गुरुवार, 5 फ़रवरी 2009

सिगरेट उनकी जिगरी दोस्त, पर कब तक?


वो कहते हें सिगरेट छोड़ी नही जाती
कैसे चुटकियों में पीछा छुडा दें?
सालों से जिससे दोस्ती निभाई है
पल भर में वो सब नाते भुला दें?

तो जनाब जरा अब हमारी भी सुनिए
मारना न चाहते हो तभी नही मरती है,
दोस्त मानकर जिसे सीने से लगाए हें
सबसे पहला वार तो आपको पे ही न करती है?

धू धू करके जब जलेंगे टुकड़े जिगर के
हमें तो बस थोडी आंच महसूस होगी,
दम लेने को भी जब आपके दम न बचे
हमें वो घुटन क्या ख़ाक महसूस होगी?

7 टिप्‍पणियां:

आशीष ने कहा…

I don’t know how can divorce this bloody cigarette form my life

विनय ने कहा…

सिगरेट पीना बुरी बात है! आपकी कविता सराहनीय है!

राज भाटिय़ा ने कहा…

हम किसी जमाने मै खुब पीते थे, फ़िर हम ने अपने बेटे के कहने से एक दम छोड दी, कोई लाभ नही इस सिगरेट से हानिया बहुत है, बस एक लाभ है... कि सिगरेट के बहाने आप की सुंदर सी कविता पढने को मिल गई.
धन्यवाद

Udan Tashtari ने कहा…

बहुत बढ़िया रचना. सन २००५ में सिगरेट को अलविदा कह दिया, फिर कभी हाथ नहीं लगाया.

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

"सिगरेट उनकी जिगरी दोस्त, पर कब तक?"
आखिरी दम तक?

Krishna Patel ने कहा…

cigarette pina bahut buri bat hai.
bahut achchhi kavita hai.keep it up.

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

मेरे एक मित्र कहा करते थे,
"जिसको एक बार होठों से लगाया, उससे कैसे पीछा छुडा लें!"

"प्यार करना भी तो एक रोग है"!!!!!!!!