गुरुवार, 2 अक्तूबर 2014

हैं हैं ठीकाछे


मैडम एक बात पूछेगा आपसे, आप बुरा तो नहीं मानेगा ?''
''पूछिए फिर देखते हैं !''
''आपको इधर बंगाल में आये कितना बोचोर हो गया ?''
''छह साल हो गया। ''
''तो आप की थोड़ा थोड़ा बांग्ला सीखा है ? अभी देखता है आप हिंदी में ही बात करता है। ''
''हाँ सीखा तो है।  अमी  बांग्ला बोलते पाड़ी । ''
''कहाँ, छह साल से तो हम यही एकटो  लाइन सुनता है।  अरे पूरा डिपार्टमेंट हिंदी सीख गया आपको बांग्ला सिखाने के चक्कर में। ''
''अरे पिनाकी जी , तीन चार साल तो कॉलेज के वक़्त की सीखी गुजराती  को भुलाने में लग गए। बोलना चाहते थे बंगाली और निकलती थी गुजराती। ''
''अरे मैडम हमारा लरका सिर्फ तीन साल से चेन्नई में है इनफ़ोसिस में, वो तो खूब भालो मद्रासी बोलता है अभी । अपना अपना शौक है मैडम , किसी को सीखना अच्छा लगता है किसी को नहीं। ''

नंदिता ने बगलें झांकनी शुरू कर दी। पिनाकी बाबू आज क्लास लेने के चक्कर में थे।

आज दुर्गा सप्तमी थी।  वैसे भी स्टाफ का  कभी काम करने को लेकर ख़ास मूड नहीं रहता था और अभी तो दुर्गा पूजा का वक़्त था। इमरजेंसी काम छोड़कर उनको कोई सीट से हिला नहीं सकता था। ऐसे में पिनाकी बाबू आ गए थे नंदिता को पकाने के लिए , शुभो पूजो के बहाने।

ऐसा नहीं था कि नंदिता को बांग्ला सीखने का शौक नहीं था। कॉलेज मैं उसकी एक रूममेट बंगाली भी थी , जो पूरे तन मन धन से बंगाल का प्रतिनिधित्व करती थी।  वही हथिनी जैसी चाल  , वही सुस्ताई सी आँखें, रसगुल्ले जैसे गाल, माछ भात के विटामिन ई  से दमकती त्वचा।  किसी काम को करने की कोई हड़बड़ी नहीं।  और खान पान के लिए भले पैसे कम  पड़  जाएँ , पार्लर के लिए कोई समझौता नहीं। आइना तकिये के नीचे रखकर सोती थी मोमिता जी , कि सुबह उठते ही अपनी शकल सुधार ले इससे पहले कि कोई उसके अनधुले प्राकृतिक रूप को देख ले ।

तो वहीं से नंदिता को बंगाल की पहली झलक मिली थी।  और थोड़ी इच्छा भी जागृत हुई थी , बंगाली सीखने के लिए।  पर मोमिता  मैडम जो अधिकाँश अपने घरवालों से फ़ोन पर  ''हैं हैं ठीक आछे'' कहती सुनाई देती थी उसने इस राज का पर्दाफाश कर दिया था कि उसे ''हैं हैं ठीक आछे '' से ज्यादा बांग्ला आती ही नहीं थी  , वो तो सिक्किम में पली बढ़ी थी !  तो इस तरह नंदिता का बंगाली सीखने का सपना अधूरा रह गया।  लेकिन मोमिता  के  सानिध्य में उसने और बहुत कुछ सीख लिया।  माछेर झोल , दुर्गा पूजा की धूम, विष्णुपुरी साड़ियाँ, रबिन्द्र संगीत वगैरह वगैरह।

और इसके अलावा कुछ छोटी छोटी बातें , जैसे अगर मोमिता को अगर बाहर कैंटीन  में चाय पिलाने ले जाना होता था तो एक घंटे का नोटिस देना पड़ता था , दूसरी तरफ  बगल वाले रूम की नैना और सुरभि दुपट्टा ड़ालकर वैसे ही चल  देते थे।  जब उनकी दूसरी चाय ख़त्म हो  रही होती थी  तो दूर कहीं से मोमिता  आती दिखती थी , सलीके  की चादर और नज़ाकत  का स्कार्फ़ ओढ़े। नंदिता के  मन में ये लाइन  चलने लगती थी.…एक पल भी कभी हो जाता है सदियों जैसा।

एक ख़ुमारी सी रहती थी उसके आस पास। और इस ख़ुमारी के ख़ुमार में कुमार भैया सर तक डूब चुके थे , वो भी अंतिम सेमेस्टर में। सलीके और नज़ाकत के कद्रदान आखिरकार मिल चुके थे। दोनों मिलकर एक दूसरे  में मशगूल रहते थे , और बाकी लड़कियां राहत की सांस लेकर दिन भर के काम निपटा लेती  थीं।

जब कुमार भैया का आखिरी सेमेस्टर पूरा हुआ और वो दोनों बिछड़ गए तो मोमिता बाज़ार से जगजीत सिंह का ''कोई  फ़रियाद '' कलेक्शन ले आई और खाने पीने और सोने के अलावा बाकी वक़्त उसमें डूब गयी।  नंदिता से रहा न गया तो अपनी तंग जेब से पैसे निकालकर इयरप्लग ले आई उसके लिए।
उस समय नया नया मोबाइल चला था, नोकिया का।  मोमिता पहली लड़की थी उसे लेने वाली।  उधर कुमार भैया को भी जबरदस्ती खरीदवा दिया था।  और फिर जब एयरटेल की फ्री एसएमएस वाली स्कीम लांच हुई तो कुमार भैया ने शुरू शुरू में उसके ''खाना खाया ? ब्रश किया? ''  प्रश्नों के  उत्तर मिस यू जोड़कर दिए पर
धीरे धीरे वक़्त के तकाजे के साथ मोमिता का मोबाइल खामोशी में डूबता चला गया।  और तब नंदिता और उसके पडोसी रूममेट्स के सामने उसे ज़िंदा रखने का चैलेंज आ गया।  उसके आंसू और जगजीत सिंह की ग़ज़लें थमने का नाम नहीं लेती थी और सेमेस्टर की परीक्षाएं सर पर थीं।  ऐसे में तीनों ने एक प्लान बनाया।

उनके पूरे बैच की लिस्ट निकालके एक काबिल मुर्गा ढूँढा गया और उसे जाल में फंसाया गया। उन दिनों लड़कों के लड़कियों को लेकर ज्यादा क्राइटेरिया नहीं होते थे।  बस वो लड़की हो इतना काफी होता था।  और इस तरह विकास को मोमिता को संभालने की ज़िम्मेदारी यह कहकर सौंप दी गयी इससे अच्छी लड़की तुझे क्या मिलेगी इसके कान में दो  दिन के अंदर गोविंदा के गाने बजने चाहिए।

विकास ने ज़िम्मेदारी बखूबी निभायी।  मोमिता ने अपने धूल खाते आईने को साफ़ किया और तकिये ने नीचे रख दिया। लड़कियों ने राहत की साँस ली।


पढाई लिखाई ख़त्म हुई , दुनिया भर के टेस्ट्स दिए और एक दो जगह नंदिता ने क्लिक भी कर लिया। आल इंडिया लेवल था , भारत के किसी भी कोने में पटका जा सकता था।  और पटका गया बंगाल में।  नंदिता वैसे ही घुमक्कड़ प्रकार की थी, घर से जितने दूर पोस्टिंग मिलती उतनी रोमांचित हो जाती।  पर अभी उसने बंगाल का पानी नहीं पिया था।

और सब्र के जैसे बाँध उसने मोमिता के साथ रहकर तोड़े थे उससे कहीं ऊंचे और मज़बूत बाँध यहाँ आकर उससे तुड़वाये गए।  और बदले में उसने बंगालियों के सब्र के बाँध तोड़ दिए बांग्ला बोलने में।  ये उनके लिए एक चैलेंज की बात हो गयी थी नंदिता मैडम से बांग्ला बुलवाना ।  और सब एक एक करके फेल होते जा रहे थे। वो लोग ज़रूर खूब भालो हिंदी सीख लिए थे। ऑफिस का चपरासी भी ''मैडम चाय  खायेगा ? '' वाली हिंदी फ्लॉन्ट करने लगा था।

खैर , पिनाकी बाबू मैडम को पूजो की बधाई देकर रूम से बाहर निकलने लगे। इधर नंदिता मैडम का फ़ोन बजने लगा। दो तीन घंटियों बाद नंदिता ने फ़ोन उठाया।

''की बोल्छो तुमि ? कालके छुट्टी नेबे ? ....... ना बाबा कालके होबे ना कोनो रोकोम  …… कालके ऐशो, रोब्बारे निए नो.....ना होले तोमार मे के पाठी देबे कालके ठीकाछे ? ''

नंदिता मैडम कामवाली को कुछ समझा रही थी और पिनाकी बाबू दरवाजे पर खड़े सर खुजा रहे थे।







3 टिप्‍पणियां:

Kailash ने कहा…

''की बोल्छो तुमि ? कालके छुट्टी नेबे ? ....... ना बाबा कालके होबे ना कोनो रोकोम …… कालके ऐशो, रोब्बारे निए नो.....ना होले तोमार मे के पाठी देबे कालके ठीकाछे ? ''
मैं भी सर खुजा रहा हूँ। मुझे तो समझ नहीं आया ये, पर पिनाकी बाबू को तो समझ आया ही होगा।

varsha ने कहा…


कैलाश जी आपकी सुविधा के लिए : क्या बोल रही हो तुम , कल छुट्टी लोगी ? न बाबा कल नहीं , कल आ जाओ रविवार को ले लो, नहीं तो अपनी बेटी को भेज देना कल, ठीक है?'' वैसे कहानी पढ़ने का शुक्रिया :)

Kailash ने कहा…

हैं हैं ठीकाछे! :D