बुधवार, 8 जनवरी 2014

छाता


"पार्लर पूछ रही हूँ यार , नाई  की  दुकान नहीं ! ""
""हाँ तो पार्लर ही बता रही हूँ। सब उसी के पास जाते हैं।  "
""अच्छा ? मतलब लड़का थ्रेडिंग करेगा , फेशियल करेगा ?""
""हाँ और  बहुत अच्छा करता है, एक बार चली जाना, खुद देख लेना। जस्सू भी  वहीं जाती है। ""

अंजू जल्दी से निकल गयी, ऑफिस थोडा दूर था, बस पकड़नी पड़ती थी ।  पर मीनू को अब तक उसका कहा  हजम नहीं हो रहा था, बड़े शहरों में तो सुना था , बम्बई दिल्ली में, पर  इस छोटे से शहर में भी लड़के ब्यूटी पार्लर चला रहे हैं, और लडकियां जा भी रही हैं उनके पास। वाह!

मीनू चाय लेने  ऊपर मकानमालकिन आंटी के घर चली गयी।  सुबह सुबह सात बजे एक वही उठकर चाय पीती थी, और सब लडकियां बिस्तर में घुसी रहती थीं। उनका काम भी क्या था , मस्ती करने आयी थीं।  आस पास के छोटे बड़े कस्बों से आयी थीं। निकिता एयर होस्टेस का कोर्स कर रही थी, जसमीत उर्फ़ जस्सू इंग्लिश बोलने चालने  का कोर्स करने, एन आर आई के साथ शादी होनी थी एक दो महीने में। पूनम प्राइवेट से एम् ए  कर रही थी, साथ में कंप्यूटर क्लास जाती थी ।  इन सबको क्या करना था जल्दी उठकर।  आराम से गप्पें मारते हुए उठते थे , पूरा दिन मस्ती करते थे, नयी नयी नेल पोलिश लगाते थे , बालों में नए नए कलर करते थे , पैसों की भी कमी नहीं थी और वक़्त की भी नहीं।  लेकिन मीनू के पास थी, दोनों की। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर थी, साथ में आगे की पढाई के लिए तैयारी कर रही थी। पर तैयारी हो नहीं पाती थी , छोटे से दो कमरों के घर में जगह ही नहीं मिलती थी शान्ति से पढ़ने के लिए। 

आंटी बाहर बरामदे में बैठकर चाय पी रही थी , मीनू किचन से चाय लेकर आंटी के साथ बैठ गयी। 

""बहुत ठण्ड है बेटा , अच्छे से रहा करो कान बांधकर। ""
""हाँ आंटी , टाइम ही नहीं मिलता बाज़ार जाकर स्कार्फ़ लाने का। अचानक से ठण्ड बढ़ गयी। ""
""आज ले आना। अपने लिए टाइम निकाला करो, तुम ठीक रहोगे तब तो  बाकियों को ठीक रख पाओगे   ""
""बात तो सही है आंटी।  ""
मीनू को आंटी के साथ बैठना अच्छा लगता था, बहुत हिम्मतवाली थी आंटी।  उनके पति उन्हें छोड़कर गाँव रहते थे , बेटा नाकारा सा घर में बैठा रहता था , बहू रूठकर मायके में बैठ गयी थी ।  बेटी की शादी हुई थी पर कुछ मानसिक समस्या के कारण पति ने उसे यहाँ छोड़ दिया था। नीचे के दो कमरों से मिलने वाले किराए से घर चलता था ।  लेकिन इतने बड़े समस्याओं के पोटले को सर पर ढोकर  आंटी के मुंह पर शिकन तक नहीं आती थी। मुस्कुराती रहती थीं, और नसीहतें देती रहती थीं। बस यही कारण था कि मीनू अक्सर आंटी के साथ बैठ जाया करती थी। आंटी भी उसके साथ अपने सुख दुःख बांटती थी , बाकी सब लड़कियों में एक वही तो थी जो आंटी की बात समझ सकती थी।  संघर्ष चाहे जैसा भी हो, दो संघर्षरत व्यक्ति देर सवेर दोस्त बन ही जाते थे।

""अच्छा आंटी  आपने बिजली वाले को बुलाया आज?""
""बिजली वाला? क्यों बेटा ?"" आंटी फिर भूल गयी थीं ।
""वो मैंने बोला था न आपको, वो छोटा वाला कमरा जो हमारे कमरे से लगा हुआ है , वहाँ लाइट लग जाती तो मुझे थोडा अलग बैठकर पढ़ने की जगह मिल जाती।  "" मीनू बहुत दिनों से आंटी को बोल रही थी इस बारे में।  उनके कमरे के साथ एक छोटा सा कमरा लगा हुआ था जो अभी स्टोर रूम की तरह इस्तेमाल होता था।  उसमें थोड़ी सी जगह थी बैठने की। वहीं बैठकर मीनू शांति से पढ़ना चाहती थी।  मीनू ने बोला भी था कि बिजली लगाने का जो खर्च होगा वो दे देगी, पर आंटी पता नहीं क्यों टाल रही थीं।
""ओहो बेटा मैं रोज भूल जाती हूँ।  आज पक्का बुला दूँगी। मुझे मालूम है तुझे पढ़ना है बेटा। ""
""ठीक है आंटी, मैं चलती हूँ।  ""चाय ख़त्म हो गयी थी।

नीचे आकर मीनू जल्दी से तैयार हुई, रात में बनाये लेक्चर के नोट्स पर नज़र डाली, थोडा बहुत बदलाव किया , फिर नहाने घुस गयी।  देर हो रही थी , बस पकड़नी थी। बस स्टॉप जाने  में ही दस मिनट लग जाते थे। 

तैयार होकर निकली तो देखा बारिश शुरू हो गयी थी, पर अब कुछ नहीं हो सकता था, उसका पुराना छाता पिछले साल टूट गया था। मौसम की दूसरी बरसात थी।  कल भी मीनू भीग गयी थी पर बाज़ार जाकर नया छाता लाने का वक़्त ही नहीं मिला।  आज फिर भीगना था। आज तो किसी भी हालत में बाज़ार जाना ही पड़ेगा, मीनू सोच रही थी।

कॉलेज पहुँचते पहुँचते मीनू बुरी तरह भीग चुकी थी , और  सबसे बड़ी समस्या ये थी कि पहला लेक्चर उसी का था।  इस हालत में फाइनल इयर की क्लास लेना मतलब लड़कों की गन्दी फब्तियां झेलना जो उनकी फुसफुसाहट से समझ आ जाती थी। मीनू का दिमाग तेज़ चल रहा था , किसी तरह पहला लेक्चर टल जाता।  फिर उसकी नज़र अमन पर पड़ी।
""अरे अमन तुम बैठे हो, लेक्चर नहीं जा रहे ? ""
""नहीं मेरा पहला  लेक्चर फ्री है।  ""
""और दूसरा कौन सी क्लास में है ?"
""फाइनल इयर में, क्यों ?""

मीनू ने राहत की सांस ली । अमन अपने सब लेक्चर अच्छे से तैयार करके आता था।  कुछ दिनों से वो दोनों साथ में काफी वक़्त बिताते थे, खाली लेक्चर्स में , लंच में। एक अपनापन सा महसूस होने लगा था उसके साथ ।  इतनी सी मदद के लिए तो वो पूछ ही सकती थी।

""असल में मेरा पहला लेक्चर है पर मैं इतनी भीग गयी हूँ कि.""
""हाँ भीग तो तुम गयी हो, आज शाम को छाता ज़रूर ले लेना। अपने लिए वक़्त निकाला करो।  ""
""हाँ पक्का ले लूंगी पर अभी तुम थोड़ी हेल्प कर दोगे प्लीज? पहला लेक्चर तुम ले लोगे?""
कुछ पल का मौन।
""आई एम्  सॉरी मीनू, कल मैं लेक्चर की तैयारी कर नहीं पाया , अभी बैठकर वही कर रहा था। मैं पहला लेक्चर नहीं ले पाउँगा।  ""

मीनू सोच रही थी , क्या हो गया आज कल के लड़कों को, ऐसी हालत देखकर भी दिल नहीं पसीजता, दया नहीं आती।  लेकिन  गलती तो उसी की थी , क्यों नहीं ले लिया अपने लिए छाता जब कल से बारिश शुरू हो गयी थी, क्या हुआ अगर शाम को  लौटते लौटते अँधेरा हो गया था और उसका सर दर्द से फट रहा था।  अपनी इज़ज़त तो अपने ही हाथ मैं है।

मीनू जल्दी से नोट्स लेकर फाइनल इयर की क्लास में घुस गयी। अभी अभी दिल टूटा था। इस लेक्चर के बाद दो कप चाय पियेगी , नहीं टोमैटो सूप। मशीन की चाय में बिलकुल टेस्ट नहीं रहता।

लेक्चर ख़त्म हुआ , मीनू बाहर निकली, अमन अंदर घुसा।  और अगले पल वो कैंटीन में टोमैटो सूप पी रही थी।

शाम को एक पार्टी थी ।  उसकी तैयारियां भी करनी थी ।  मीनू को पार्लर गए सदियाँ बीत गयी थीं।  भोंहें जंगल की तरह फ़ैल गयी थीं।  आज शाम को तो किसी भी हालत में पार्लर जाना  ही था , वर्ना साथी लेक्चरर के बीच उसकी हंसाई हो जायेगी।  पिछली बार सब लोग कितने अच्छे से तैयार होकर आये थे पार्टी में, और वो ऐसे ही पहुँच गयी थी।  वहीं से उसने सबक लिया था।  ज़िन्दगी में न चाहते हुए भी कितने ऐसे काम करने पड़ते हैं, वर्ना उसका बस चलता तो पार्टी में ही नहीं जाती।

कॉलेज ख़त्म हुआ, और वो बस में लटकती हुई घर पहुँच गयी।  बिलकुल वक़्त नहीं था।  बाज़ार जाना था , छाता लेना था, स्कार्फ़ लेना था , पार्लर जाना था।  एन आर आई दुल्हन जस्सू ने  टोका , क्या बात है मीनू दी इतनी हड़बड़ी क्यों?  मीनू को बहुत अच्छा मानती थी। बहुत इज़ज़त करती थी उसकी। इंजीनियरिंग कॉलेज में लेक्चरर होना वहाँ की लड़कियों के लिए बड़ी बात तो थी।  मीनू ने पार्टी वाली  बात बतायी।
""कौन सा सूट पहनेंगी आप ?""
""ये वाला। "" मीनू ने दिखाया।
""अरे ये तो रोजमर्रा वाला है।  कोई स्पेशल सूट नहीं है आपके पास ?""
""नहीं यार टाइम ही नहीं खरीदने का।  हाँ एक सूट है भैया की शादी में पहना था , मेहँदी में। ""
""दिखाइये न , फिर बताती हूँ। ""
मीनू ने सूटकेस खोला। एकमात्र चमक दमक वाला सिल्क का सूट था उसके पास। सौभाग्य से जस्सू को वो पसंद आ गया, वरना  उसकी शौपिंग लिस्ट में एक चीज और जुड़ जाती।

""अच्छा आपके  पास इससे मैचिंग कड़े और झुमके वगैरह हैं ?""
मीनू मायूस हो गयी।  मतलब ये सब भी खरीदना बाकी था !
""चिंता मत कीजिये  मेरे पास हैं। आप  पार्लर से आइये  फिर मैं आपको  तैयार करती हूँ। ऐसा तैयार करूंगी कि सबको पार्टी में सिर्फ आप  ही दिखेंगी ।  इतनी सुन्दर हैं आप, बस अपने को टाइम नहीं देतीं। "

मीनू खुश हो गयी।  सुबह से एक  बार दिल टूटा था तो एक बार तारीफ़ भी हुई थी। ज़िन्दगी खट्टी मीठी थी, टोमैटो सूप की तरह।

सूटकेस वापस रखने गयी तो  उसका ध्यान स्टोर में रखे नए सूटकेस की तरफ पड़ा।
""ये किसका है जस्सू ?""
""अरे हाँ  आपको बताना भूल गयी, स्टोर में एक नयी लड़की  शिफ्ट हो रही है।  अभी आंटी के साथ आयी थी रूम देखने । शाम तक  पलंग वगैरह आ  जाएगा। ""

तड़ाक। ये दूसरी बार था।  गम ख़ुशी पर भारी पड़  रहा था।

 अब मीनू समझी कि क्यों आंटी ने अब तक बिजली वाले को नहीं  बुलाया था। उनकी भी समस्या थी , घर का  खर्च चलाना था।  जितनी  ज्यादा लडकियां उतना अच्छा।

अब मीनू ने  निश्चय कर लिया था।  अगले महीने से दूसरा घर ढूंढ लेगी, यहाँ तो उसका कुछ नहीं हो सकता। पर वो ये सब करेगी कब ? वक़्त कहाँ है ?

मीनू जल्दी से निकल गयी, अभी बहुत काम पड़ा था।

बाज़ार जाकर मीनू ने पहले ए टी एम् से पैसे निकाले  फिर अपने ज़रुरत की खरीदारी की।  स्कार्फ़ वाली दूकान से दो तीन ठीक ठाक सूट ले लिए जल्दी सूखने वाले।  कॉटन के सूट सूखते ही नहीं थे।

हलकी सी बारिश अब भी हो रही थी , पर अब मीनू के पास छाता था।  सब खरीदारी करके वो लौटने लगी तो उसी पार्लर पर नज़र गयी जिसका जिक्र अंजू ने किया था। आस पास कोई दूसरा पार्लर नहीं था , मीनू के पास वक़्त भी नहीं था।  चुपचाप अंदर घुस गयी।

मिलन नाम था उस पार्लर का , और उसके सबसे चहेते व्यक्ति का भी।  अभी वो किसी लड़की का फेशियल  कर रहा था जो लगभग होने ही वाला था।  मीनू आश्वस्त हो गयी।  लडकियां आती हैं यहाँ। लेकिन  इसके बाद सिर्फ वही अकेली थी।  बारिश के मौसम में पूरे शहर की लडकियां घर में दुबकी  हुई थीं।
मीनू का नंबर आया, और वो चेयर पर लेट गयी।  सुबह से टूटे दिल के टुकड़े लिए दौड़ते भागते अब जाकर फुर्सत मिली थी, मीनू ने आँख बंद कर ली।
" आप कितने दिनों बाद पार्लर आ रही हैं ?""
"दो महीने हो गए ।  वक़्त ही नहीं मिलता। "" अंतिम बार वो अपने पुराने शहर में गयी थी।
""वक़्त निकाला कीजिये ।  " सुबह से चौथी बार किसी ने उसे ये कहा था।  पर इस बार मान लेने को जी करता था । मिलन ने बहुत नज़ाकत से उसकी घनी भोंहों को सुन्दर आकार दिया था, और अब वो उसके माथे पर हलके हाथों से मसाज कर रहा था।

मीनू का दर्द घुलता जा रहा था। जो  सुकून उसे उसकी प्रिय आंटी, उसके दोस्त अमन और न जाने कौन कौन न दे पाये थे वो सुकून एक हेयरड्रेसर  के हाथों का स्पर्श दे रहा था। मीनू मन ही मन सोच रही थी , इसकी बात नहीं टालेगी।

 बाहर निकलकर  ऑटो किया और घर पहुंची।  जस्सू अपने साजो सामान के साथ उसका इंतज़ार कर रही थी।

""कितने बजे जाना है मीनू दी ? उस हिसाब से आपको तैयार करूँ। "
""सात बजे से है पर मुझे कोई जल्दी नहीं। तू आराम से कर। "" मीनू ने आज ही सबक सीखा था।
""ठीक है दी आप सूट पहनके यहाँ बैठ जाइये। ""

आठ बजे मीनू पार्टी में पहुंची, और वाकई जैसा जस्सू ने वादा किया था, सबकी निगाहें उस पर अटक गयीं। मीनू को इन सब की आदत नहीं थी , चुपचाप जाके स्नैक्स और टोमेटो सूप लेके एक चेयर  पर बैठ गयी।

अमन आस पास मंडरा रहा था , शायद उसके बदले रूप को हजम करने की कोशिश में।  थोड़ी देर में पास वाली चेयर पर आकर बैठ गया।

""हैलो मीनू!""
""हैलो। ""
""तुम्हारी तबियत तो ठीक है न , आज सुबह कितनी भीग गयी थी ? सर्दी तो नहीं हुई ? मुझे बहुत फ़िक्र हो रही थी। और तुमने छाता लिया कि नहीं ? मेरे पास  दो हैं मुझसे......""

मीनू ने बीच में बात काट दी , ""टोमैटो सूप पियो, अच्छा बना है । ""



4 टिप्‍पणियां:

Ranjeet Singh ने कहा…

बहुत अच्छा लगा।

varsha ने कहा…

dhanyawaad ranjit ji!

Kailash ने कहा…

Tch tch बेचारा अमन!

varsha ने कहा…

Pahla lecture le leta to bechara na rahta :)