गुरुवार, 21 अप्रैल 2011

हूँ मैं वही..


ज़िन्दगी के पन्नों में मुरझाती सी इक कली हूँ
ढूंढो तो शायद खुशबुओं का पता मिलेगा.

आईने में जमी बरसों की परतों तले
तकती आँखों में ख्वाबों का मकां मिलेगा.

उम्र की बेतरतीब झुर्रियों में दफ़न कहीं
यौवन के हर मौसम का निशाँ मिलेगा.

हूँ मैं वही, बस नज़रिए ज़मानों के बदल जाते हैं.
हूँ मैं वही, बस पते ठिकानों के बदल जाते हैं.

4 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

हूँ मैं वही, बस नज़रिए ज़मानों के बदल जाते हैं.
हूँ मैं वही, बस पते ठिकानों के बदल जाते हैं.
बहुत भावुक कविता

महेश बारमाटे "माही" ने कहा…

bahut badhiya kavita...

aabhar aapka

संजीव ने कहा…

चिरंतन सत्‍य.

Vinay Prajapati ने कहा…

नववर्ष 2013 की हार्दिक शुभकामनाएँ... आशा है नया वर्ष न्याय वर्ष नव युग के रूप में जाना जायेगा।

ब्लॉग: गुलाबी कोंपलें - जाते रहना...