शुक्रवार, 3 अप्रैल 2009

मानव धर्म और इस्लाम

आज ही एक ख़बर आई, पाकिस्तान के तालिबानिकृत क्षेत्र में एक लड़की को इसलिए कोड़े लगाए गए क्योंकि वो किसी व्यक्ति के साथ थी जो उसका शौहर नहीं था।
समझ में नही आ रहा इस पर क्या टिप्पणी दें, धीरे धीरे एक ज़हर इस दुनिया की नस नस में फैलने को आमादा है, ओबामा उसी के इलाज के लिए इतना पैसा पकिस्तान में फूंक रहे हें। किंतु क्या इस लगातार बढ़ रही शक्ति को रोक पाना सम्भव होगा, बिना उन मुस्लिमों के समर्थन व जागरण के जो स्वयं को इससे अलग करके चलते हें व जिन्हें अंग्रेजी में 'moderate muslims' कहा जाता है।

जब तक यह वर्ग इस्लाम का व इसके धर्म ग्रन्थ कुरान की सही शिक्षा को सामने नही लाते तब तक एक पवित्र धर्म ग्रन्थ की आड़ में जाने कितने अमानवीय कृत्य होंगे, जिनकी शुरुआत हो चुकी है।

क्या कहेंगे आप उस 'सज़ा' को जिसमें एक स्त्री पर कोड़े बरसाए जाते हें पर जिस कृत्य के लिए उसीमें भागीदार एक पुरूष को आंच भी नहीं आती। क्यों वह पुरूष बेक़सूर है पर स्त्री गुनाहगार, जबकि साथ तो दोनों चल रहे थे। क्यों इमराना जैसी जाने कितनी मासूम निर्दोष महिलाओं को पहले तो कुकृत्य का शिकार होना पड़ता है फिर उसकी सज़ा का! इससे अधिक अमानवीय क्या हो सकता है।

मैं नही मान सकती की इस्लाम में या फ़िर किसी भी धर्म ग्रन्थ में जिसका पूज्य कोई न कोई इश्वर होता है, वहाँ एक स्त्री को जानवर से बदतर हाल में रखा जाने का हुक्म हो, सारे नियम क़ानून पुरुषों के हक़ में हों, वो जब चाहे शादी करें, जब चाहें तलाक़, यदि ससुर अपनी बहू के साथ कुकृत्य करे तो उसकी सज़ा बहू को मिले!
स्त्री तो जननी है, सृष्टि की नींव है, ममता का स्रोत है, जिस समाज में स्त्री को पशु से या फ़िर किसी घर पर पड़ी वस्तु से बदतर माना जाए, उस समाज का क्या किया जाए? कैसे छोड़ दिया जाए इस विष को फैलने से। कैसे चुप्पी रखी जाए? इस्लाम में उच्च शिक्षित व जागरूक स्र्तियों का अकाल तो नहीं लगता, फ़िर इन सब यातनाओं के ख़िलाफ़ कहीं से आवाज़ क्यों नहीं सुनाई देती?
जब आपके घर में कलह हो तो पड़ोसी से तो उसे सुलझाने की उम्मीद नहीं की जा सकती, हालांकि शोर शराबे से परेशान वो भी होते होंगे। उसी तरह इस्लाम की आड़ में उल जुलूल कायदे क़ानून का निर्वाह करने वाले तालिबानियों का विरोध यदि मुस्लिम सम्प्रदाय ही न करे तो बाकी धर्मों तर्क वे भला क्यों सुनेंगे।।
किसी भी धर्म का कार्य है मानव में जीवन मूल्यों के निर्वाह के प्रति निष्ठां का संचार करना। यदि वे जीवन मूल्य ही अमानवीयता की नींव रखते हों तो उनका निर्वाह करना मानव धर्म नही हो सकता। जो धर्म एक मानव को दूसरे का शत्रु बना दे, जो स्त्री का सम्मान करने के बजाय कदम कदम पर उसका तिरस्कार करे, वह इस्लाम नहीं हो सकता। यकीनन इस्लाम धर्म में या किसी भी अन्य धर्म में जिसके प्रेरणा स्रोत इश्वर हों, इस तरह के अमानवीय कृत्यों की इजाज़त नहीं दी जा सकती।
अतः आवश्यकता है इस्लाम धर्म के उन अनुयाइयों से जो स्वयं को तालिबान का समर्थक नही कहते, की वे एकजुट होकर व कुरान का भली भाँती अध्ययन कर उसका वास्तविक अर्थ सबके समक्ष रखें व यह साबित करें की उनका धर्म अर्थात इस्लाम एक मानव धर्म है।

4 टिप्‍पणियां:

अनिल कान्त : ने कहा…

ये धर्म और समाज बस शोषण के लिए बनाये गए हैं ...चाहे हिन्दू धर्म हो मुस्लिम धर्म या कोई और ...सब अपना फायदा करते हैं

गर्दूं-गाफिल ने कहा…

किसी भी धर्म का कार्य है मानव में जीवन मूल्यों के निर्वाह के प्रति निष्ठां का संचार करना। यदि वे जीवन मूल्य ही अमानवीयता की नींव रखते हों तो उनका निर्वाह करना मानव धर्म नही हो सकता। जो धर्म एक मानव को दूसरे का शत्रु बना दे, जो स्त्री का सम्मान करने के बजाय कदम कदम पर उसका तिरस्कार करे, वह इस्लाम नहीं हो सकता।
वर्षा जी
आपकी चिंताएँ वाजिब हैं । मगर इन गुनाहों के पीछे बडे स्वार्थ हैं । इनसे आम आदमी नही लड़ सकता ।
फिर भी
कल्याण दया ममता की लहर उठती है जो तेरे सीने में
आनंदित जग जीवन के लिए इसमे थोड़ा सा शौर्य मिला
अनिल कान्त : ने कहा…
ये धर्म और समाज बस शोषण के लिए बनाये गए हैं ...चाहे हिन्दू धर्म हो मुस्लिम धर्म या कोई और ...सब अपना फायदा करते हैं
अनिल कान्त जी ,
दुनिया में पांचो उंगलिया बराबर नही होती हैं । धर्म शब्द के लोक भाव के स्थान पर मूल अर्थ में जाने का अनुरोध है

राज भाटिय़ा ने कहा…

अब क्या कहे वर्षा जी, आप पकिस्तान की बात करती है, यह सब तो अरब देशो मै सदियो से हो रहा है, अफ़गानिस्तान मै भी....तुर्की, तुर्कमान सभी मुस्लिम देशो मै यही हाल है...
धन्यवाद

Mired Mirage ने कहा…

आपका संदेश तो सही है। वैसे अरब देशों में ऐसा होता रहा है और होता रहेगा। धर्म में क्या है और लोग उसको क्या समझ रहे हैं इस मसले पर तो धर्म के अनुयायी ही बोल सकते हैं। मैं तो केवल इतना जानती हूँ कि वहाँ के समाज में स्त्रियाँ कार नहीं चला सकतीं, बाहर अकेले नहीं जा सकती पति, पिता या भाई के ही साथ जा सकती हैं। जरा सोचिए एक स्त्री बीमार है, पति नाराज है तो वह डॉक्टर के पास नहीं जा सकती।
वहाँ के समाज में अनजान असम्बन्धित स्त्रियों से भी बातचीत करने को गलत माना जाता है। मकान की दीवारें ऐसी ऊँची होती हैं कि पड़ोसी भी नजर न आएँ। तीन साल के अपने साऊदी अरब के प्रवास में मैं शायद ही कभी किसी अरब स्त्री से बोली होऊँगी। केवल दो तीन बार उन्हें हमारे रखे कार्यक्रमों में आने की अनुमति (यह शब्द अपने आप में मनुष्य को कितना छोटा बना देता है !)मिली थी। बच्चियों की तरह आह्लादित होकर वे हमारे खेलों में भाग ले रही थीं। ठीक वैसे ही जैसे स्कूली बच्चे स्कूल छूटने पर खुश दिखते हैं।
सौभाग्य से हमारे कारखाने व उसको चलाने वाले भारतीय समाज को विशेष छूट मिली हुईं थीं सो हम अपनी बस्ती में उतना कैद नहीं महसूस करती थीं।
घुघूती बासूती