शनिवार, 14 फ़रवरी 2009

भ्रष्टाचारियों से कुछ प्रश्न



जी करता है
जाकर पूछूं,
किसके लिए यह सब करते हो?


मीठे फल तो
सब मिलकर खाते,
पकड़े जाने पर तो तुम ही भुगतते हो।

ख़ुद की परछाई
अंधेरे में साथ नही देती,
दूसरों से फिर क्यों उम्मीद करते हो?

मन के किसी कोने में
उपेक्षित सी पड़ी है,
जिस खुशी के लिए दर दर भटकते हो।

नाम तक न लेंगे
अपनी जुबान से तुम्हारा
जिन सात पुश्तों के लिए मेरी जेब कुतरते हो।

क़ानून से बच गए
पर उससे बचके कहाँ जाओगे
जिसके खौफ से रोज़ आईने बदलते हो।

6 टिप्‍पणियां:

योगेन्द्र मौदगिल ने कहा…

वाहवा.... सही बात है.. आईना रास्ता नहीं दिखाता.. वाह वर्षा जी वाह........

राज भाटिय़ा ने कहा…

वर्षा जी, आप ने बहुत सुंदर लिखा, लेकिन इन सब मै हम सब भी तो शामिल है, कोई भी छोटा सा काम भी क्यो ना हो हम हमेशा.... देखते है कोई जानपहचान, कुछ ले दे के हो जाये काम, बस यही हम बन्द कर दे तो यह भ्रष्टाचारी आधी तो युही खत्म हो जायेगी , बाकी फ़िर देखेगे.
धन्यवाद

विनय ने कहा…

अच्छी कविता!

asha ने कहा…

सही है......बहुत सुंदर प्रस्‍तुतीकरण।

अनुनाद सिंह ने कहा…

सुन्दर कविता में छिपा उच्च दर्शन !

Dr. Purushottam Lal Meena Editor PRESSPALIKA ने कहा…

शानदार रचना। साधुवाद।
-डॉ. पुरुषोत्तम मीणा निरंकुश, सम्पादक-प्रेसपालिका (जयपुर से प्रकाशित पाक्षिक समाचार-पत्र) एवं राष्ट्रीय अध्यक्ष-भ्रष्टाचार एवं अत्याचार अन्वेषण संस्थान (बास) (जो दिल्ली से देश के सत्रह राज्यों में संचालित है। इसमें वर्तमान में ४२८० आजीवन रजिस्टर्ड कार्यकर्ता सेवारत हैं।)। फोन : ०१४१-२२२२२२५ (सायं : ७ से ८)