शनिवार, 6 जून 2009

खंडहरों में कहीं जिंदगी बसती है

कुछ दिनों से हम
थोड़ा परेशान थे.
मंजिलें नाराज़ थीं
रास्ते वीरान थे.
धुंधले आईने में हमने
जिंदगी को निहारना चाहा.
तपती धुप के ओज से
रूप निखारना चाहा.
शाम की उदासियों से भी
काजल उतारना चाहा.
पैबंद लगी रूह से
जिस्म संवारना चाहा.
जी किया की जिंदगी को
हिस्सों में बाँट दें,
गम कहीं छोड़ दें
खुशियाँ सब छांट लें.
कभी तो इन काँटों में
फूलों का निशाँ मिलेगा,
खँडहर के उस पार
एक आशियाँ मिलेगा.
लेकिन जब ये सिलसिला
कहीं थमता न दिखा,
खँडहर के उस पार
कोई आशियाँ न दिखा,
तब कहीं महसूस हुआ
के ये कांटे ही तो
जिंदगी भर साथ दिए,
ये खँडहर ही तो
धूप दिए, हवा दिए
दो पल का आसरा दिए,
कुछ बेहतर पाने का जज्बा दिए.
बीच राह में गर
ठंडी छाँव मिल जाए,
तो क्या हम कभी
अंजाम तक पहुँच पायेंगे?
जो बसंत में ही रह गए
तो बाकी के मौसम
क्या कभी देख पायेंगे?

3 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर, कविता है

विवेक सिंह ने कहा…

दिल छू लिया कविता ने !

Major Maneka ने कहा…

very touching