बुधवार, 17 जून 2009

बेफजूली

शायद यही मंज़र हमारे
ख़्वाबों में आता होगा
शायद यही देखकर हम
आज ठिठक कर ठहरे हें.

जंजीरों में गर लिपटते
तो टूटने की आस होती
वो भला क्या करे, जिसपर
आंखों से लगते पहरे हें.

कैसी बातें करते हें
एक चिराग से क्या होगा
लाखों भी फीके पड़ेंगे
ये गर्त खासे गहरे हें

बड़े जतन से बनाती हूँ
उनके लिए ये घरोंदा
पर बिगाड़ जाती है, वो
जिसके बाल सुनहरे हें

पूछे वो, तो खामोश रहना
फ़िर पूछे तो भी चुप रहना
न माने, तो कह देना
हम आजकल ग्रीनलैंड में ठहरे हें।

6 टिप्‍पणियां:

‘नज़र’ ने कहा…

अनमने भावों में ख़ुद समेटकर उड़ती कविता

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गुलाबी कोंपलें

राज भाटिय़ा ने कहा…

अति सुंदर कविता

डॉ .अनुराग ने कहा…

बड़े जतन से बनाती हूँ
उनके लिए ये घरोंदा
पर बिगाड़ जाती है, वो
जिसके बाल सुनहरे हें

पूछे वो, तो खामोश रहना
फ़िर पूछे तो भी चुप रहना
न माने, तो कह देना
हम आजकल ग्रीनलैंड में ठहरे हें।


दिलचस्प...

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

वो भला क्या करे, जिसपर
आंखों से लगते पहरे हें.

खूबसूरत भाव|

Major Maneka ने कहा…

Its easy to say we love, but difficult to demonstrate daily.

nice work

Rangraj Iyengar ने कहा…

आपकी बहुत ही उम्दैा पंक्तियाँ
बड़े जतन से बनाती हूँ
उनके लिए ये घरोंदा
पर बिगाड़ जाती है, वो
जिसके बाल सुनहरे हें

अभिनंदन.