मंगलवार, 26 नवंबर 2013

विजयलक्ष्मी की अन्तर्देशियां


विजयलक्ष्मी की अन्तर्देशियाँ बहुत साधारण होती थीं, बिलकुल गाय पर लिखे निबंध की तरह। तारीख के अलावा उनमें कुछ ख़ास फर्क नहीं होता  था।  लगभग तीन हफ़्तों के अंतराल में विजयलक्ष्मी उर्फ़ लक्षु की  अन्तर्देशियां रश्मि को मिल जाती थीं, जिन्हें औपचारिकतावश खोलकर रश्मि एक फ़ाइल में रख देती थी, फिर एक पत्र अपनी तरफ से डाल  दिया करती थी जिसमें अधिकांश वाक्य लक्षु को कुछ अलग और बेहतर पत्र लिखकर अन्तर्देशियों का सदुपयोग करने के लिए प्रेरित कर रहे होते थे।

हाँ हर पत्र में सबसे ऊपर भगवान् के विभिन्न नामों का स्मरण होता था जैसे जय संतोषी माँ, जय माँ धारी देवी वगैरह। एक बार तो रश्मि का हँसते हँसते हाल बेहाल हो गया था जब लक्षु ने पत्र के ऊपर ''जय बजरंग बली'' लिखकर भेज दिया था।  ऐसा लगता था मानो किसी युद्ध का बिगुल बज गया हो।

खैर लक्षु को कोई फर्क नहीं पड़ता था, या फिर उसे समझ में ही नहीं आता था कि इसके अलावा चिट्ठी कैसे लिखी जा सकती है। पहली पंक्ति में 'प्रिय रश्मि' तो लिखना ही पड़ता था। दूसरे में अपनी कुशलता की खबर देनी व उसकी कुशलता की कामना भी करनी ही होती थी। तीसरे में मौसम के हाल चाल बताने ही होते थे क्योंकि वो भी तो हर तीन हफ्ते में बदल जाता था। इतने में तो जगह ख़त्म होने वाली होती थी इसलिए उसे आंटी अंकल को प्रणाम, भैया को नमस्ते, डॉगी को प्यार वगैरह लिखना शुरू कर देना पड़ता था। कुछ अलग लिखने के लिए जगह ही नहीं बचती थी!

दूसरी तरफ छवि के पत्र होते थे जिनका रश्मि बेसब्री से इंतज़ार करती रहती थी। वे होते भी ऐसे थे, लम्बे चौड़े और मसालेदार ख़बरों से भरपूर। अंतर्देशी में तो इतनी बातें समा नहीं पाती थीं इसलिए छवि को लिफ़ाफ़े में पत्र  भेजना पड़ता था। लेकिन उसका एक लिफाफा लक्षु की सालभर की अन्तर्देशियों पर भारी पड़ जाता था। कम से कम तीन चार बार पढ़ना पड़ता था तब जाकर सब खबरें गले उतरती थीं। 

यह चरित्र सिर्फ चिट्ठियों का नहीं था, उनकी आपसी दोस्ती का भी यही हाल था। लक्षु के साथ रश्मि की बचपन की दोस्ती थी, तब जब से उन्हें दोस्ती की समझ भी नहीं थी।  बस मास्टरजी ने बगल में बिठा दिया था सो दोस्ती हो गयी। वही दोस्ती अब तक चली आ रही थी, बिना किसी प्रश्न, बिना किसी पुनर्विचार। बिलकुल उन चिट्ठियों की तरह जो एक निश्चित अंतराल में आकर लक्षु के रश्मि की ज़िन्दगी में मौजूद रहने का आभास दिला  जाती थीं। उससे अधिक अंतरंग न तो उनकी दोस्ती थी और न ही उसकी चिट्ठियां। 

रश्मि और लक्षु की  दुनिया काफी अलग थी।  रश्मि का एकमात्र भाई तब बोर्डिंग स्कूल चला गया था जब वह सिर्फ छह साल की थी।  ज़िन्दगी के इसी खालीपन ने उसे किताबों का साथी बना दिया था और उस छोटे से कसबे के बाहर की देश दुनिया की खबरों और मुद्दों से छोटी उम्र में अवगत कराया था। वह पढ़ लिखकर उस कसबे से बाहर निकलकर पूरी दुनिया घूमना चाहती थी और कुछ नया सीखते रहना चाहती थी ।  दूसरी तरफ लक्षु अपने छोटे भाई बहनों के बीच अपने सपने कभी बुन ही नहीं पाती थी और घर परिवार, नाते रिश्तेदारों के बीच खेलते कूदते उसका समय निकल जाता था। भविष्य में क्या बनना है, क्या पढ़ना है, ये सब सोचने की उसके पास फुर्सत ही नहीं  रहती थी।

रश्मि ने उसे बहुत समझाया कि उसे कम से कम एक लक्ष्य तो बना लेना चाहिए ताकि उसके परिवार वाले उसकी पढ़ाई को लेकर गंभीर रहें । छोटे से कस्बे  में लड़कियों की पढ़ाई लिखाई को लेकर एक उदासीनता से अधिक कुछ नहीं रहता था। बारहवीं के बाद रिश्ते आने शुरू हो जाते थे।  पर लक्षु को ये सब समझ में नहीं आता था।

यही कारण था कि वह जैसे जैसे बड़ी हो रही थी खुद को लक्षु से दूर जाता महसूस कर रही थी।  उसकी बातें लक्षु की समझ से बाहर होती थीं और वो हँसने लगती थी।  पर दोस्ती की  गाड़ी चलती रहती, दोनों साथ स्कूल जाते, साथ बैठते और साथ में घर आते।

और फिर एक दिन उनके स्कूल में छवि ने दाखिला लिया।

 छवि के पापा का शहर से तबादला हुआ था, जहां वो अच्छे इंग्लिश मीडियम  स्कूल में पढ़ा करती थी। नए स्कूल में आते ही छवि का काफी रूतबा हो गया था । वो निसंकोच किसी से बात कर लेती थी, और तो और मास्टरजी से भी सवाल पूछती रहती थी। रश्मि और लक्षु तो ये सोच भी नहीं सकते थे कि कभी अध्यापकों से प्रश्न पूछे जा सकते हैं , वे तो उत्तर देने में ही हिचकिचाते थे! छवि के व्यक्तित्व में वो सब आयाम थे जो रश्मि की किताबों  की सशक्त लड़की  में होने चाहिए थे।  आत्मविश्वास , आगे बढ़ने की चाह वगैरह वगैरह । देर सवेर उन दोनों की दोस्ती  होनी ही थी।  और शुरुआत, निस्संदेह, छवि ने दोस्ती का हाथ बढ़ाकर की।

जब रश्मि ने लक्षु को ये बात बतायी तो उसे ये हजम नहीं हुई। उसने एक दोस्त और शुभचिंतक का फ़र्ज़ निभाते हुए रश्मि को आगाह किया कि छवि एक घमंडी अमीर लड़की है और रश्मि की दोस्ती के तो बिलकुल काबिल नहीं। रश्मि दुविधा में पड़ गयी। फिर लक्षु ने एक रास्ता निकाला "कल छुट्टी के बाद हम लोग छवि के साथ घर लौट रहे होंगे तब मैं गिरने का नाटक करूंगी। अगर छवि ने मुझे सहारा देकर उठाया तो वो दोस्ती के काबिल है और अगर वो हँस गयी तो मतलब वो दोस्ती के लायक नहीं, ठीक है?" लक्षु अपने प्लान से संतुष्ट लग रही थी, पर रश्मि की चिंता बढ़ गयी थी। चिंता की वजह छवि की संवेदनहीनता नहीं बल्कि  लक्षु की एक्टिंग करने की (ना )काबिलियत थी।  पर लक्षु उसकी दोस्ती की  खातिर गिरने को तैयार हो गयी, ये देखकर रश्मि को अपनी  दोस्ती पर गर्व हो आया।
अगले दिन रश्मि का शक सच हो गया, लक्षु घर लौटते हुए अचानक से गिर गयी पर दुर्भाग्य से उसकी दर्दनाक  एक्टिंग देखकर छवि के साथ साथ रश्मि को भी हँसी आ गयी! अब लक्षु निरुत्तर हो गयी थी, हालांकि रश्मि ने उसे अलग से जाकर बहुत समझाया और माफ़ी मांगी।
उस दिन के बाद लक्षु ने छवि और रश्मि की दोस्ती पर कोई प्रश्न नहीं उठाया। तीनों साथ घूमते और खेलते। पर जिस दिन रश्मि स्कूल से छुट्टी लेती लक्षु छवि को पूछती भी नहीं।

अगले साल रश्मि के पापा का तबादला हो गया। उसने उन दोनों को अपना नया पता देकर चिट्ठी लिखने को कहा और उनका पता भी लिया। फिर शुरू हुआ अन्तर्देशियों और लिफाफों का दौर।  छवि  की चिट्ठियों में उसके नए नए प्रयोग, क्लास में लक्षु की और बाकी जलनखोर लड़कियों  की हरकतें, टकली  रिंकी के स्कार्फ के डिज़ाइन, शरारती गौरव के मुर्गा बनने  के रिकार्ड्स  और ढेर सारी  खबरें रहती थीं। दूसरी तरफ लक्षु की अन्तर्देशियों में जय बजरंग बली, कुशलक्षेम,  मौसम की जानकारी ।

रश्मि समझ नहीं पाती थी कि ऐसा क्या था उन दोनों की दोस्ती में जो लक्षु को उसे पत्र लिखने के लिए प्रेरित  करता रहता था। न तो  विचार मिलते थे न इरादे।

एक बार तो बड़ा मज़ेदार किस्सा हो गया था। रश्मि ने दोनों को एक साथ पत्र लिखा और लक्षु को हमेशा की तरह छवि से प्यार से रहने की और लम्बा पत्र  लिखने वगैरह की नसीहतें दीं और अंत में लक्षु का पत्र छवि के और छवि का पत्र लक्षु के लिफ़ाफ़े में डाल  दिया। छवि की तो हालत खराब हो गयी थी हँसते हँसते जब उसने लक्षु वाला नसीहतों से भरा पत्र पढ़ा! उसने तुरंत चिट्ठी लिखकर रश्मि को उसकी करतूत की जानकारी दी।

उस दिन रश्मि को बुरा महसूस हुआ कि उसके कारण फिर से लक्षु को छवि की हँसी का पात्र बनना पड़ा।  इसलिए उसने एक और पत्र बहुत प्यार से लक्षु को भेज दिया, सही पते के साथ।

फिर नियति ने एक खेल खेला।  रश्मि के पापा का फिर से तबादला हो गया, और लगभग उसी वक़्त छवि के पापा का भी तबादला हो गया। स्कूल की लम्बी छुट्टियां चल रही थीं इसलिए छवि और लक्षु की मुलाक़ात भी नहीं हो पायी।  छवि ने अपना नया पता रश्मि के पुराने पते पर भेजा जो रश्मि को नहीं मिला, और इस तरह रश्मि की ज़िन्दगी से छवि नाम का अध्याय ख़त्म हुआ , शायद हमेशा के लिए या फिर तब तक के लिए जब तक विधाता को मंज़ूर न हो। लम्बे लम्बे लिफाफों का दौर ख़त्म हुआ।  लेकिन पुराने लिफाफों की गर्माहट अब भी बाकी थी, जिन्हें टटोलते हुए रश्मि को कोई न कोई नयी बात मिल जाती थी खिलखिलाके हंसने के लिए।

उसके बाद से  विजयलक्ष्मी की अन्तर्देशियों ने रश्मि की पत्र पेटी पर एकछत्र कब्ज़ा कर लिया।  अब अंतर्देशी देखकर रश्मि के चेहरे पर तटस्थता के भाव नहीं बल्कि गरीब को रोटी मिलने वाली ख़ुशी होती थी।

लेकिन कुछ हफ़्तों से लक्षु की अन्तर्देशियां भी बंद हो गयी थीं। पता नहीं क्यों।रश्मि ने पत्र भेजकर उससे पूछा भी पर कोई उत्तर नहीं मिला। रश्मि परेशान थी, पहले ही उसकी ज़िन्दगी में इतना खालीपन था। अंतर्मुखी और पढ़ाकू होने के कारण उसकी अधिक सहेलियां बन नहीं पाती थीं और ये आखिरी भी उसकी ज़िन्दगी से दूर होती जा रही थीं। अब तो उसके भाई के पत्रों का ही सहारा था जो कभी कभार आ जाते थे।

फिर एक दिन उसके लिए एक अंतर्देशी आयी।

रश्मि स्कूल से लौटी थी और कपडे बदलके खाने के लिए बैठ ही रही थी कि उसकी नज़र टेबल पर रखी अंतर्देशी पर पड़ी।

"अरे मम्मी आपने बताया क्यों नहीं कि चिट्ठी आयी है?"" रश्मि वहीं से चिल्लाई, फिर पत्र लेकर अंदर चली गयी। मम्मी हैरान सी देख रही थी। इस तरह की प्रतिक्रिया तो लिफाफों के लिए हुआ करती थी!

रश्मि अपने कमरे में बिस्तर पर बैठ गयी और जल्दी से उसकी चिट्ठी खोली। "ये लक्षु की ही चिट्ठी है न? इतनी लम्बी चौड़ी!" उसने नीचे नाम देखा। हाँ थी  तो उसी की! एक इंच जगह  नहीं छोड़ी थी, अंतर्देशी मानो  अक्षरों से लीप दी थी।  रश्मि ढूंढ रही थी  कहाँ से पढ़ना शुरू करे!

"                                                          'जय संतोषी माँ '

प्रिय रश्मि,
 बहुत दिनों बाद पत्र लिख रही हूँ , नाराज मत होना। असल में मुझे आठवीं के बाद नवोदय विद्यालय में दाखिला मिल गया था।  वो तो बोर्डिंग स्कूल है न।  इंग्लिश मीडियम की पढ़ाई हो जाती है और रहने खाने का बंदोबस्त भी स्कूल करता है । मैंने ही पापा से जिद करके यहाँ दाखिला लिया, कम से कम मेरी पढाई तो अच्छे से हो जायेगी, वो भी इंग्लिश मीडियम  में।
लेकिन अब यहाँ आ गयी हूँ तो अब बहुत खाली सा लग रहा है।  होमवर्क निपटाके सबसे पहले तुझे  ही पत्र लिख रही हूँ।  बहुत याद आ रही है तेरी । लिखती हुई रो रही हूँ। पहले कभी इतना अकेला महसूस नहीं हुआ।  मम्मी पापा भाई बहन सब लोगों से दूर हो गयी हूँ। तुझसे तो पहले ही दूर थी, पर आज न जाने क्यों तू भी बहुत दूर महसूस हो रही है। तू मुझे चिट्ठी लिखते रहना, वर्ना मैं यहाँ अकेले रह नहीं पाउंगी। अब तो मुझे  छवि को भी बहुत याद आती है। पर उसका पता न मेरे पास है, न तेरे पास।
तूने कहा था न कि मुझे ज़िन्दगी में कुछ लक्ष्य निर्धारित करना चाहिए, तो मैंने कर लिया है। मैं डॉक्टर बनना चाहती हूँ। यहाँ रहके मैं खूब पढ़ाई करूंगी और अपना लक्ष्य पाने की पूरी कोशिश करूंगी।
शायद धीरे धीरे मुझे यहाँ की आदत हो जाए, पर अभी मुझे बहुत खराब लग रहा है, बहुत ज्यादा। तू मुझे पत्र
लिखते रहना और मुझे अकेला मत पड़ने देना।  मेरे पास बहुत कुछ है बताने को इस जगह के बारे में, बहुत ही सुन्दर और शांत जगह है।  बस हमारा स्कूल है और एक छोटा सा गाँव। पर वो सब मैं अगले पत्र में बताउंगी, अभी तो जगह ही ख़त्म हो रही है!  उम्मीद है तुझे ये चिट्ठी पसंद आएगी।
(और हाँ,  रिंकी के सर पर बाल आ गए थे । उसकी मम्मी ने संतोषी माँ का व्रत रखा था पिछले साल।  )

पत्र ज़रूर लिखना। लिखते रहना।
आंटी अंकल को प्रणाम।  डॉगी को प्यार।

तेरी सहेली,
विजय लक्ष्मी

नोट: कच्ची डाली पर झूला लगाकर झूल न जाना। नयी सहेली बनाकर हमें भूल न जाना। "

जगह जगह स्याही फैली हुई थी, शायद लक्षु के आँसुओं  से। 


1 टिप्पणी:

Kailash ने कहा…

अरे वाह! मुझे किसी और दुनिया की कहानियाँ भी अच्छी लग सकती हैं। पता ही नहीं था।