बुधवार, 20 नवंबर 2013

स्कॉलर

महेश सर चहलकदमी कर रहे थे। माथे पर चिंता की  लकीरें साफ़ दिख रही थी। बात ही ऐसी थी, दसवीं के बोर्ड सर पर थे, और पिछले हफ्ते हुए यूनिट टेस्ट में बीस में से  सिर्फ चार बच्चे पास हुए थे।

स्कूल को खुले कुछ ही साल हुए थे, और पिछले साल दसवीं का पहला बैच बोर्ड की  परीक्षा में बैठा था।  पंद्रह में से दो बच्चे पास हुए थे।  ग्यारहवीं की क्लास नहीं खुल पायी और सबको स्कूल बदलना पड़ा। । समस्या बुद्धि की नहीं थी, भाषा की थी। इस  इलाके का यह पहला और एकमात्र इंग्लिश मीडियम स्कूल था। आस पास के छोटे छोटे कस्बों और गाँवों से बच्चे यहाँ पढ़ने आते थे।

अगर इस बार भी दसवीं का रिजल्ट ठीक नहीं रहा तो फिर स्कूल का नाम खराब हो जाएगा  और नए एडमिशन भी मिलने मुश्किल हो जायेंगे। स्कूल का अस्तित्व खतरे में पड़ जाएगा। यही सब सोच सोचकर महेश सर परेशान हो रहे थे।  यूँ  तो वो स्कूल के प्रिंसिपल थे, पर शिक्षकों की  कमी होने के कारण एक दो विषय वही पढ़ा दिया करते थे, और बच्चों को भी उनसे पढ़ना बहुत पसंद था। दसवीं की क्लास को वो गणित पढ़ाते थे।

श्रुति और रागिनी आपस में फुसफुसा रहे थे।
"क्या लगता है, अब सर क्या करेंगे?"
"कुछ भी कर लें, स्कूल तो बंद होना है!"

महेश सर कुर्सी पर बैठ गए।
"अब से हर रविवार तुम लोगों की  एक्स्ट्रा क्लास लगेगी, मैथ्स और साइंस की। सुबह नौ से दोपहर एक बजे तक। "
पूरी क्लास में सन्नाटा छा गया। एक रविवार ही तो मिलता था आराम करने के लिए , और खासकर सर्दियों की  सुबह तो रजाई से निकलने का मन ही नहीं करता था।  उस पर सर ये एक्स्ट्रा क्लासेज लगवा रहे थे।  पर कोई और चारा भी नहीं था, बहुत देर हो चुकी थी और अब अच्छा रिजल्ट लाने की  एकमात्र उम्मीद यही थी।

इंटरवल में खाना खाकर श्रुति और रागिनी अपनी पसंदीदा जगह 'वैली व्यू ' पहुँच गए।  उनका स्कूल किसी हिल स्टेशन से कम नहीं था। एक तरफ हरे भरे पहाड़ जिसमें एक छोटा सा गाँव बसा हुआ था, तो दूसरी तरफ घाटी जिसमें से एक नदी बहती थी। नदी के दूसरी और एक मंदिर था जिसमें त्योहारों में खासी भीड़ उमड़ती थी। 'वैली व्यू' उन दोनों द्वारा खोजा गया एक टीला था जहां से ये सब साफ़ दिखता  था।

"यार हम  लोगों का आना ज़रूरी है सन्डे को?" श्रुति धूप का आनंद लेते हुए बोली।
"क्यों हम लोग शाही घराने से हैं?"
"नहीं नहीं मतलब उस दिन मैं पूरे हफ्ते की पढ़ाई रिवाइस करती हूँ।  मुझे तो ये उल्टा पड़ जाएगा।  "
"सच बोलूं तो तुझसे कोई उम्मीद भी नहीं रखता आने की, तू नहीं भी आये तो सर कुछ नहीं बोलेंगे, उन्हें मालूम ही है कि तू घर पर पढ़ ही रही होगी।  ये तो हम  जैसे लोगों की डूबती नय्या पार कराने के लिए है।  "
"अच्छा! तेरी नय्या कब से डूबने लगी? "

घंटी बज गयी।  दोनों ने धूप को अलविदा कहा और क्लास की तरफ चल पड़े।
श्रुति पिछले साल ही इस स्कूल में आयी थी जब उसके पापा की  देहरादून से यहाँ पास के कस्बे में पोस्टिंग हुई थी । आस पास का एकमात्र इंग्लिश मध्यम स्कूल होने के नाते श्रुति का दाखिला यहीं करवाना पड़ा, लेकिन श्रुति के पापा इस स्कूल को लेकर बहुत आश्वस्त नहीं थे। स्कूल का पिछला रिकॉर्ड उनकी चिंता का बड़ा कारण था। पर अपनी बेटी पर उन्हें भरोसा  था। आते ही उसने क्लास में फर्स्ट आना शुरू कर दिया और सबकी प्रशंसा की पात्र भी बन गयी।

रविवार की सुबह सब बच्चे आँखें मूंदते हुए तैयार होकर बस स्टॉप पहुंचे। ठण्ड से हाल बेहाल था। कोहरा लगा हुआ था और आती जाती बसें दिखनी भी मुश्किल हो रही थी।  किसी तरह नौ बजे तक अधिकाँश बच्चे स्कूल पहुंचे।  पहला पीरियड मैथ्स का था, मतलब महेश सर का।  पर वो अब तक नहीं पहुंचे थे। क्लास में ताला पड़ा था, सो बच्चे ठण्ड से बचने के लिए सुरक्षित जगह तलाशने लगे। छत के लिए जाती सीढ़ियों के नीचे छोटा सा कमरा जैसा था जहां चपरासी अपना सामान एक संदूक में रखा करता था।  लड़के सब वहीं दुबक गए। श्रुति और रागिनी बाहर खड़े थे।
"चल यार छत पर चलते हैं, कुछ तो पता चलेगा सर के आने का, यहाँ से तो कुछ नहीं दिख रहा। "श्रुति ने सुझाव दिया। रागिनी ने हामी भरी, और दोनों छत की  ओर चल पड़े।
छत पहुँचते ही दोनों की आँखें जैसे फटी रह गयीं। इतना कोहरा था कि उन्हें सिर्फ छत ही नज़र आ रही थी, आस पास पूरी सफ़ेद चादर बिछी हुई थी, न पहाड़ दीखते थे न घाटी। ऐसा नज़ारा शायद ही किसी ने कहीं देखा हो।
"अरे यार सही है ! इतना सुन्दर।  मन खुश हो गया!"
"काश कैमरा होता। मेरा पापा तो कभी न दें मुझे।  पता नहीं कब के लिए बचा के रखा है। "श्रुति चारों तरफ देख रही थी और हैरान हो रही थी।
"तेरे पापा ने तुझे पढ़ने भेजा है शायद! " रागिनी ने याद दिलाया।
हाँ यार, पर ये सर भी तो नहीं आ रहे, हम  क्या कर सकते हैं!"
"आईडिया! बस स्टॉप चलते हैं । सर भी आते हुए दिख जायेंगे और एकाध चाय भी पी लेंगे !"
"चाय! आईडिया अच्छा है।  चल चलते हैं। "
दोनों छत से उतरकर बस स्टॉप की तरफ चल पड़े।
"अरे कहाँ जा रहे हो तुम लोग? सर आने वाले होंगे। " गौरव की आवाज़ थी।  उन लोगों ने चपरासी के बक्से में सेंध मारकर केरोसिन का जुगाड़ कर लिया था और अब लकड़ियां जलाकर आग सेंक रहे थे।
"चिंता मत करो सर को ही लेने जा रहे हैं। " दोनों अपनी धुन में जा रहे थे।
"कंधे पर बिठाके लायेंगे क्या ये लोग सर को?" लड़के फुसफुसा रहे थे।

श्रुति से चला नहीं जा रहा था।  पहाड़ों की ठण्ड की उसे आदत नहीं थी।  वो तो पिछले साल ही  देहरादून से आयी थी।
" कछुए की तरह क्यों चल रही है?" रागिनी ने टोका।
""यार इतनी ठण्ड है, पैर अकड़ गए मेरे!"
"" ओहो देहरादून की राजकुमारी के पैर अकड़ गए, रुक जा ठीक कर देती हूँ। "
"रागिनी ने श्रुति का हाथ पकड़ा और तेज़ दौड़ने लगी।
""अरे  अरे मैं गिर जाउंगी ! " श्रुति की हालत खराब थी।
"" थोड़ी चर्बी जलेगी न तेरी तो सब अकड़ निकल जायेगी, राजकुमारी कहीं की! "

छोटे से गाँव की अलसायी सी सुबह में दो लडकियां सड़क किनारे दौड़ रही थीं। गाँव वाले मंजन करते करते सूरज उगने की दिशा पता कर रहे थे।
" अरे यार ये तो सही है, अब से रोज दौड़ेंगे! " श्रुति हाँफते हुए बोली ।  दूर से एक बस आती दिख रही थी , दोनों रुककर  उसे देखने लगे। बस आयी और निकल गयी। सर नहीं थे। दोनों आस पास चाय का जुगाड़ देखने लगे।
"कोई चायवाला खुला नहीं है, अब क्या करेंगे?"श्रुति निराश हो रही थी, चाय की  उसे सख्त ज़रुरत थी। 
"रुक जा, मैं इंतज़ाम करती हूँ।  " रागिनी काफी बरसों  से यहाँ रह रही थी और काफी कुछ जानती थी यहाँ के  बारे में।  श्रुति चुपचाप उसके साथ हो ली।
छोटे से गाँव में रोज़ी रोटी का जुगाड़ या तो खेती था या फिर कोई छोटी मोटी दूकान।  चाय परोसने के लिए कई लोग अपने घर के बाहर ही चूल्हा लगाकर दो मर्तबानों  में बिस्कुट रखके कर देते थे। अलग से दुकान  लगाने की भी ज़रुरत नहीं थी।  ऐसे ही किसी घर की तलाश रागिनी कर रही थी।  और जल्द ही उन्हें एक जलता हुआ स्टोव दिख गया।
" काका यहाँ चाय मिलेगी? "' रागिनी ने बाहर बैठे अधेड़ उम्र के व्यक्ति से पूछा।
"बिलकुल मिलेगी , आ जाओ अंदर।  " दोनों अंदर रखी बेंच पर बैठ गए। गर्म गर्म अदरक वाली चाय उबल  रही थी।  श्रुति की जान में जान आयी। 
" बेटा आप लोग यहाँ पढ़ते हो? "
"हाँ काका।  " रागिनी चाय की चुस्की लेते हुए बोली।
" पर आज तो इतवार है न? "काका की जिज्ञासा शांत नहीं हुई थी। 
" "क्या  बताएं काका, हम  खुद ही परेशान हैं।  " दोनों एक दूसरे  को देख रहे थे।

"अच्छा  काका आप क्या हमेशा ही यहाँ चाय बनाते हैं? "  श्रुति को चाय बहुत पसंद आ गयी थी।
"नहीं बेटा मैं तो फ़ौज से अभी अभी रिटायर हुआ। वक़्त गुजारने के लिए ये छोटा सा काम शुरू किया।  "
" अरे  वाह फ़ौज में ! फिर तो आपके पास बहुत से किस्से होंगे वहाँ के?"श्रुति की आँखें बड़ी हो गयी थी।

काका को जैसे मनमांगी मुराद मिल गयी! हर फौजी के पास ऐसे अनगिनत किस्से होते थे जिन्हें सुनाते वक़्त कभी उनका सीना गर्व से फूल जाता था और कभी आँखें नम हो जाती थीं।  काका भी ऐसे किस्से सुनाते जाते और अगला चाय का प्याला पकड़ाते जाते ।
" और फिर पैराशूट से कूदते हुए मेरे पैरों में चोट आ गयी और मुझे फ़ौज से विदा लेनी पड़ी।  उसी की  पेंशन से और थोडा बहुत इस चाय की दुकान से खर्च चल जाता है बस। " काका की आँखें  भर आयी थी। वो दोनों भी गंभीर हो गए।  

थोड़ी देर में दूर से एक बस आती हुई दिखी।

" अच्छा काका अब हमें जाना होगा शायद सर आ गए, आपके कितने पैसे हुए? " श्रुति ने पर्स खोलते हुए पूछा।
काका अब भी कहीं खोये हुए थे " जाओ बेटा पढ़ो लिखो, आज तुमसे पैसे नहीं लूँगा। फिर कभी। "

सर बस से उतर रहे थे, वो दोनों जल्दी से चलने लगे ताकि सर से पहले क्लास पहुँच जाएँ। 

क्लास में घुसते  ही सर ने बच्चों से माफ़ी मांगी। उनकी तबियत बहुत खराब थी, सर्दी पकड़ ली थी और तेज बुखार भी था , पर इतने बच्चों को स्कूल बुलाकर खुद नहीं जाना उनके लिए अधिक चिंता का कारण था, इसलिए वो उसी हालत में आ गए।
गौरव ने सलाह दी " सर आप पहले थोडा आग सेक लीजिये। धूप  आने के बाद पढाई शुरू करते हैं। आप बैठे रहिएगा हम  आपके पास आकर अपने डाउट पूछ लेंगे। "

"" आग? "सर हैरान थे, फिर बच्चों की शरारत पर हलके से मुस्कुरा दिए। ""तुम लोगों ने आग का भी जुगाड़ कर लिया?  चलो वहीं बैठते हैं थोड़ी देर। "
थोड़ी देर में धूप  आ गयी और मौसम में गर्माहट आयी। सर ने क्लास को कुछ प्रश्न दे दिए हल करने को और खुद बैठ गए।

ग्यारह बजे विज्ञान के सर आ गए।  छुट्टी के दिन पढ़ने में एक अलग ही मजा आ रहा था। बच्चे भी बहुत उत्साह से पढ़ रहे थे। एक बजे पढ़ाई बंद हुई और सब लोग बस स्टॉप पर खड़े हो गए।

" क्या बोलती है, अगले सन्डे घर पर रिविज़न करेगी  या स्कूल में  आएगी ?" रागिनी और श्रुति को एक बस में खाली सीट मिल गयी थी और वो सफ़र का आनंद ले रहे थे। 
" भाड़ में जाए रिवीज़न, मैं तो स्कूल आउंगी " श्रुति मुस्कुराई।
हर रविवार क्लासेज लगती और बच्चे अपने हफ्ते भर के प्रश्न सर के सामने रख देते। हँसते खेलते पढाई हो जाती। अब बच्चे बोर्ड्स के लिए थोड़ा बेहतर तैयार महसूस कर रहे थे।

                                                     x                               x                                   

 "तुम्हें याद तो है वो जगह?"
" हाँ जगह तो यही है, पर कितनी बदल गयी है! जगह जगह होटल, लॉज, दुकानें! ऐसा तो नहीं था पहले। "

 श्रुति मायूस हो गयी थी।  वर्षों बाद वो अपने पति के साथ पहाड़ों में घूमने जा रही थी। रास्ते में उसका पुराना स्कूल वाला गाँव भी पड़ता था और वो कब से वहाँ पहुँचने  का इंतज़ार कर रही थी।   लेकिन आज जब वो वहाँ  पहुंची तो उस गाँव को पहचान ही नहीं पायी । इतने वर्षों में उनका वो छोटा सा अनछुआ हिल स्टेशन यात्रियों की नज़र में भी आ गया था और शायद अपनी नैसर्गिक सुंदरता भी खो बैठा था।
"ये देखो, स्कॉलर टी स्टाल! बड़ा मजेदार नाम है, नहीं? " विवेक धीरे धीरे गाडी चला रहा था और आस पास देख रहा था।
श्रुति ने ध्यान  से देखा " कुछ पहचाना सा लग रहा है, अरे अरे गाड़ी रोको ये तो काका की दुकान  है! "
काका अब काफी उम्रदराज हो गए थे। श्रुति को देखते ही पहचान गए और दुकान से बाहर आ गए।
" कहाँ चली गयी थी बेटा ? बिना बताये अचानक ?"
" अरे काका मुझे तो बोर्ड्स के तुरंत बाद वापस देहरादून जाना पड़ा था ग्यारहवी के एडमिशन के लिए। किसी से मिल भी नहीं पायी। और ये क्या आपने तो बड़ी दुकान खोल दी! नाम भी मस्त है! "

"हाँ बेटा तुमने जो परंपरा शुरू की थी वो अब तक चल रही है। सब यहीं आते हैं चाय पीने! इसीलिए नाम भी स्कॉलर रखा है!" काका की ख़ुशी उनकी आँखों में झलक रही थी।
"' क्यों नहीं आयेंगे, आप चाय ही इतनी अच्छी बनाते हैं, सब ठण्ड भाग जाती है! "
"चलो तो फिर एक एक चाय हो जाए। "" विवेक ने सुझाव दिया। 
अंदर आकर काका ने उन्हें गरमागरम अदरक वाली चाय पिलाई।
"काका वो स्कूल तो बंद होने वाला था, फिर क्या हुआ? ""
" बंद क्या वो तो और ज्यादा बड़ा हो गया है, खूब नाम हो गया है उसका। लेकिन तुम्हें सब लोग बहुत याद करते हैं। स्कॉलर कहके याद करते हैं।  एक बार मिलके तो आओ वहाँ ""
"आज कौन मिलेगा? आज तो सन्डे है!" विवेक ने याद दिलाया।
" सन्डे? फिर तो हम ज़रूर जायेंगे!"" श्रुति की आँखों में चमक थी।  काका भी समझ गए और मुस्कुरा दिए।

स्कूल वाकई बड़ा हो गया था। उनके ''वैली व्यू'' पॉइंट की जगह एक मैदान बन गया था बच्चों के खेलने के लिए। लेकिन दसवीं कक्षा वाला कमरा आज भी खुला था। महेश सर अंदर पढ़ा रहे थे और श्रुति नम आँखों से बाहर खड़ी देख रही थी।

दूसरी तरफ प्रिंसिपल सर के कमरे की खिड़की से श्रुति की बड़ी सी तस्वीर दीवार पर टंगी मुस्कुरा रही थी।
विवेक तय नहीं कर पा रहा था कि कौन किसका शुक्रिया अदा कर रहा था, श्रुति महेश सर का या महेश सर श्रुति का।



2 टिप्‍पणियां:

Kailash ने कहा…

श्रुति की तस्वीर क्यूँ थी प्रिंसिपल सर के कमरे में?

varsha ने कहा…

Shruti boards mein achchhe number layi aur school ka naaam raushan kiya, isliye :)