ता मिलके बनाया। फिर नमिता घर लौट आई।

बस ऐसा ही चलता रहा।  नमिता और विवेक दोनों की ज़िन्दगी से अपेक्षा शब्द गायब हो चुका था। दोनों का मकसद अब सिर्फ और सिर्फ एक दूसरे को सुकून देना था, उसी में उनको खुद भी सुकून मिल जाता था।

और फिर एक शाम विवेक नमिता के घर आया , एक गुलाब हाथ में लिए । ठीक  वैसा ही , जैसा नमिता के मन में बसा था , दोस्ती का अनछुआ गुलाब , जिसको सहेजकर रखने , मुरझाने न देने का वादा वो जागते सोते खुद से करती थी।  उस रात विवेक ने नमिता को दूसरी बार प्रोपोज़ किया। नमिता ने वो गुलाब हाथ में लिया , हमेशा सहेजकर रखने के लिए , और विवेक को गले लगाकर देर तक रोती रही , रोती रही।

इनबॉक्स में अमन का मैसेज पड़ा  था, जो उसने अगली सुबह देखा।

 ''अपने हाथों से तुम दोनों की शादी के कागज़ साइन किये थे मैंने। ऐसे कैसे टूट जाने देता ?

 तुम्हारा , मुल्लू सिंह ''