सोमवार, 27 जनवरी 2014

राशि


राशि नाम था  उसका। और शौक था सबको राशिफल सुनाना।

 इसी साल अप्रैल में उसकी सगाई हुई थी अर्नब  के साथ। सगाई  क्या, पूरी दौड़भाग थी।  दोनों अलग अलग जात बिरादरी के थे, ऊपर से प्रांत  भी अलग। राशि गुजरात  से तो अर्नब बंगाल से।  प्रीमियर संस्थान से एम बी ए की पढाई कर  रहे थे , बड़ी मुश्किल से फाइनल की परीक्षा के बाद वक़्त निकाल पाये थे अपनी सगाई के लिए।  शादी की तारीख तो क्या वर्ष का कोई अता  पता नहीं था , दोनों को पहले अपने कैरियर पर ध्यान देना  था।  कैंपस सिलेक्शन तो हो गया था पर मंदी की मार अभी थमी नहीं थी।  कम से कम दो साल तो लगने ही थे कैरियर को ठीक ठाक आकार देने को। इसलिए सगाई करके रख दी थी।

उनका कॉलेज अहमदाबाद में था, और वहीं राशि का घर भी ।  पढ़ाई के दौरान अक्सर अर्नब सॅटॅलाइट रोड में राशि के घर जाया करता था , पहले क्लासमेट की हैसियत से, फिर दोस्त , फिर अच्छा दोस्त। राशि के माता पिता यूं तो जात बिरादरी में रिश्ता करने के पक्षधर थे, पर राशि के इतने बड़े कॉलेज में दाखिले के बाद उन्होंने किसी भी स्थिति का सामना करने का मन बना लिया था। आखिर उनकी बिरादरी में राशि के बराबर या उससे अच्छे लड़के तो मिलने से रहे। अब तो पूरा भारत उन्हें अपनी ही बिरादरी का लगता था। राशि के अनेक सहपाठी जो देश के कोने कोने से आये होते थे, अक्सर उसके घर आ जाया करते थे।  राशि का घर अहमदाबाद में होने के बावजूद उसे हॉस्टल में रहना पड़ता था , बीच बीच में वक़्त निकालके घर आती रहती थी।  पर नवरात्रि हो या उत्तरायण , राशि और उसके दुनिया भर के दोस्त उसके घर धमक जाते थे। आंटी के हाथ का ऊंधीयू और अंकल के साथ पतंगबाजी का मजा ही कुछ और था। कई लड़के तो सिर्फ राशि से एक साल छोटी बहन के दर्शन करने आते थे जो कॉलेज के साथ साथ मॉडलिंग में हाथ आजमा रही थी और अक्सर रैंप शोज में दिख जाती थी।

धीरे धीरे राशि के मम्मी पापा को समझ आ गया था कि बाकी दोस्तों में से अर्नब कुछ ख़ास है।  और फाइनल इयर आते आते दोनों ने अपने अपने घर बात कर ली। दोनों घरवालों को कोई ख़ास दिक्कत नहीं थी, सिवाय इसके कि रोज़ माछ भात खाने वाले अर्नब  के घरवालों के बीच शुद्ध शाकाहारी राशि कैसे  एडजस्ट कर पायेगी! अर्नब के पापा ने तो बड़ी मासूमियत से बोला था, ओरे बाबा फिश तो ''भेज''होता है, नॉनभेज तो मोटोन होता है !  राशि के पापा थोडा घबरा गए थे पर राशि ने इशारे से समझा दिया था।

 हालांकि अर्नब बारहवीं के बाद घर से दूर रहने के कारण अब तक घाट घाट का पानी पी चुका  था और उसकी ज़िन्दगी में और भी तरह के आहार जुड़ चुके थे, इसलिए ये कोई ख़ास चिंता की बात नहीं थी।

सगाई के बाद दोनों अपने अपने शहर चले गए।  अर्नब को मुम्बई की एक कंपनी में अच्छी खासी नौकरी मिली थी और राशि को बंगलौर में। दोनों को फिलहाल कोई रास्ता नहीं दिखता था शादी करके एक साथ रहने का , बस मेहनत किये जाते थे, वही उनके हाथ में था।

एक साल गुजर गया , और ज़िन्दगी के अगले लक्ष्य के बारे में सोचने का वक़्त आ गया।  उनके अनेक क्लासमेट्स ने दूसरी कम्पनियों में अवसर तलाशने शुरू कर दिए थे , इससे उनका पैकेज थोडा बढ़ता रहता था , एक ही कंपनी में पड़े रहने से भाव कम होना शुरू हो जाता था, और फिर यही वक़्त तो था जोर शोर से आगे बढ़ने का , फिर तो शादी करके एक जगह बैठना ही था।

लेकिन पिछले एक साल के अनुभव से अर्नब और उसके अधिकाँश दोस्तों को एक चीज़ परेशान करने लगी थी। समस्या ये थी कि उनका पैकेज तो निस्संदेह आकर्षक था , पर जितना वक़्त और दिमाग वो लोग अपनी नौकरियों में लगा रहे थे और जितना मुनाफा करके अपनी कम्पनियों के मालिकों को दे रहे थे , उस हिसाब से उनकी आय कुछ भी नहीं थी।  आने वाले दिनों में इस सीमित आय के साथ दुनिया भर के लोन्स की किश्तें जुड़ने वाली थीं।  खर्चों की कोई सीमा नहीं थी , लेकिन आय की बढ़ोत्तरी की एक सीमा थी। उनकी जीतोड़ मेहनत  के बल पर उनको तो चार छ परसेंट इन्क्रीमेंट मिलता था पर उनकी कम्पनियों के मालिक अमीर होते जाते थे,। मालिक जो अधिकाँश स्नातक भी नहीं होते थे, बस पुश्तैनी कम्पनियां चला रहे थे ! वो तो इतना पढ़ लिख के बस सफ़ेद  कालर वाले मजदूर बनके रह गए थे। कई बार तो मीटिंग्स के दौरान ये मालिक लोग उन्हें ऐसी ऐसी बातों पर हड़का देते थे जो वास्तव में उन कम पढ़े मालिकों की सीमित  समझ से बाहर होती थी। फिर इन लोगों को समझ में आता था कि शायद भैंस के आगे बीन बजा दी गयी है।

अर्नब सोच रहा था , शायद वक़्त आ गया था मजदूर से मालिक बनने का। अपनी प्रतिभा पर उसे कोई शक नहीं था , शक था तो अपनी किस्मत पर। अगर सिर्फ मेहनत करके लोग बड़े बिज़नेसमैन बन जाते तो
बात ही क्या थी।  निस्संदेह किस्मत एक बड़ा फैक्टर थी, एक नयी राह पर आगे बढ़कर सफलता पाने के लिए।

अर्नब और उसके मुम्बई के  दो दोस्तों ने मिलकर सोचा कि उन्हें एक बार रिस्क तो लेना चाहिए।  अगर सही राह मिल गयी तो चलने में क्या हर्ज़ है , कम से कम एक मौका तो दे ही सकते हैं ज़िन्दगी को। उसके बाद तो फिर शादी और बच्चे, फिर थोड़ी ये सब कर पाएंगे। और अगर किस्मत खराब भी निकली तो देर सवेर दूसरी नौकरी तो मिल ही जायेगी, बस  पैकेज थोडा इधर उधर हो जायेगा। प्रीमियर कॉलेज से एम बी ए करने का यही  तो फायदा था। भूखे तो नहीं मरेंगे।

अर्नब को चिंता थी तो राशि की। उसके घरवाले उनकी जल्द शादी करवाना चाहते थे। उनकी चिंता भी जायज थी , सगाई और शादी के बीच का वक़्त बहुत लम्बा भी नहीं होना चाहिए।  पर अर्नब जिस राह पर चलना चाहता था उसमें उसे थोडा वक़्त चाहिए  था अपने आपको स्थापित करने का। उसने राशि से बात की और अपनी इच्छा जाहिर की। राशि खुद इस दौर से गुजर रही थी और ये चीज़ समझ सकती थी। उसे भी अर्नब की प्रतिभा पर पूरा भरोसा था। उसने अर्नब को आश्वासन दिया कि वो अपने घरवालों को समझा लेगी और वो लोग उसे पर्याप्त वक़्त देंगे अपने कैरियर पर ध्यान देने का।  ये सुनकर अर्नब को बहुत अच्छा लगा था।

बस फिर क्या था।  तीनो दोस्तों ने मिलकर सम्भावनाएं तलाशनी शुरू कर दीं। कुछ ही वक़्त में उन्होंने एक नयी कंपनी की नींव डाल  दी और अपने पुराने संपर्कों के ज़रिये छोटा मोटा काम तलाशना शुरू कर दिया। अर्नब के दिल में अब भी एक डर  रहता था कि इतनी मेहनत के बाद अगर किस्मत ने साथ नहीं दिया तो फिर क्या होगा।  कंपनी की नौकरी वो छोड़ चुका  था।  इतना बड़ा रिस्क लेकर उसने न सिर्फ अपनी बल्कि राशि की ज़िन्दगी को भी अधर में डाल दिया था।  क्या ये बेहतर नहीं होता कि वो बंगलौर में दूसरी नौकरी  ढूंढ लेता और वो दोनों हंसी ख़ुशी  साथ रहते।  दो लोगों की आय क्या कम होती घर चलाने के लिए? पर बात सिर्फ इसकी नहीं थी , बात थी अपनी प्रतिभा को उचित अवसर देने की।  और संयोग से राशि ये बात समझती थी।

अर्नब की नयी कंपनी को छोटे मोटे काम मिलने शुरू हुए।  वो लोग काफी उत्साहित थे। जी जान से काम करते थे।  छोटी छोटी बातों पर पूरा ध्यान देते थे। क्लाइंट्स उनके काम से खुश भी हुए थे और ज्यादा काम देने का आश्वासन भी दिया था।  पर हफ़्तों से महीने गुजर जाते और उन्हें यही छोटे मोटे प्रोजेक्ट्स  मिलते रहते।  बड़ा काम मिलने का  बस आश्वासन मिलता था।  अर्नब और उसके दोस्तों ने उत्साह नहीं छोड़ा था , वो लोग जानते थे सफल होना इतना आसान नहीं। पीछे पड़े रहना पड़ता है तब जाकर एक स्वर्णिम मौका मिलता है। इसलिए वो लोग लगे रहते थे।  हाँ लेकिंन अब पैसों की चिंता सताने लगी थी।  अभी उनकी आय इतनी नहीं हुई थी कि शादी करके घर बसाया जा सके। अर्नब के दिल में जो किस्मत का खौफ था वो अब सामने आने लगा था। अगर किस्मत ने साथ नहीं दिया तो? क्या राशि के मम्मी पापा खुश होंगे अपनी बेटी का हाथ उसके हाथ में देकर जो फिलहाल उससे आधा भी नहीं कमा पा रहा था।  कैसे खुश रख पायेगा वो राशि को?

उसकी ये चिंता बातों बातों में राशि तक भी पहुँचने लगी , और तब राशि ने स्थिति को संभालकर अर्नब का हौसला बढ़ाना शुरू किया। जिस दिन उसकी किसी बड़े क्लाइंट से मीटिंग होती उससे पहले राशि उसे उसका साप्ताहिक भविष्यफल पढ़के सुनाती। आपके प्रयास सफल होंगे , वरिष्ठ अधिकारियों के बीच ख्याति बढ़ेगी , नए अवसर मिलेंगे। ये सब सुनके अर्नब को अपनी किस्मत पर यकीन होने लगता और वो दुगुने उत्साह से काम पर जाता। ये सिलसिला चलता रहता और राशि के साप्ताहिक भविष्यफल अर्नब के लिए उम्मीद की नयी किरण लेकर आते। भले ही बाद में अधिकाँश बातें गलत निकलती पर मन के किसी कोने में अर्नब को अब अपनी किस्मत पर यकीन सा होने लगा था , लगता था कि प्रयास करते रहेंगे तो आज नहीं तो कल किस्मत एक मौका ज़रूर देगी। 

एक  साल बीत गया , और अर्नब को थोड़े बेहतर प्रोजेक्ट्स  मिलने शुरू हुए। राशि के प्रोत्साहन और साप्ताहिक राशिफलों की बदौलत अब अर्नब की कंपनी ने एक पहचान  बना ली थी , मार्किट में उनका नाम हो गया था।  हालांकि कोई बड़ा काम अब तक नहीं मिला था।  लेकिन अब अर्नब ने फैसला कर लिया था कि राशि को अधिक देर तक इंतज़ार नहीं करवाएगा।  अब उसकी कंपनी से ठीक ठाक आमदनी हो जाती थी । उसने राशि से अपनी शादी की तारीख  निकलवाने को कहा।  राशि बहुत खुश थी। उसने घर पर ये बात बतायी और दोनों के परिवार वालों ने मिलकर अगले महीने की  एक तारीख  तय कर दी। वक़्त बहुत कम था , कार्ड्स छपने थे, बाँटने थे , शौपिंग करनी थी।  राशि एक सप्ताह पहले छुट्टी लेकर घर आ गयी।

रविवार  का दिन था। दोनों की फ़ोन पर लम्बी बातों का दिन।
"क्या कहती है मेरी राशि इस हफ्ते ?   बोर हो रहा था सोचा यही पता कर लूं। ""
" हा हा, मज़ाक उड़ा  रहे हो मेरे राशिफलों का !""
"नहीं नहीं , तुम्हारे राशिफलों की बदौलत ही तो आज तुमसे शादी करने की हालत में हूँ , वरना  किस्मत से तो यकीन ही उठता जा रहा था। ""
""अच्छा ? वैसे इस हफ्ते लिखा है नए आयाम खुलेंगे !""
""कौन सी दिशा में खुलेंगे ये लिखा है ? वैसे भी शादी करके तो खुल ही रहे हैं आयाम !"
"और क्या! ये कोई छोटा आयाम है ! अगले हफ्ते तुम मेरे दरवाजे पर दस्तक दे रहे होंगे। "
"वो तो अभी भी दे रहा हूँ। ""
''मतलब?''
''मतलब दरवाजा खोलो , कब से बजा रहा हूँ पर तुम हो कि फ़ोन पर लगी हुई हो !"'
राशि को कुछ समझ नहीं आ रहा था।  तब तक उसकी मम्मी ने दरवाजा  खोला। सामने अर्नब खड़ा था। मम्मी के पैर छूकर अंदर आ गया।

""सब ठीक तो है बेटा ? आप अचानक यहाँ ? राशि ने भी नहीं बताया मुझे। ""

''राशि को खुद नहीं पता था ! सरप्राइज है मम्मीजी !""
''ओहो! तुम बैठो राशि  के साथ मैं पानी लेके आती हूँ।''
''नहीं आंटी पानी वानी बाद में । पहले आशीर्वाद दीजिये। आपके बेटी की भविष्यवाणियां अब जाकर सच हुई हैं ! बड़ा काम मिल गया है हमें , पूरे पांच करोड़ का !""
''सच! वाह बेटे ये तो बहुत ख़ुशी की बात है , है न राशि ? मैं मिठाई लेके आती हूँ और तुम्हारे पापा को भी बताती हूँ , छत पर गए हैं पतंग उड़ाने!''
''अंकल नहीं सुधरेंगे ! रिटायरमेंट के मजे ले रहे हैं !"'
आंटी हँसते हुए अंदर चली गयी।

 राशि अब भी मुंह खोलकर खड़ी  थी। न तो अपनी आँखों पर विश्वास होता था न कानों से सुनी बात पर।अर्नब उसे देखकर हँस रहा था।

''मैडम मैं ये खबर सुनाने के लिए पहली फ्लाइट लेके अहमदाबाद आया हूँ और आप हैं कि। ''
राशि को होश आया , अर्नब को अपने कमरे में लेके गयी और चेयर  पर बिठाया।

''तुम सच बोल रहे हो ? पाँच करोड़ का प्रोजेक्ट ? ""
''हाँ ! कल ही टेंडर खुला  था पर मैंने सोचा फ़ोन के बदले यहाँ आकर तुम्हें बताऊँ।  इतनी बड़ी खबर है , तुम्हारा रिएक्शन देखना था।''
राशि चेयर पर बैठी रो रही थी , ज्यादा ख़ुशी भी सम्भाली नहीं जाती थी। अर्नब ने उठाया और गले लगा लिया।

अंकल शायद छत से आ गए थे। आवाज आ रही थी। दोनों बाहर आ गए ।  आंटी ने चाय भी बना दी थी। मिठाइयों की प्लेट उनका इंतज़ार कर रही थी।  अर्नब ने अंकल का भी आशीर्वाद लिया। सब लोग हंसी ख़ुशी बातें कर रहे थे। समधियों को भी फ़ोन से बधाई का आदान प्रदान हो गया।

''वैसे राशि तुम कौन से अखबार से पढ़कर मेरा राशिफल बता रही थी ज़रा दिखाओ तो ?''

राशि इधर उधर देख रही थी मानो कुछ ढूंढ रही हो । राशि की मम्मी को हँसी आ गयी।
''कुछ होगा तो दिखाएगी न ! ''
''मतलब मम्मीजी  ?''
''मतलब बेटा ये अपने मन से कुछ भी बोलती रहती है , कोई अखबार नहीं होता इसके हाथ में! मुझे तो लगता है इसे अब तक तुम्हारी राशि भी नहीं पता , ज़रा पूछो तो इससे !''
अर्नब राशि को देख रहा था , ''हाँ ज़रा बताओ तो मेरी राशि कौन सी है ? तुम्हें मालूम तो है न ?''

राशि हँसने  लगी , '' मैं ही तो हूँ तुम्हारी राशि!''

अर्नब के चेहरे पर बड़ी सी मुस्कान तैर गयी।

4 टिप्‍पणियां:

अनुपम अग्रवाल ने कहा…

बड़ी अच्छी कहानियाँ हैं. अभिव्यक्ति से आपका लिंक मिला. आपकी कहानी में कहीं ना कहीं कुछ ना कुछ खाने का होता है. आइस्क्रीम, टोमॅटो सूप, लड्डू....

varsha ने कहा…

आपने बिलकुल सही पहचाना अनुपम जी। दरअसल शुरू शुरू में मेरे किरदार चाय बहुत पीते थे , इसीलिए मैंने बाद कि कहानियों में बदलाव के लिए आइस क्रीम और टोमेटो सूप पिला दिया :)

Kailash ने कहा…

"शौक था सबको(?) राशिफल सुनाना" ये पंक्ति भ्रमित करती है। "अर्नब ही तो उसका 'सब' था", ये तर्क नहीं माना जाएगा। :D
और भावी कहानियों की तरह ये भी प्यारी है।

varsha ने कहा…

:D arnab ke aane se pahle waale 'sab'!