गुरुवार, 19 सितंबर 2013

थैंक्स का असली हकदार

"उठ जा जल्दी, चार बज गए." नियति ने मेघा का कम्बल खींचते हुए कहा। .
परीक्षा का वक़्त था. करो या मरो की स्थिति थी।  मेघा उठकर बैठ गयी।  नींद पूरी नहीं हुई थी. बारह बजे तो सोये थे तीनों।
"उस मैडम को कौन उठाएगा?" मेघा ने निधि की तरफ इशारा किया।
"तू अपने को संभाल ले. वो तो पास हो जायेगी।"  नियति ने उसे बाथरूम की तरफ धकेल दिया। फिर खुद पढने बैठ गयी।  हाथ मुंह धोकर मेघा भी आ गयी।  दोनों पढ़ रहे थे, पर ध्यान निधि की ओर  था।   सुबह की पहली चाय वही उठकर पिलाती थी , तब जाकर इन दोनों की नींद टूटती थी।   पर कल रात उसकी तबियत ठीक नहीं थी, सर्दी हो गयी थी, इसलिए उसका सुबह इतनी जल्दी उठना ठीक नहीं था।   वो रात को ही पूरा कोर्स रिवाइज़ करके सो गयी थी ताकि सुबह आराम से उठ सके।
दोनों को झपकियाँ आ रही थी।  जैसे ही एक सोता, दूसरा उसे डांटकर जगा देता। ऐसा करते करते दोनों पाँच बजे तक खींच लिये।  फिर दोनों को एक साथ झपकी आ गयी।
कोई बडबडा रहा था, और जोर जोर से बर्तन पटकने की आवाज़ आ रही थी।  मेघा  की आँख खुली। घड़ी देखी तो छः बजने वाले थे।  निधि चाय कप में उड़ेल रही थी।  " अरे, मैं कब सोयी? और ये मोटी भी सो गयी! " मेघा ने नियति को झकझोर के उठाया। दोनों आँखें मल  रहे थे।  निधि ने दोनों को चाय पकडाई और खुद सो गयी।
थोड़ी देर तक दोनों निधि के बिस्तर की और देखते रहे, फिर पढने लगे।
"सुन ये टॉपिक रिवाइज़  कर लेना, सर ने बोला था". नियति ने मेघा को कहा।
"हुँह ये तो पिछले दस सालों में नहीं पूछा गया" .
"पढ़ ले, हर चीज़ बताकर नहीं पूछी जाती" .

आठ बजे उन्होंने निधि को उठाया।  दस बजे से पेपर थे।  निधि सबसे अंत में नहाने गयी।  बाहर आकर पीछे बरामदे में तौलिया सुखाने डाल  दिया। लौटते हुए उसकी नज़र मकानमालकिन मासी की तरफ गयी जो किचन में कुछ बना रही थी, शायद आलू के परांठे।  क्या ख़ुशबू आ रही थी! मासी निधि को देखकर मुस्कुराई फिर वापस काम पर लग गयी।  निधि एक पल के लिए ठहर गयी, शायद इस आस में कि मासी उसे बुलाके परांठे खिला दे, उसकी तबियत पर तरस खाते हुए! पर उनकी मासी तो एक एक धेले का हिसाब रखने वाली थी, इस तरह मुफ्त में उन्होंने ज़िन्दगी में किसी को नहीं खिलाया होगा।  निधि मन ही मन सोच रही थी कि इसकी जगह उसकी मम्मी होती तो अब तक कितनी बार सब लड़कियों को खाना खिल दिया होता।  स्कूल के दिनों में उसकी सहेलियों को पकड़ पकड़ के खिलाती पिलाती थी मम्मी, परेशान रहती थीं की ये चालीस ग्राम की लडकियां खायेंगी पियेंगी नहीं तो पढाई कैसे करेंगी ! खैर, मम्मियां भी अनेक प्रकार की होती हैं।  निधि  अन्दर चली गयी और कॉलेज के लिए तैयार होने लगी।
निकलते हुए मेघा ने निधि को एक पानी का फ्लास्क थमाया ,  ''अंट शंट पानी मत पीना।  ये गुनगुना पानी रख ले। ''

आज का पेपर बहुत कठिन था।  निधि का सेक्शन बाकी दोनों से अलग था, और इसलिए उसका रूटीन उन दोनों से अलग रहता था।  लेकिन  पढने के अलावा बाकी सब काम वे तीनो मिलके करते थे।  बहुत अपनापन था तीनो में, एकदम बहनों की तरह।  निधि चाय बनाती तो मेघा  बर्तन धो देती, नियति कमरा साफ़ कर देती।  इस तरह तीनो में गजब का तालमेल रहता।
ठीक दस बजे तीनो कॉलेज पहुँच गए  और एक दूसरे का हौसला बढाते हुए अपने अपने रूम्स में चले गये।

आज का पेपर सबके  लिए कुछ बदलाव लेकर आया था।  कई प्रश्न ऐसे थे जो किसी ने सोचे भी नहीं थे कि कभी पूछे जा सकते हैं, और इसलिए कई लोगों के परीक्षा के दौरान पसीने छूटने  लगे।  कुछ लडकियां बीच में ही रोने लगी।
मेघा कभी पेपर को देखती कभी आस पास के लोगों को ।  नियति की सलाह मानकर उसने जिन टॉपिक्स पर सरसरी निगाह डाल दी थी वही आज प्रश्न बनकर परीक्षा में आ गए थे।  मन ही मन नियति का शुक्रिया अदा करते हुए वो लिखने में जुट गयी। सुबह ही टॉपिक पढ़ा था इसलिए अच्छे से याद भी था। इस बार तो वो उस चश्मिश सुरेन्द्र प्रताप सिंह से ज्यादा मार्क्स लाकर रहेगी!

निधि का पेपर भी कठिन आया था पर यह उसका सबसे प्यारा विषय था इसलिए उसके पास लिखने को बहुत कुछ था।  नहीं थी  तो बस ताकत। एक घंटा होते होते उसका गला सूखने लगा।  उसने फ्लास्क खोलकर एक घूँट लिया तो स्वाद कुछ अलग लगा।  देखा तो पानी की जगह ग्लूकोस था ! ज़रूर लड़कियों ने रख दिया होगा, उन्ही को तो पता था उसकी तबियत के बारे में।   उसने गटागट आधा फ्लास्क खत्म कर दिया।  अब वो बाकी का पेपर लिखने के लिए तैयार थी।

पेपर ख़त्म होते ही तीनो लडकियां एक दूसरे  को ढूंढ रही थीं।  आस पास सभी लोगों के चेहरे उतरे हुए थे।  बस स्टैंड के पास तीनो लड़कियाँ मिलीं  और ऑटो करके घर आ गयीं।  थकान से बुरा हाल था, और भूख भी लग रही थी।  मेघा ने गैस में मैगी रख दी। निधि बिस्तर पर लेट गयी।  यूँ  तो निधि के रहते बाकी दोनों चूल्हे के पास नहीं फटकते थे, पर आज उसे आराम की ज़रुरत थी।
किचन से दोनों के लड़ने की आवाज़ आ रही थी।
"तूने अभी से क्यों मसाला डाल दिया? वो तो बाद में पड़ता है!" नियति मेघा  पर बिफर रही थी।
"जी नहीं, मैगी ऐसी ही बनती है , और तूने पानी इतना क्यों डाल दिया? दो कप डालना था! "
जैसे तैसे निधि के हाथ तक मैगी की प्लेट पहुँची। ज़बरदस्त भूख लगी थी सो तीनों मैगी पर टूट पड़े।
"देख निधि अगर खराब बनी हो तो मैंने नहीं बनाया, ठीक है?" नियति मेघा  को घूरते हुए बोली।
"हाँ हाँ पानी तो तूने डाला था देखा कैसे तैर रही है!" मेघा ने भी पलटवार किया।
निधि दोनों की दलीलें सुन रही थी और मुस्कुरा रही थी।  वास्तव में बहुत खराब बनी थी! पर भूख इतनी थी, और दोनों सहेलियों की नोकझोंक का तड़का भी उसका स्वाद बढ़ा रहा था, सो वो खाने में जुट गयी।
"यार निधि तू जल्दी से ठीक हो जा, मज़ा नहीं आ रहा। " नियति  तीनों की प्लेट लेकर पीछे बरामदे में चली गयी। निधि वापस बिस्तर में लेट गयी।

शाम के छह बज रहे थे , पर तीनों अलसाए से बिस्तर पर पड़े थे।

"वैसे थैंक्स यार तूने आज मुझे बचा लिया फेल होने से, तूने जो टॉपिक बोले थे वो सच में आ गए।  "
"थैंक्स मुझे मत बोल, उस मैडम को बोल जिसने तुझे इतनी बीमारी में भी चाय पिलाके  उठाया और दो घंटे एक्स्ट्रा पढाई करवा दी तेरी। खर्राटे भर रही थी तू पावर इलेक्ट्रॉनिक्स के पीछे । "
"मैं अकेले क्यों बोलूँ, तू भी बोल, तुझे भी तो उठाया था।  "
हे भगवान्, ये दोनों किसी भी मुद्दे पर लड़ सकते हैं , निधि सोच रही थी। फिर तकिये के सहारे उठकर बैठ गयी।

"थैंक्स तो मुझे तुम लोगों को बोलना चाहिए, मेरी तो हालत खराब थी जब मैंने वो पानी पिया था, बाद में पता चला कि तुमने उसमें ग्लूकोस डाला हुआ था। तब जाकर मैं पेपर पूरा लिख पायी थी! आज तुमने मुझे फेल होने से बचाया है, मैंने नहीं। "
मेघा हँसते हुए बोली "अरे यार हम लोग इतने महान नहीं हैं, मैं तो बस तेरे लिए गुनगुना पानी भरने के लिए मासी के पास गयी थी , फिर उनको पता चला तो उन्होंने हमको ग्लूकोस दे दिया था। इसलिए थैंक्स की असली हकदार तो मासी हैं !"

"और हाँ अभी याद आया, आज रात का खाना भी मासी के घर है। " मेघा की ट्यूबलाइट जल उठी।

"मासी के घर ? क्यों अचानक ?" नियति को हजम नहीं हो रहा था।
"पता नहीं।  सुबह बोलीं थी मुझे। "

निधि को शायद जवाब मिल गया था  और वो मुस्कुराते हुए किचन चली गयी थी चाय बनाने । मम्मियाँ अनेक प्रकार की होती हैं, पर वो मम्मी ही क्या जो चालीस ग्राम की बीमार लड़की को देखकर न पसीजे।









2 टिप्‍पणियां:

Nawal ने कहा…

maja aa gaya!!!

Kailash ने कहा…

सुबह मासी परांठे के लिए पूछ लेतीं तो ग्लूकोस की जरुरत भी नहीं पड़ती। Anyways, देर आए, दुरुस्त आए। :)