रविवार, 1 सितंबर 2013

शनिवार के वे आंसू..

"मम्मा ऑफिस मत जाओ", रिशु  ने मालती का  दुपट्टा पकड़ लिया। आज शनिवार था और उसके स्कूल की छुट्टी थी। बाकी दिन तो वो मालती के निकलने से पहले स्कूल चला जाता था और स्कूल बस में बैठकर उसे  बाय बाय भी करता था पर शनिवार के दिन वो सुबह से उसे  घेर लेता था और मालती का  ऑफिस निकलना मुश्किल हो जाता था।  जैसे जैसे घडी का काँटा बढ़ता जाता और ऑफिस जाने की तैयारी तेज होती जाती, रिशु की  पकड़ और मज़बूत होती जाती। अंत में मालती को  उससे जबरन अलग होकर बाहर निकलना पड़ता।
जब तक वो छोटा था और नासमझ था तब तक घर के अन्य सदस्य उसे बहला फुसला कर मालती के निकलने का इंतजाम कर देते थे। अक्सर वो देर से भी उठता था और तब तक मालती  निकल चुकी होती थी. पर जबसे उसने स्कूल जाना शुरू किया था तब से उसके छुट्टी वाले दिन मालती को  भारी पड़ जाते थे। अब तो उसे सुबह जल्दी उठने की आदत भी हो गयी थी। उठते ही वह अपनी मम्मी को  घर पर रोकने की कोशिश में लग जाता।

मेज पर मासी  ने मालती और रिशु का नाश्ता रख दिया था।  नाश्ते में दलिया  था जो रिशु को बिलकुल पसंद नहीं था। देखते ही बोला मम्मा रिशु दलिया नहीं खायेगा। मालती ने  थोड़ी कोशिश की उसे खिलाने की पर उसने मुंह नहीं खोला। मालती के पास अधिक समय नहीं था कि उसे बहला फुसला के खिला सके इसलिए उसने अपनी प्लेट उठायी और जल्दी जल्दी खाने लगी। रिशु उसे  टुकुर टुकुर देख रहा था।  मालती ने धीरे से कहा कि  अगर तुम दलिया नहीं खाओगे तो मम्मा ऑफिस चली जाएगी, पर उसपर कहाँ कोई असर होने वाला था।  उसकी जिद के आगे तो बड़े लोग मुंह भी नहीं खोल सकते थे।  
मालती की  नज़र दीवार पर लगी घड़ी की तरफ थी।  निकलने का वक़्त हो रहा था।  उसने  नाश्ता ख़त्म करके बैग उठाया और निकलने लगी।
रिशु ने दौड़कर उसका दुपट्टा पकड़ लिया। उसकी पकड़ बहुत मज़बूत थी, बड़ी मुश्किल से छुड़ा पायी मालती खुद को।  वक़्त हो गया था इसलिए दिल पर पत्थर रखकर बाहर निकल गयी और नम आँखों से तेज़ी से गैरेज की तरफ बढ़ने लगी, मन ही मन खुद से वादा करते हुए कि अगले शनिवार ज़रूर छुट्टी लूंगी और रिशु के साथ खूब वक़्त बिताउंगी।
पीछे से रिशु के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी."मम्मा ऑफिस मत जाओ, रिशु दलिया खायेगा मम्मा। "
आंसू अब सैलाब बन चुके थे।


वक़्त बीतता गया।  रिशु अब बड़ा हो गया था।  अब वो मम्मा को  ऑफिस जाने से नहीं रोकता था, खिड़की से बाय बाय करता था।  फिर टीवी में छोटा भीम देखने बैठ जाता था।  पर शनिवार के मालती के वे आँसू अब भी बहते थे, शायद खोये हुए उन मासूम लम्हों की याद में,  जो अब कभी लौटकर नहीं आने वाले थे। 

3 टिप्‍पणियां:

PD ने कहा…

ज़िन्दगी के खेल निराले हैं, है ना?

varsha ने कहा…

हाँ प्रशांत बहुत निराले हैं, अब समझ में आ रहे हैं, पर हैं खूबसूरत!

Kailash ने कहा…

:)