गुरुवार, 12 फ़रवरी 2009

'आम भारतीय' की प्रेम परिभाषा.

सबने पूछा, "प्रेम दिवस पर

'उन्हें' क्या तोहफा ख़ास दोगी?

गुची का परफ्यूम दोगी

या राडो की वाच दोगी?"

हम बस हंसकर निकल लिए

नादानों को क्या समझाएं,

सब कुछ मेरा 'उनका' ही है

खाते फ़िर क्यों अलग बनाएं?

उन्हें याद करने को लेकिन

एक दिवस पर्याप्त न होगा,

प्रेममई मेरी दुनिया में

यह दिन तो हर रोज़ मनेगा।



यह पंक्तियाँ मेरे 'उन' के लिए समर्पित हैं जो मेरे प्रेरणास्रोत बनकर जीवन में आए हैं।

अब हम अपने असली रूप में वापस आते हैं, प्रेम रस में कम, वीर रस में अधिक सहज महसूस करते हैं! तो अब हम एक 'आम भारतीय' की और से वैलेंटाइन डे के मद में झूमते को यह संदेश देना चाहते हैं :



मेरे भारत में न प्रेम को
एक दिवस में आँका जाता।
और न ही हर वैलेंटाइन को
अपना प्रेमी बदला जाता।
सच तो यह है, प्रेम कड़ी है
जिससे जुड़ता सबका नाता।
हर प्राणी से प्रेम हमें है
सबके संग हमारा खाता।

8 टिप्‍पणियां:

रंजना ने कहा…

क्या कहें वर्षा,आपने तो दिल जीत लिया......वाह !!!
क्या बात कही है.....कोई इन तथाकथित प्रगतिशीलों(???) को यह पढ़वाए और समझाए....

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

बात तो आपकी बिलकुल सही है. लेकिन आपकी यह बात वैलेंटाइनवादियों की समझ में आएगी नहीं.

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" ने कहा…

वाह वर्षा जी, अति उत्तम विचार हैं आपके, बहुत खूबसूरत लगे ये रचना
>>>>>उन्हें याद करने को लेकिन ,एक दिवस पर्याप्त न होगा," भारतीय संस्कृति की तारीफ के लिए हम आपके आभारी हैं...
- विजय

राज भाटिय़ा ने कहा…

वाह वर्षा जी आप ने तो दिल की बात कह दी, हमारे भारत मै तो रोज ही प्रेम का दिन होता है, सही कहा, मुझे आज इतने साल होगये इन लोगो मै रहते लेकिन इन का रंग मुझ पर नही चढा,यानि मेने आज तक यह दिन नही मनाया, कई बार दोस्तो ने पूछा तो मेरा यही जबाब होता है की भारत वासी तो रोजाना यही दिवस मनाते है, फ़िर दिखावा केसा.
धन्यवाद

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

बहुत सुंदर विचार हैं.
इसीलिये तो एक वर्ष में हमारे चार सौ त्यौहार होते हैं जबकि पश्चिम को मदर्स दे, फादर्स दे आदि का आविष्कार करना पड़ रहा है.

Hari Joshi ने कहा…

मन को भा गई आपकी पोस्‍ट। आभार आपका इतनी भावपूर्ण पंक्तियां पढ़वाने के लिए।
अब बात रंजना जी की टीप पर। बेहतर यही है कि हम प्रगतिशीलों या कथित प्रगतिशीलों के चक्‍कर में न पड़ें। अगर मुझे प्रेमचंद या टॉलस्‍टाय पसंद हैं तो मैं पढ़ंगा और यदि कोई देवर-भाभी के किस्‍से या वर्दी वाला गुंडा पढ़ना चाहता है तो हम उसे रोक तो नहीं सकते। ये उनका लोकतांत्रिक अधिकार है। इसे हमें समझना चाहिए।

रंजना [रंजू भाटिया] ने कहा…

बहुत बढ़िया लिखा है आपने खूबसूरत एहसास

Yuva ने कहा…

प्रकृति ने हमें केवल प्रेम के लिए यहाँ भेजा है. इसे किसी दायरे में नहीं बाधा जा सकता है. बस इसे सही तरीके से परिभाषित करने की आवश्यकता है. ***वैलेंटाइन डे की आप सभी को बहुत-बहुत बधाइयाँ***
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