शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

दरजी का दर्शनशास्त्र


पिछले कुछ दिनों से मैंने अपने दूसरे वाले ब्लॉग पर खूब 'उपदेश ' दिए थे और ख़ुद को ही 'अल्टीमेट फिलोसोफेर' समझ बैठी थी। लेकिन आज का एक वाकया मुझे समझा गया की फिलोसोफर तो गली कूचों में मिल जाते हें, आधी फिलोसोफी तो ज़िन्दगी सिखा जाती है।
हुआ ये की मै अपनी कल की पोस्ट डालने के बाद अपनी सहेली के साथ एक दरजी की दूकान में गई, उसे सूट सिलवाने देना था।
सहेली का मोबाइल बजा तो वो थोडी दूर चली गई बात करने के लिए।
इस बीच उस दरजी ने, जो की हमें पहचानता था पहले भी हम उसके पास जाते रहते थे, मुझसे वार्तालाप शुरू किया। पढ़ाई लिखाई, नौकरी, वगैरह।
फ़िर अपने काम में मग्न होकर बोलने लगा," देखिये न सभी की तो कोई न कोई समस्या होती है जो वो घर छोड़कर बाहर निकलता है। आपको अपने पैरों पर खड़े होना है, हमें रोजी रोटी का जुगाड़ करना है, पर ये जो गुरु घुमते रहते है इधर से उधर जो उपदेश देते रहते हें? ये तो सबकी समस्या दूर करने का वादा करते हें पर इनकी अपनी क्या समस्या है जो इस तरह घुमते रहते हें! घर पर क्यों नही बैठते? हमें कोई समस्या नही होती तो हम तो घर छोड़कर इतनी दूर न आते ."
हमने कहा हाँ भाई गुरु के बारे में क्या बोलें कोई मानता है कोई नही मानता है, क्या कह सकते हें। उन्हें दूसरों की समस्या सुलझानी होती है।
वो बोला नही इतना पढने लिखने के बाद भी कोई इन सब के झांसे में आ जाता है? अगर ये वाकई सबकी समस्या का समाधान कर सकते तो सबसे पहले अपनी समस्या का न करते?
हम बोले भैय्या ये तो गुरु ही जाने उसके दिल में क्या है, क्यों इतना घूमता है, हमें तो इतना पता है कि वो अच्छी शिक्षा देगा तो हम सुनेंगे वरना तो हमें भी फुर्सत नही।
वो इस बात से सहमत नज़र आया और ये किस्सा वही ख़त्म हो गया, फिर हमने भी उसका गाँव वगैरह पूछा। तब तक हमारी सहेली भी लौट चुकी थी।
घर आकर हमने विचार किया की जरूर उसने थोडी देर पहले किसी घुमते घामते गुरु या बाबा को देख लिया होगा जो इतना व्यथित था किसी को सुनाने की लिए।
यूँ तो हम भी किसी गुरु को नहीं मानते, सोचते हें भगवान् से सीधा कनेक्शन हो जाए, पर यह जानते हें कि कुछ गुरु होते है, या होते थे, जो वास्तव में सिर्फ़ दूसरों को सही मार्ग दिखाने, उन्हें मोह माया से परे कि दुनिया दिखाने और इश्वर तक पहुँचने का मार्ग दिखाने के लिए निकल पड़ते थे। गौतम बुद्ध, स्वामी विवेकानंद, और भी कई।

आजकल ऐसे गुरुओं के मिलने कि उम्मीद नही जो एक गुरु के मकसद को पूरा करे। आजकल तो गुरु भी प्रोफेशनल हो गए हें। वक्त के साथ चलते हें, पर सच कहें, तो वो श्रद्धा अब नही आ पाती अन्दर से, जो एक सच्चे गुरु को देखकर आनी चाहिए। अब तो लगता है कि इन सब को किनारे करके ख़ुद ही मोक्ष का मार्ग ढूँढा जाए।

दरजी की फिलोसोफी ने कुछ तो सोचने पर मजबूर कर दिया!

6 टिप्‍पणियां:

Pratik Pandey ने कहा…

ऐसे ख़तरनाक दर्ज़ियों से बचा कीजिए। जो काम तथाकथित गुरू लोग घूम-घूमकर कर रहे हैं, वो काम ये सज्जन दुकान पर बैठकर ही कर रहे हैं... यानी उपदेश देने का काम। :)

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी पोस्ट लिखी है।

PN Subramanian ने कहा…

काम की बात जो भी करे वो गुरु. इस लिहाज से दरजी भी गुरु की श्रेणी में आ जाता है. लेकिन सोचिये उसकी सोच कितनी सधी हुई है. आभार.

राज भाटिय़ा ने कहा…

सच कहू, कि इस दर्जी ने बहुत काम की बात कही,आज के गुरु, कल के लफ़ंगे ही है,जो भोली भाली जनता को लुटते है , इन्हे हम से भी ज्यादा लालच है, यह हमे क्या शान्ति का रास्ता बतयेगे, जो खुद ही माया के पीछे भाग रहे है.
धन्यवाद

डॉ .अनुराग ने कहा…

वो आज हाथ खोले बैठा है.
कल तक बताता था जो सबका मुकद्दर

Pt.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…

वास्तव में जो जीवन जीने का मार्ग प्रशस्त करता है, वही सच्चा गुरू है.ओर वो कोई भी हो सकता है.वो किसी के लिए आप भी हो सकती हैं.
अभी ऊपर जो कुछ सुब्रम्नियम जी ने कहा ,बिल्कुल सही कहा है.