शनिवार, 7 फ़रवरी 2009

शून्य के फेर से कौन बचा

शून्य की फितरत देखिये
कितना भी गुणा  भाग करें
ये कहाँ बदलता है
अच्छे भले अंकों को
शून्य बनाकर रहता है।
जब से इसकी खोज हुई है
जनता इसपर पिली हुई है
कहीं चंद दौलतमंद
खाते में शून्य की संख्या बढाते रहते हैं।
कहीं करोड़ों भूखे नंगे
सुबह की शुरुआत शून्य से करते हैं
शाम को उसी पर आकर ठहरते हैं।
कहीं चरित्र का पतन हो
कहीं आदर्शों का हनन हो
हम बस शून्य में ताकते हैं।
कभी कभी सोचते हैं
क्या जरूरत थी इसकी खोज करने की
'कुछ नहीं' से तो 'कुछ' ही बेहतर था।
आज हम इस कदर
भावशून्य, चेतनाशून्य
संवेदनाशून्य तो न होते।
पड़ोसी के घर आग लगती
तो हम चैन से तो न सोते।

8 टिप्‍पणियां:

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बहुत खूब. शून्या का जैसा उपयोग आपने किया है, अदभुत है.

राज भाटिय़ा ने कहा…

क्या बात है , इस शुन्या ने तो कमाल कर दिया.
धन्यवाद इस सुंदर कविता के लिये

परमजीत बाली ने कहा…

अच्छी रचना है।बधाई।

संगीता पुरी ने कहा…

सही है.....शून्‍य के फेर से कोई नहीं बचा आजतक.....बहुत सुंदर प्रस्‍तुतीकरण है।

विनय ने कहा…

बहुत सही कविता है!

---
गुलाबी कोंपलें

sanjay vyas ने कहा…

कोई पंक्ति याद आई---शून्य में से सृजन करके!उम्दा.

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

पड़ोसी के घर आग लगती
तो हम चैन से तो न सोते।

saral shabdon me gahri baat kahi hai aapne.

Dileepraaj Nagpal ने कहा…

aadi se ant tak shunya. kisi number ke aage jitne shunya hon utna acha...khas toor per noto m...kyun...shukriya