सोमवार, 10 फ़रवरी 2014

चिंटू जी का वॉकमैन

 चिंटू जी को गाना सुनने का बहुत शौक था।

उन दिनों आइपॉड नहीं हुआ करता था, और न ही मोबाइल।  गाना सुनना  हो तो या फिर रेडियो साथ लेके चलना पड़ता था या फिर पसंदीदा गाने सुनने हों तो एक छोटा सा वॉकमैन रखना पड़ता था। वॉकमैन भी अलग अलग साइज़ के आते थे। सस्ते वाले वॉकमैन थोडा बड़े होते थे और जेब में नहीं घुसते थे। अच्छी कंपनी के स्लीक वॉकमैन महंगे आते थे और मध्यम  वर्ग के बजट के बाहर होते थे। वही मध्यम वर्ग जिसे छोटे बड़े खर्चों के लिए बजट बनाना पड़ता था और अधिक ज़रुरत की चीज़ों के लिए कम ज़रुरत की चीज़ों पर कटौती करनी पड़ती थी। अब गाने सुनना तो कोई ज़रुरत की चीज़ होती नहीं, वो तो बस एक शौक होता था , वो भी खासकर युवा वर्ग का, जिसके पीछे पूरा खानदान पढाई करने और नौकरी ढूंढने के लिए पड़ा रहता था , और इसलिए उन्हें वॉकमैन सरीखी चीज़ देना इन लोगों के लिए एक भयावह सपना जैसा होता था। सिर्फ वही युवा जो बचपन से ही अपनी उद्दंड प्रवृति के कारण जाने जाते थे  और जिनसे बड़े बूढ़े भी खौफ खाते थे, अपनी जिद के बल पर वॉकमैन  खरीदने का दम रखते थे। और बाकी लोग  इनसे  वॉकमैन उधार लेकर अपने शौक पूरा किया करते थे।

चिंटू जी दूसरी जमात में आते थे। गानों का भयानक शौक था इन्हें, और आशिक़ी का खुमार भी।  उस पर कुमार सानू के विरह वाले गीत तो इनके आँसू टपका के ही छोड़ते थे। साँसों की ज़रुरत है जैसे ज़िन्दगी के लिए.. बस इक सनम चाहिए आशिक़ी के लिए।  लेकिन इसका मतलब ये नहीं था कि चिंटू जी कहीं दिल लगा बैठे थे , दिल साबुत था और चिंटू जी के पास ही था। लेकिन आमिर खान की फिल्में देखकर उनका भी मन करता था कि अब बस दुनिया जहां छोड़ दें और जंगल में जाकर एक कुल्हाड़ी से पेड़ काटना शुरू कर दें और उसकी लकड़ी से अपना घर भी बना लें और बची हुई लकड़ी बेचके महबूबा को पैसे भी पकड़ा दें घर चलाने के लिए। फिर याद आता था कि महबूबा तो है नहीं, इसलिए प्लान स्थगित हो जाता था। उन्हें मालूम था कि उनकी वर्तमान सेहत के चलते कोई ठीक ठाक महबूबा मिलने से रही , फूँक मारने से तो उड़ जाते थे वो। लेकिन रोमांटिक गाने सुनने के लिए तो इन सब की ज़रुरत नहीं थी , ज़रुरत थी तो सिर्फ एक वॉकमैन की। पर वो भी चिंटू जी को नसीब नहीं होता था , पापा ने बोला था बेटे जिस दिन क्लास में अव्वल आ जाओगे सबसे पहले तुम्हें वॉकमैन दिलवाऊंगा , पर यही काम तो चिंटू जी से नहीं हो पाता था।  भला ये कोई क्लास में अव्वल आने के उम्र थी! ये तो माधुरी के पोस्टर  लगाने, आशिक़ी के गाने सुनने की उम्र थी , कोई समझता ही नहीं था चिंटू जी को।

और इस तरह चिंटू जी को मनपसंद गाने  सुनने के लिए यहाँ वहाँ हाथ फैलाना पड़ता था।  उस पर भी दुनिया भर के नियम कायदे।  पड़ोस के मिक्की  के पास एक वॉकमैन था, सस्ता वाला पर कामचलाऊ, वहीं से बीच बीच में उठा लेते थे चिंटू जी।  लेकिन मिक्कीजी भी कम नहीं थे , एक बार ब्लैंक कैसेट पकड़ा दी थी मनपसंद गानों की  लिस्ट के साथ, भरवाने के लिए। भरवाने का खर्चा चिंटू जी का ! एक गाना डलवाने के डेढ़  रुपये लगते थे।  बीस रुपये की चपत। इतने में तो ''साजन''  की नयी कैसेट आ जाती, चिंटू जी सोच रहे थे। खैर, उस बहाने तीन दिन तक मिक्की  का वॉकमैन दबाके रखा चिंटू जी ने, या यूं कहें कि निचोड़ डाला।  जब लौटाने गया तो मिक्की ने चलाके देखी  , खर्र खर्र कर रहा था।  चिंटू जी भाग लिए थे। मिक्की ने चुपचाप नेल पोलिश रिमूवर निकाला और रुई में डुबाया।

इस तरह दिन कट रहे थे, कि एक दिन दूर के चाचाजी का फ़ोन आया।  उनकी इकलौती बेटी नीलम  की शादी थी।  शादी वादी में जाना चिंटू जी को कुछ समय से  पसंद नहीं आता था, जब से थोड़े बड़े हुए थे ।  घरवालों के  बजट के कारण  चिंटू जी को नए कपडे खरीदने के लिए पैसे नहीं मिलते थे।  दुल्हन की सहेलियों पर इम्प्रैशन भी नहीं जमा पाते थे चिंटू जी। इससे अच्छा तो न जाना बेहतर था।  और नीलम दीदी से भी उनका कोई ख़ास लगाव नहीं था। बचपन में खेलते थे, पर काफी वक़्त से मिले ही नहीं थे। चिंटू जी ने पापा को बोल दिया कि उन्हें पढाई करनी है , बोर्ड सर पर हैं , और इसलिए वो शादी में नहीं जा पाएंगे। मन ही मन सोच रहे थे कि थोडा खाली वक़्त और खाली घर मिलेगा तो यहाँ वहाँ पतंगबाज़ी करेंगे , पर इतने खुशकिस्मत कहाँ थे चिंटू जी। चाचाजी ने बोल के रखा था कि और कोई आये न आये चिंटू जी को तो ज़रूर आना है , अरे भाई दुल्हन के इकलौते भाई हैं वो ! सारी भाइयों वाली रस्में उन्हें ही तो पूरी करनी हैं।  अब तो कुछ नहीं हो सकता था। 

फिर अनायास ही चिंटू जी को कुछ याद आया। एक साल पहले जब नीलम दीदी के घर गए थे छुट्टियों में तो उन्होंने अपना नया वॉकमैन दिखाया था। वाह, कितना स्लीक था, फिलिप्स का, बजता था तो लगता था फूल झड़ रहे हैं।  चिंटू जी के 'पॉकेट टेस्ट ' में भी पास हो गया था।  सबसे छोटी जेब में घुस जाता था।  तो क्या नीलम दीदी उसे अपने साथ ससुराल ले जाएंगी ? छी छी , चाचाजी को तो बिलकुल पसंद नहीं आएगी ये बात।  बोलेंगे मायके में जितनी मनमानी करनी थी कर ली, अब ससुराल में मत शुरू हो जाना ये कान में लगाके।  एक संस्कारी बहू थोड़ी ऐसे गाने वाने सुनती है। पडोसी क्या बोलेंगे। और फिर चाचाजी नज़रें घुमाके देखेंगे तो परदे के पास चिंटू खड़ा दिखेगा और वो ख़ुशी से अपने हाथों से उस वॉकमैन को उसके अगले वारिस को सौंप देंगे। लो बेटा , नीलम के बाद अब तुम ही तो हमारा सहारा हो।  खयाली पुलाव लम्बे होते जा रहे थे।

और चिंटू जी शादी में जाने के लिए राज़ी हो गए , एक छोटी सी शर्त के साथ कि कम से कम शर्ट तो नयी खरीदवा दो , लड़की का इकलौता भाई अच्छा भी तो दिखना चाहिए।

चिंटू जी को अंदेशा भी नहीं था कि उन्होंने किस दलदल में ख़ुशी ख़ुशी पाँव रख दिए हैं।  दुल्हन के इकलौते भाई को सिर्फ रस्में थोड़ी निभानी होती थी , छगन हलवाई से हर दो दो घंटे में मिठाइयां लाना, फूलवाले से ताज़ा फूल लाना, बेसन नहीं है , घी ख़त्म हो गया , दिन में पचासों चक्कर चिंटूजी के नीलम दी की स्कूटी में लग जाते थे।  लड़की वाले थे, काम कभी ख़त्म ही नहीं होता था।  ऊपर से मेहमानों की आवभगत। उफ्फ़ , थक जाते थे चिंटू जी।  नन्ही सी जान थे। लेकिन दिल में जो अरमान लिए इतनी दूर चले आये थे , उसके बारे में सोचते ही रिफ्रेश हो जाते थे और स्कूटी लेके उड़ने लगते थे।

और फिर  रस्में शुरू हुईं ।  चिंटू जी को नीलम दीदी  को गोद में लेके यहाँ से वहाँ रखना पड़ता था।  चालीस किलो के चिंटू जी और पैंसठ किलो की नीलम दीदी। फिर पंडितजी ने हालात की गम्भीरता को समझते हुए चिंटू जी को बोला कि आप बस दुल्हन को पकड़के रखिये, उठाने की ज़रुरत नहीं, भाई का हाथ लगना ही काफी है। लम्बी सांस छोड़ी चिंटू जी ने।

नयी शर्ट पहनके चिंटू जी पाँव ज़मीन पर नहीं रख पा रहे थे। उन्हें लगता कि सब उन्हें ही देख रहे हैं, और सबको लगता कि किसी हैंगर पर शर्ट डाल दी गयी है । और जब  बरात आयी तो जी हर उस जगह पहुँचे जहां टी आर पी  बढ़ाने का स्कोप था। ऐसा लग रहा था मानो पूरी शादी चिंटूजी के कन्धों से होके गुज़र रही है। दूल्हा दुल्हन हों न हों , विडियो कैमरे के सामने चिंटूजी ज़रूर दिखते थे, पसीना पोंछते हुए , गम्भीर मुद्रा में।

और फिर चिंटू जी की नज़र दूल्हे की बहन रुचिका पर ठहर गयी ।  चिंटू जी का मानना था कि बाकी लोग तो नीलम दी की ससुराल से आये होंगे पर रुचिका सीधी जन्नत से आयी है। अब तो बिना वॉकमैन के चिंटू जी के कानों में कुमार सानू के गाने बजने लगे थे।

मैं दुनिया भुला दूंगा आ आ आ तेरी चाहत में।

 तेरे दर पर सनम, चले आये एएएएए ।

लेकिन चिंटू जी ने इन सबके बीच अपना लक्ष्य नहीं  भुलाया था। उनकी नज़रें लगातार वॉकमैन को ढूंढती रहती थीं , जो किसी कारणवश दिख नहीं रहा था।  अब चिंटू जी चिंतित हो गए थे।  सोच रहे थे किसी न किसी तरह से तो मुद्दा उठाना पड़ेगा वॉकमैन के अगले वारिस का।

और फिर जब नीलम दीदी की विदाई का वक़्त हुआ तो चिंटू जी को पता चला कि उन्हें भी दीदी के साथ ससुराल लखनऊ जाना है।  लड़की का भाई शादी के वक़्त लड़की के साथ जाता है और बहन को ठीक ठाक ससुराल में जमाके वापस आता है।  चिंटू जी की जिम्मेदारियां ख़त्म होने का नाम नहीं ले रही थीं , लेकिन वे मन ही मन खुश थे , एक तो रुचिका को और देखने का मौका मिलेगा, और दूसरा वॉकमैन के बारे में बात करने का बहाना मिलेगा। नीलम दी को थोडा देर अकेला देखकर चुपके से उनके पास पहुंचे।

''दीदी मुझे तो आपके साथ लखनऊ आना है न ?"'
''हाँ चिंटू , तू मेरा भाई है न इसलिए । वैसे मैंने मना किया था कि ज़रुरत नहीं है तेरे स्कूल चल रहे होंगे तुझे लेट हो लाएगा पर कोई मेरी  सुनता ही नहीं !''
''अरे दीदी कैसी बात करती हो आपका भाई हूँ मैं , इतना हक़ भी नहीं मेरा आप पर!''
''थैंक्स चिंटू। '' दी खुश हो गयी थी।
''वैसे दीदी, मैं सोच रहा था , मैं तो वहाँ बोर हो जाउंगा, किसी को जानता भी नहीं न , और आप तो बिजी रहोगी, तो इसलिए आपका वो वॉकमेन था न , वो कुछ समय के लिए मैं ले सकता हूँ ?'
'' अरे ये भी कोई पूछने की बात है , बिलकुल रख लेना।  वहाँ अलमारी में रखा है , कैसेट भी रख लेना अपनी पसंद की। ''

पहला पड़ाव पार हो चुका  था।  लेकिन वहाँ जाकर तो दी को वापस करना पड़ेगा। शायद उनका दिल पिघल जाए।  कम से कम वॉकमैन की बात तो छिड़ ही गयी थी।

और चिंटू जी  ने पूरे रास्ते वॉकमैन के मज़े लिए।  बोल राधा बोल, सड़क, और भी कुछ कुछ कैसेट ले आये थे ।  रिचार्ज वाली बैटरी थी।

लेकिन ये ख़ुशी ज्यादा देर नहीं चली। लखनऊ पहुँचते ही रुचिका ने चिंटू जी के इर्द गिर्द मंडराना शुरू कर दिया था , मौका देखते ही पूछ लिया।
''चिंटू भइया , ये  वॉकमैन कितना प्यारा है , आपका है क्या ? मैं थोड़ी देर के लिए ले सकती हूँ ?''

चिंटू जी का दिल टूट चूका था। ''रुचिका जी ये वॉकमैन हमारा नहीं, आपकी भाभी का है। '' सच तो बोलना ही था।
''अरे वाह ! भाभीजी का मतलब हमारा ! मैं भी भाभीजी को बोलके आती हूँ कि चिंटू भइया के जाने के बाद ये हम  ले लेंगे ! आखिर इतना हक़ तो बनता है हमारा !''

चिंटू जी निराश से खड़े थे, वॉकमैन भी हाथ से निकल चुका  था और जन्नत की परी भी उन्हें भइया बना चुकी थी। 

और चिंटू जी नीलम दीदी के साथ दो दिन बिताके वापस निकलने लगे। ट्रेन आयी और वो अपनी बर्थ में बैठ गए।

ट्रेन  चल पड़ी थी। चिंटू जी सोच रहे थे , खाली हाथ आये थे खाली हाथ जा रहे हैं। अगली बार इन सब चक्करों में नहीं पड़ेंगे ।  अरे , बोर्ड की परीक्षा आ रही है भाई , मज़ाक है क्या ?

प्यास लग आयी थी ।  चिंटू जी ने पानी पीने के लिए बैग खोला। अंदर नीलम दीदी का वॉकमैन आराम फरमा रहा था , और साथ में एक कागज़।

''चिंटू भइया  , हमारी प्यारी भाभीजी ने हमें एक नया वॉकमैन दिया है तोहफे में , शायद उन्हें हमारी पसंद पहले से पता थी। अब ये वॉकमैन आपका हुआ !''

चिंटू जी की आँखें भर आयी थीं । उन्होंने इयरफोन कान में लगाया और यलगार की कैसेट डाल  दी।

2 टिप्‍पणियां:

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

अच्छी कहानी है. अपने वाकमैन की याद आ गयी. अब तो कभी कभी बच्चों का आईपौड मिल जाता है. लेकिन वर्षा जी, कोई लड्डू, चाय इत्यादि नहीं दिखा.

varsha ने कहा…

सही पहचाना आपने ! इसका कारण ये है कि चिंटू जी बहुत दुबले थे , कुछ खाते पीते नहीं थे !