शनिवार, 30 नवंबर 2013

डेट

                         
तानवी काफी देर से फ़ोन पर थी, करीब आधे घंटे से। निशा का पारा चढ़ रहा था। आधे घंटे बाद जाकर उसने फ़ोन रखा।
"सॉरी मम्मा बात ही कुछ ऐसी थी कि मैं फ़ोन रख ही नहीं पायी। " तानवी अपनी मम्मी का मिजाज जानती थी। निशा किचन चली गयी और तानवी भी पीछे हो ली।
"लाइए मैं कुछ हैल्प कर देती हूँ। " तानवी की मक्खनबाजी चालू थी।  
" रहने दो, बहुत बड़ी हो गयी हो न, अब थोड़ी मम्मी को सब कुछ बताओगी। "
"अरे मम्मी आप नहीं समझोगी, वो रोहित नेहा को डेट पे ले गया था तो वही सब मुझे सुना रही थी। एक एक सेकंड का हिसाब बता रही थी! बेचारा रोहित कितनी कोशिश कर रहा था उसे इम्प्रेस करने की। पर मैं ये सब किसे सुना रही हूँ, आप क्या जानो डेट क्या होती है!" तानवी ने सब्ज़ी काटनी शुरू कर दी। 

निशा का मन कहीं दूर चल पड़ा था। देहरादून की एक भीड़भाड़ वाली सड़क, जिसमें वो और अमन चले जा रहे थे और बतियाये जा रहे थे।
"अच्छा निशा बताओ, वो आभा तुमसे क्या कहती है मेरे बारे में?"
"कुछ नहीं, तुम्हें क्या लगता है ?"
"कुछ तो बोलती होगी, मुझे तो लगता है वो मुझे पसंद करती है "
"अच्छा! और कौन कौन पसंद करता है तुम्हें? "
"मज़ाक मत करो, उसकी आँखों में दिखता है मुझे, अच्छा एक बात बताओ, तुम्हें मालूम है ये डेट क्या होती है?"
"हाँ, क्यों?"
"तो बताओ मैं उसे डेट पे कैसे ले जाऊं? "
निशा हँस रही थी, अमन के मासूम सवालों पर।

"मम्मा कहाँ खो गयी, बताओ आपको मालूम है डेट क्या होती है ?" तानवी उसे वापस वर्तमान में खींच लायी।
"हाँ हाँ मालूम है, इतनी भी बेवकूफ नहीं है तुम्हारी मम्मा। दुनिया देखी है मैंने, तुमसे कहीं ज्यादा !"
"वाह वाह, मेरी मम्मा तो दुनिया की सबसे कूल मम्मा है! फिर तो आप भी ज़रूर डेट पे गए होंगे अपने ज़माने में?"
"तुम्हारे पापा लेके जाते थे। "
अरे वो भी कोई डेट हुई? वो तो जब आपकी बात पक्की हो गयी तब लेके जाते थे, मुझे सब मालूम है, शिल्पा आंटी ने बताया था।  "
हे भगवान् , इस शिल्पा आंटी ने और क्या क्या बता के रखा है इसको !
"अच्छा ठीक है, अब जा थोड़ी पढ़ाई भी कर ले क्योंकि वो तो नेहा तेरे लिए नहीं कर पाएगी न। "
"ओहो देखो तो मुझे जवाब देते नहीं बना तो कैसे भगा रही हो!"
तानवी मुस्कुराते हुए अपने कमरे में चली गयी, और निशा कढाई में तेल डालते हुए तानवी के उस प्रश्न का उत्तर तलाश रही थी, जो अब तक अनुत्तरित रह गया था, ज़िन्दगी के उस अध्याय की तरह जो पूरा होकर भी जब जब जेहन में आता अपने अधूरेपन का एहसास दिला देता।

देहरादून की एक उदास दोपहर थी। निशा अपने किराए के घर में आँखें बंद करके पलंग पर पड़ी थी, मानो ज़िन्दगी में अब कुछ करने को रह गया हो। कल ही एक उडती हुई सी खबर मिली थी , लिफ़ाफ़े में बंद दो नाम जिनकी नौकरी अगले महीने से नहीं रहेगी। क्यों नहीं रहेगी, ये किसी को नहीं पता था। कॉलेज के मालिक का लड़का ही तो वहाँ का वीसी था, जब मन चाहे लोगों को मजदूरों की तरह निकाल देता था। खैर, दो लोगों का निकाला जाना तय था, जिसमें नए लोगों के होने की उम्मीद अधिक थी। निशा को रात भर नींद नहीं आई थी। सुबह से उसका मन उचट रहा था. वो इधर की रह गयी थी उधर की। दोपहर खाने के बाद वो पलंग पर करवट बदल रही थी और शाम होने का इंतज़ार कर रही थी। चार बजते ही उसने चाय चढ़ा दी, वक़्त बिताने के लिए कुछ तो करना था। ये रविवार तो गुजरने का नाम ही नहीं ले रहा था।
निशा सोच रही थी कि चाय पीकर थोड़ी देर मकानमालकिन आंटी के घर चली जाए, शायद वहाँ कुछ मन बहल जाए। फिर उसे याद आया, आंटी को तो पूरे देहरादून में हो रही खौफनाक वारदातों के अलावा कुछ बात करना पसंद ही नहीं था। खून, बलात्कार, डकैती, और तो और अब आतंकवाद भी देहरादून के अखबारों के ज़रिये आंटी के ज़ेहन में भर गया था। उनके अनुसार अब भलाई का ज़माना ही नहीं रह गया था। कल ही तो जब वो कॉलेज से आई तो आंटी ने बड़े प्यार से उसे चाय पर बुलाया और समझाया अब उसे कुछ पैसे अलग से रखने चाहिए क्योंकि आजकल भाई भाई का दुश्मन हो गया है। निशा अपने मासूम भाइयों के बारे में सोच रही थी जिन्हें अब तक ये ही नहीं पता था कि उसका वेतन कितना था! क्या एक दिन वे निशा की कनपटी पर पिस्तौल रखकर उसके सारे पैसे छीन लेंगे ?
और हाँ,उस दिन जब अमन उससे किसी काम से मिलने आया था तो आंटी कैसे उसे घूर रही थी, फिर अगले दिन शाम को आंटी ने निशा को चाय पिलाते हुए समझाया था कि देहरादून में कैसे बलात्कार की घटनाएं बढती जा रही हैं!
नहीं, आज निशा इन सब वारदातों के मूड में नहीं थी। आज उसे कुछ अच्छा चाहिए था, कुछ ऐसा जो उसकी खोयी हुई हँसी से उसे मिला दे, दो पल के लिए ही सही।

पांच बजे उसने खुद को अमन का दरवाज़ा खटखटाते पाया।
अमन और निशा अक्सर कॉलेज के बाद एक दूसरे के साथ वक़्त बिताते थे , कभी किसी ढाबे में मोमो खाते हुए, कभी घंटाघर के पास खरीदारी करते हुए, तो कभी बस यूं ही देहरादून की सडकों में भटका करते थे। उस छोटे से शहर में, जहाँ लोग कुछ हासिल करने के लिए थोड़े वक़्त के लिए जाते थे, फिर कुछ हासिल करके आगे बढ़ जाते थे। ज़िन्दगी की इसी दौड़ में निशा की तन्हाइयों ने अमन की तन्हाइयों में अपना कुछ वक़्त का साथी ढूंढ लिया था।
अमन की मकानमालकिन आंटी निशा को घूरे जा रही थी, शायद वो भी कल अमन को देहरादून में बढ़ रहे बलात्कार के बारे में बताने वाली थी।
थोड़ी देर में दरवाज़ा खुला। अमन शायद अभी नींद से जगा था। कितना सुकून था उसकी ज़िन्दगी में, लगता था लिफ़ाफ़े वाली बात उसे याद ही नहीं थी।
निशा को देखकर वो भी खुश हो गया था, रविवार काटना उसके लिए भी मुश्किल हो जाता था।
"सो रहे थे?"
"नहीं अभी उठा ही था, सोच ही रहा था क्या करू!"
"क्या करू? चाय बनाओ। घर में मेहमान आया है!"
"हाँ बिलकुल" अमन ने चाय का पानी चढ़ा दिया। यूँ तो वो चाय नहीं पीता था, पर निशा के साथ ने उसे चाय का भी साथी बना दिया था। निशा को चाय पीना बहुत पसंद था।
"तुम इतनी उदास सी क्यों लग रही हो?" अमन ने चायपत्ती डालते हुए पूछा।
"तुम क्या जानो, नौकरी खोने की उदासी क्या होती है!" निशा ने कटाक्ष किया।
"अरे, नौकरी तो मेरी भी जा सकती है, अभी नाम थोड़ी पता चला है, तुम तो अभी से मुँह बनाके बैठ गयी। "
"हाँ पर तुम्हें अपनी नौकरी पर विशवास है और मुझे नहीं। " निशा शून्य में ताक रही थी।
अमन ने चाय का कप उसे पकड़ाया और बिस्तर के एक कोने में बैठ गया। घर में एक ही कुर्सी थी जिसमें निशा बैठी हुई थी।
"तुम्हें क्या फर्क पड़ता है अगर नौकरी चली भी जाए। तुम्हें थोड़े ही हमेशा यहाँ रहना था। तुम तो इस साल किसी किसी अच्छी कंपनी में नौकरी पाकर ही रहोगी। उसी की तैयारी के लिए तो तुम यहाँ आई थी ?"
"हाँ मगर तैयारी हो कहाँ पा रही है। पूरा दिन बीत जाता है कभी लेक्चर की तैयारी में कभी खाना बनाने में। लगता है अब तो ये नौकरी रहेगी कोई और मिलेगी। "
"तुम आज कुछ ज्यादा ही अपसेट लग रही हो। ज़रुरत से ज्यादा। अरे अपसेट तो मुझे होना चाहिए जिसे हमेशा यहीं रहना है, जिसका और कोई मुकाम नहीं।"
"ये क्या कोई छोटा मुकाम है? तुम्हें पढ़ाना अच्छा लगता है, और मुझे मालूम है एक दिन तुम बहुत नाम कमाओगे। इसीलिये कल के लिए तुम्हें डर नहीं लग रहा, तुम्हारे जैसे टीचर को कोई हाथ भी नहीं लगा सकता, बच्चे ही बगावत कर लेंगे!"
अमन कुछ सोच रहा था। निशा का मिजाज़ आज ज्यादा ही बिगड़ा था, उसे ठीक करना इतना आसान नहीं था।
"वीर ज़ारा लगी है, बगल वाले सिनेमा में। चलोगी?"
"मज़ाक कर रहे हो?"
"नहीं, मैं खुद वहाँ जाने वाला था, अकेले। चलो , अच्छा लगेगा। ज़िन्दगी हमें उदास कर सकती है, पर उदासियों के बीच ख़ुशी ढूंढना तो हमारे हाथ में है ?"
निशा अचानक से मिले इस निमंत्रण को समझ नहीं पा रही थी। इस छोटे से शहर में वो और अमन गलियों में भटकते हुए ठीक थे, पर पिक्चर जाते हुए तो लोग उन्हें ही वीर ज़ारा समझ बैठेंगे! और उनके ही तो कॉलेज के कई लड़के गए होंगे पिक्चर देखने, उन्हें तो मसाला मिल जाएगा!
लेकिन आज का दिन कुछ अलग था, आज निशा को इन खुशियों की, इन अच्छे लम्हों की ज़रुरत थी । बाकी सबसे वो बाद में निपट सकती थी। इससे पहले कि वो खुद हाँ करती, अमन ने अपना जैकेट उसे पकड़ा दिया "ये ले लो, बाहर ठण्ड है, लौटते हुए रात हो जायेगी। और जल्दी चलो, छह बजे का शो है। "
वाकई में सोचने के लिए ज्यादा वक़्त नहीं था, सो उसने जैकेट पहन लिया। थोड़ी देर में वे आराघर की सड़क पर चल रहे थे, सिनेमाहाल की तरफ।
"वैसे तुम अकेले क्यों जा रहे थे? आभा को क्यों नहीं पूछा?" निशा ने अमन को छेड़ना शुरू किया। अब वो अपने मूड में रही थी।
"वो इतने दूर रहती है, जब तक पहुंचेगी पिक्चर ख़तम हो जाएगी!"
"तो होने देते, अगला शो देख लेते, फिर उसे घर तक छोडके आते। इतनी मेहनत तो करनी पड़ती है! "
"अरे छोडो , कुछ अच्छी बात करो कहाँ उसका नाम ले रही हो!"
निशा हैरान थी।
उसकी हैरानी कोई नयी नहीं थी। बात पिछले महीने की थी जब वो कुछ दिनों की छुट्टी लेकर अपने घर गयी थी। जब लौटकर आई तो आभा ने कॉलेज में उसे चहकते हुए बताया था की अमन उसे डेट पर ले गया था। निशा को विश्वास नहीं आया था पर फिर अमन ने भी इस बात की पुष्टि की थी, शाम को टहलते हुए। निशा को काफी राहत मिली थी की अब वे उसके ज़रिये नहीं बल्कि सीधे सीधे बात कर रहे थे, पहले तो वो उनके बीच कबूतर का काम करती थी।
निशा एक हफ्ते के लिए गयी थी और इस दौरान अमन ने आभा को अपने खालीपन का साथी बनाया  अमन उसे परेड ग्राउंड में मेला दिखाने ले गया, और उन्होंने पलटन बाज़ार में खरीदारी भी की। निशा को कुछ दिन और रुकना पड़ा। जब वो लौटी तो अमन ने एक सांस में पूरी कहानी उसे बता दी।
लेकिन उस दिन के बाद से अमन ने आभा के बारे में बात करना बहुत कम कर दिया। पता नहीं क्यों।
खैर, वो लोग सिनेमाहाल पहुँच गए थे और अमन ने दो टिकेट ले लिए। निशा ने पर्स खोलते हुए अमन से टिकेट के दाम पूछे तो अमन को हँसी गयी।
"एक मूवी मैं तुम्हें खुद से नहीं दिखा सकता?"
"ठीक है अगली बार टिकेट मैं ले लूंगी। "
"वाह मतलब एक और मूवी तुम्हारे साथ देखने मिल जायेगी!"
"क्या?"
"कुछ नहीं कुछ नहीं!" अमन मुस्कुराया," वैसे तुम बाकी लड़कियों से कुछ क्यों नहीं सीखती, आभा से ही सीख लेती पूरा दिन कॉलेज में साथ रहती हो। "
"बाकी लडकियां अलग हैं, मैं अलग हूँ, मुझे मुफ्त में अपने ऊपर खर्चे करवाना हजम नहीं होता। "
अमन कुछ सोच रहा था और निशा को देख रहा था।
फिल्म शुरू हो गयी। बहुत सुन्दर कहानी थी, अमर प्रेम की कहानी। कुछ तो इस कहानी ने और कुछ हॉल के अँधेरे ने एक अलग सा समा बाँध लिया था। निशा के दिल की धड़कन तेज़ हो रही थी, शायद अमन की भी। इस तरह के रूमानी माहौल में दोनों ने कभी वक़्त नहीं बिताया था, खासकर तब जब सामने परदे पर दो दिलों की कहानी चल रही हो।
मैं ही मैं अब तुम्हारे ख्यालों में हूँ।
मैं जवाबों में हूँ, मैं सवालों में हूँ।
फिल्म ख़त्म हुई और अमन निशा को घर के बाहर तक छोड़कर आगे बढ़ गया , पर कुछ था जो दोनों के लिए थम सा गया था, शायद वक़्त, शायद दिलों की धड़कन।
अगले दिन वो लिफाफा भी खुला और उसमें निशा का नाम भी आया, पर निशा में जाने कहाँ से एक अजब सी हिम्मत गयी थी, जो उसने और दूसरी लेक्चरर ने मिलकर कॉलेज के प्रिंसिपल से मिलकर पिछले एक साल में अपने योगदान के बारे में विस्तार से चर्चा की और उन्हें आश्वस्त करके लिफ़ाफ़े का किस्सा ही ख़त्म कर दिया। कल तक जो निशा निराशा और आशंकाओं से घिरी हुई थी वही आज आत्मविश्वास से भरी हुई थी और आगे के सफ़र को नयी उमंग के साथ तय करने को तैयार थी।
अमन और निशा यूँ ही वक़्त बिताते रहे, एक दूसरे के दुःख सुख का सहारा बनकर। निशा ने नए सिरे से बेहतर अवसर की तैयारी शुरू कर दी थी। पर अमन के लिए वक़्त निकल ही आता था, रविवार की खाली शामों में। वो लोग फिर कभी सिनेमा देखने नहीं गए, पर देहरादून की वही पुरानी गलियाँ अब रूमानी सी लगने लगी थी, वही पुरानी स्टोव वाली चाय अब अधिक मिठास लिए होती थी।

और फिर वह दिन भी आया,जब ज़िन्दगी ने निशा के दरवाज़े पर दस्तक दी निशा की मेहनत रंग लायी, और उसे दूसरे शहर में सरकारी नौकरी मिल गयी। निशा काफी खुश थी, और बहुत लगन से अपना इस्तीफ़ा लिख रही थी।
अमन उसकी नौकरी की खबर सुनकर सीधा लेक्चर से उसके केबिन में आया था।
"जा रही हो? "
"हाँ। "
"मैंने सुना, अच्छी जॉब मिल गयी है तुमको। बधाई।"
"थैंक्स।"
अमन चुपचाप निशा को इस्तीफ़ा लिखते हुए देख रहा था। जैसे कुछ कहना चाहता हो।
" लिख दिया? दिखाओ। "
निशा ने इस्तीफ़ा अमन को पकड़ाया।
अमन ने कागज़ मोड़कर जेब में रख दिया।
"मत जाओ। "
"जाना तो पड़ेगा। कागज़ दे दो वरना दूसरा लिखना पड़ेगा। "
अमन कुर्सी में बैठ गया , निशब्द सा।

"मम्मा सब्जी जल रही है क्या? बदबू रही है। " तानवी की आवाज़ सुनकर निशा सब्जी चलाने लगी।


3 टिप्‍पणियां:

Kailash ने कहा…

बस अब कोई और नहीं पढ़ी जाएगी। कहानी अच्छी है, पर अगली कहानी पढ़ने की हिम्मत भी ले गई।

varsha ने कहा…

aaraam se padhiye..agle saal :)

Kailash ने कहा…

नहीं, वो बात नहीं, ये कहानी ही चाहती थी कि मैं बस इसी कहानी में थोड़ी देर ठहर जाऊँ, पढने के बाद भी कुछ देर।