शुक्रवार, 6 दिसंबर 2013

आखिरी सैलाब


दरवाज़ा जोर से बजा ।
"आ रही हूँ  बाबा , तोड़ेगी क्या ?" नीतू अंदर से चिल्लाई। जानती थी ये काम पल्लवी  के अलावा कोई नहीं कर सकता।

""हाँ बोल, क्या बात है ?"" नीतू ने दरवाज़ा खोला।
""आइसक्रीम खाने चलेगी?"
""अभी?
""चल ना मैं खिला रही हूँ।  तू बस स्कूटी निकाल ले। सिटी सेंटर जायेंगे। "
""सिटी सेंटर? आइसक्रीम खाने के लिए? यहाँ पास में भी तो मिलती है!"
""अरे यार तुझे चलना है कि नहीं? वहाँ अच्छा आइस क्रीम पार्लर है। और गाडी  मैं चलाउंगी
चिंता मत कर। "
नीतू अभी स्कूटी चलाना सीख ही रही थी।  लाइसेंस भी नहीं बना था।

""ठीक है। थोडा तैयार होने देगी या ऐसे ही चल पडूं ?" नीतू को अब भी अचानक का यह प्लान हजम नहीं हो रहा था, पर पल्लवी पूरे मूड में थी।
""पाँच मिनट में तैयार हो जा। ज्यादा टाइम मत लगाना। "

थोड़ी देर में वो  स्कूटी में बैठकर निकलने लगे। हल्का सा अँधेरा छा  रहा था। लेडीज  हॉस्टल के बाहर की स्ट्रीट लाइट्स जलने लगीं थी। हॉस्टल की बाकी लडकियां  उन्हें जाते  हुए घूरकर देख रही थीं। थोड़ी देर में उनकी स्कूटी  भीड़भाड़ भरी सड़कों में दौड़ने लगी । 

""अचानक से क्या सूझा तुझे?""
""ऐसे ही यार मूड ठीक नहीं था सोचा थोडा घूम फिर लेंगे । ""
कुछ दिनों से पल्लो का मूड ठीक नहीं था।  ये बात नीतू भी जानती थी।

लगभग दो  महीने पहले दोनों नयी कंपनी ज्वाइन करके इस हॉस्टल में शिफ्ट हुए थे , और पास पास का कमरा होने के कारण धीरे धीरे उनकी बातचीत होने लगी जो अब अच्छी दोस्ती में बदल गयी थी।

पहली मुलाक़ात से ही नीतू को समझ आ गया था कि पल्लवी एक ज़िंदादिल लड़की है।  पूरे बैच में कुल चार लडकियां थीं जिनमें से बाकी दो लडकियां अपने तक ही सीमित रहती थीं और अधिकाँश वक़्त अपने बॉयफ्रेन्डस् के साथ फ़ोन पर ही गुजारती थीं।  सिर्फ खाने के वक़्त मेस में उन सबकी आपस में भेंट होती थी। 

पर पल्लो के साथ नीतू की अलग ही दिनचर्या बन गयी थी। दोनों सुबह उठकर मॉर्निंग वाक करते थे, फिर सामने  वाली दुकान  में चाय पीते थे। उसके बाद तो ऑफिस जाने की तैयारियां करनी होती थीं।  फिर शाम को वापस उसी दुकान  में चाय पीते थे। उसके बाद या फिर कॉमन रूम में जाकर टीवी देखते हुए  टीटी खेलते थे या फिर कमरे में आकर गप्पें मारते थे।

इतने में भी उनका  मन नहीं भरता था। कॉलेज के बाद की नयी नयी नौकरी और ज़िन्दगी थी। कॉलेज के भुखमरी वाले दिनों के बाद अचानक से जेब में पैसे आ गए थे।  इसलिए शुक्रवार को जो कोई भी मूवी लगी हो उसे देखना फ़र्ज़ बन जाता था,  उस चक्कर में रामगोपाल की शोले भी देख ली थी।  अक्सर शाम को चिकन रोल या सूप वगैरह का प्लान बन जाता था। सन्डे को तो मैस में खाना पाप होता था।

बाकी दोनों  लडकियां बॉयफ्रेन्डस् की फ़ोन पर उपलब्धता के अनुसार उनके  प्लान में शामिल हुआ करती थीं। उन दोनों का मामला थोड़ा पेंचीदा था सो वो दोनों अक्सर एक दूसरे  के रूम में जाकर रो रहे होते  थे, पर नीतू और पल्लो इन सब हरकतों से दूर कहीं टीटी खेल रहे होते थे या बॉयज हॉस्टल के दबोचे हुए शिकारों को पका रहे होते थे।

ऐसा नहीं था कि हमारी पल्लो की ज़िन्दगी बॉयफ्रेंड विहीन थी। और ऐसा भी नहीं था कि उसका  मामला पेंचीदा नहीं था, पर रोने गाने के लिए वो सबसे अंत में समय निकालती थी, जब दिनभर की उछलकूद का कोटा ख़त्म हो जाता था। और तो और उसने नीतू से मशविरा करके  बॉयज हॉस्टल में अपने पसंदीदा लड़कों की लिस्ट भी  बना ली थी अगर उसका  वर्तमान  अफेयर किसी कारणवश नहीं चल पाया तो। आखिर ज़िन्दगी छोटी  है और काम ज्यादा।  इसलिए  उन्होंने बाकी दोनों लड़कियों को भी नोटिस ज़ारी कर दिया था  ताकि वो उन लड़कों से दूर रहे।

बस इस तरह मस्ती चलती रहती थी और वक़्त गुजरता रहता था।
पर पिछले एक हफ्ते से पल्लो कुछ ज्यादा परेशान लग रही थी।  दिनचर्या के विपरीत  उसने ऑफिस से आने के बाद से ही कमरा बंद करके एक डेढ़  घंटे फ़ोन पर बात करना शुरू कर दिया था।  उसके बाद कमरे से बाहर निकलती तो आँखें लाल रहती थीं ।  ये सब देखकर  नीतू का भी मूड खराब हो जाता। लेकिन फिर थोड़ी देर में पल्लो  वापस अपने रंग में आ जाती और तब नीतू की जान में जान आती थी।

उसी दौरान एक दिन  चाय पीने के बाद दोनों शाम को टहलने निकले तो पल्लो ने अपना दुःख नीतू से बाँटा। उसके माता पिता को  उसके समीर  के साथ सम्बन्ध के बारे में पता चल गया था। उन्होंने उसे बता दिया था कि उनकी सहमति से यह शादी  नहीं हो सकती। दूसरी तरफ समीर की माँ  की तबियत बहुत खराब रहने लगी थी तो उसके ऊपर जल्द शादी करने का दबाव आ गया था ताकि बहू उसकी माँ का ख्याल रख सके।

एक तरह से  पल्लो को अपना और समीर का रिश्ता ख़त्म होते दिख गया था और अब वो प्राण पखेरू उड़ने के पहले की तड़प वाले दौर से गुजर रही थी। न तो उसका और न समीर का स्वभाव ऐसा था कि वे अपनी ख़ुशी के लिए परिवार की ख़ुशी कुर्बान कर दें। दोनों घर में बड़े थे और छोटे भाई बहनों की शादी अभी बाकी थी।  लेकिन पूरी तरह हार मानने को दिल नहीं करता था। दिल के एक कोने से अब भी ये दुआ निकलती थी कि काश सब कुछ ठीक हो जाए, काश भगवान् उनकी सुन ले।

नीतू को शुरू  में यह सब मज़ाक लगता था, लेकिन अब ये जानकर  कि पल्लो वाकई में  हालात से समझौता करने और समीर को भूलने के लिए तैयार थी, नीतू को बहुत अजीब सा लग रहा था।  नीतू खुद कभी किसी अफेयर वगैरह में नहीं पड़ी थी, और न पड़ना चाहती थी।  उसका मानना था कि अफेयर करो तो शादी के इरादे से वर्ना करो ही मत। इसलिए हर कदम फूँक फूँक कर रखती थी।इसी फूँकने के चक्कर में लड़के उससे दूर ही रहते थे , इतनी गहरी बातें उनकी समझ में नहीं आती थी।

 रिश्तों को इतनी गम्भीरता से लेने वाली नीतू को जब धीरे धीरे पल्लो के जीवन के इस पहलू का पता चला तो उसके मन कुछ वक़्त के लिए बहुत परेशान हो गया था । वो पल्लो से पूछना चाहती थी कि जब मालूम था कि दिक्कत होगी तो इस राह में आगे बढ़ी ही क्यों थी। पर पल्लो को तो जैसे कभी अपने फैसले से कोई शिकायत ही नहीं रहती । प्यार तो बस हो जाता है, सोच समझ के थोड़ी किया जाता है।फिल्मों में तो यही दिखाते थे । लेकिन जात पात और परिवार की रजामंदी की बातें क्या बिलकुल भी दिमाग में नहीं आती? सच बात तो ये थी कि  जिसने खुद कभी प्यार न किया हो वो उसके अंधेपन को क्या महसूस करती ।

खैर बहुत सी बातें थीं जो नीतू को समझ में नहीं आती थीं और जो पल्लो समझाने की स्थिति में भी नहीं थी। और अब कुछ हो भी नहीं सकता था।  वक़्त का पहिया घुमाकर पहले की गयी गलतियां ठीक नहीं की जा सकती थी। और पल्लो उन यादों को गलतियां मानने को भी तो तैयार नहीं थी। इसलिए नीतू ने इस सच्चाई को उसी रूप में स्वीकार कर लिया। वो लोग ज़िन्दगी के उस दौर में थे जब इंसान दूसरों की नसीहतों से नहीं  अपने फैसलों से आगे बढ़ता था, और नीतू ने पल्लो के निजी ज़िन्दगी में लिए  फैसलों का सम्मान किया और उसी तरह उसकी दोस्त बनी रही जैसे पहले थी। अब भी वो लोग मॉर्निंग वाक करते, चाय के दौर चलते, लड़कों पर शोध होता।

हाँ बीच बीच में पल्लो थोड़ी संजीदा हो जाती, बोलते बोलते उसकी आँखें भीग जाती। उसके और समीर दोनों के माता पिता जोर शोर से उनके लिए रिश्ते ढूंढ रहे थे और अब यही देखना बाकी था कि किसकी शादी पहले होती। वो रोज फ़ोन पर पसंदीदा रिश्तों के बारे में सुनती, कभी कुछ बोल देती कभी कड़वा घूँट  पीकर रह जाती। उन्हें उसकी हँसी सुनायी देती, नीतू को उसके आंसू दीखते।  पर दिन बीतते रहते।

और आज पल्लो नीतू को लेकर शाम के सात बजे सिटी सेंटर आयी थी। आइसक्रीम पार्लर वाकई बहुत अच्छा था, और भीड़भाड़ भी थी, पर उन दोनों को एक जगह मिल गयी बैठने को।

थोड़ी देर में उनके  हाथ में मनपसंद आइसक्रीम थीं । नीतू ने खाना शुरू कर दिया।

पल्लो सड़क में आते जाते लोगों  को देख रही थी। अनगिनत प्रेमी युगल एक दूसरे से सटे कहीं चले जा रहे थे, जात पात से परे, रूढ़ियों से बेफिकर।  इनमें से कितने लोग आगे चलके शादी करके एक दूजे के हो जायेंगे, शायद यही सोच रही थी पल्लो।

" तूने वो लिस्ट कहाँ रखी  है लड़कों वाली? " आइसक्रीम गलते देखकर पल्लो ने खाना शुरू किया ।

"हॉस्टल में है, साथ लेकर नहीं घूमती!" पल्लो को बोलते  देखकर नीतू की जान में जान आयी।

"जात बिरादरी पता करके लिखी है न? इस बार गलती की कोई गुंजाइश नहीं, मालूम है न?"

नीतू समझ नहीं पा रही थी, क्या बोले। बस उसकी आँखों में देखे जा रही थी। पल्लो उसकी आँखों के तीखे सवाल नहीं झेल पायी ।

"समीर की शादी है । मंडप में बैठा है अभी। " पल्लो धीरे से बुदबुदाई। नज़रें ज़मीन पर थीं।

नीतू हैरान थी ।  एक रिश्ता आखिरी साँस ले रहा था। उम्मीद की आखिरी डोर टूट चुकी थी । विधाता  ने भी हाथ खड़े कर दिए थे।  पल्लो हार चुकी थी, समीर हार चुका  था।

पल्लो ने  अपना सर नीतू की गोद में रख दिया, अब और आँसू नहीं रोके जाते थे।
नीतू उसे धीरे से सहलाने लगी ,जानती थी  ये आखिरी सैलाब है, इसके बह जाने में ही भला है। एक भारी बोझ के तले ज़िन्दगी की नयी शुरुआत तो नहीं हो सकती न।

थोड़ी देर में पल्लो सहज हो गयी। रिश्ते को श्रद्धांजलि दी जा  चुकी थी।  आगे बढ़ने का वक़्त आ गया था , समीर की तरह।

" कितने बन्दे हैं  ब्राह्मण अपनी लिस्ट में?" पल्लो स्कूटी चला रही थी।  प्रेमी युगल , दुकानें, यादों के चीथड़े, सब पीछे छूटते जा रहे थे।


1 टिप्पणी:

Kailash ने कहा…

जाने मेरा ये दौर कब बीतेगा! *sigh*