बुधवार, 4 फ़रवरी 2009

एक मग पानी में स्नान.

बहुत वर्ष हो गए इस अनुभव को, पर जैसे हर किस्सा गुजरने के बाद भी कुछ कड़ियाँ बिखेर देता है, यह भी स्मृति में ऐसा रच बस गया है की कभी बरबस याद जाता है, फ़िर जीवन रुपी पहेली से जूझने को एक और 'क्लू' मिल जाता है

पहाडों में उन दिनों अधिक अंग्रेज़ी माध्यम के स्कूल नही होते थे, जो इक्के दुक्के होते थे उन्ही से काम चलाना पड़ता था, उसी में हर वर्ग के विद्यार्थी आते थे।

ऐसे ही एक स्कूल में हमने भी पांचवी के बाद दाखिला लिया वहीं से ख़ुद में और थाकथित 'एलीट क्लास' के बच्चों में फर्क जानना शुरू किया

उस वक्त बहुत मासूम थे, पुरानी हिन्दी फिल्मों की तरह हमारे लिए दुनिया में हर चीज़ बस अच्छा या बुरा होता था, 'ग्रे' शेड के बारे में, दुनिया की असमानताओं के बारे में, कहाँ कुछ मालूम होता था

एक साल बाद यानी सातवी में हमारे स्कूल में एक ट्रेकिंग कैंप के आयोजक आए व सिर्फ़ लड़कियों के लिए १० दिनों के ट्रेकिंग कैंप की घोषणा की। पूरे कसबे के विद्यालयों से लडकियां उसमें भाग ले सकती थीं।
उस दिन हमारे स्कूल से काफ़ी लड़कियों ने इसमें दिलचस्पी दिखायी। सभी ने मिलकर वहाँ जाने के प्लान बना डाले। नाम लिखवाने की कार्यवाही भी शुरू हो गई।
हमने भी सारी तैयारियां कर लीं व नियत दिन हम बोरिया बिस्तर बांधकर स्कूल पहुँच गए जहाँ से हमें कैंप की ओर रवाना होना था।
स्कूल पहुंचकर हम क्या देखते हें की कोई भी लड़की कैंप जाने के लिए तैयार होकर नही आई थी। हमें लगा की शायद तिथि बदल गई हो और हमें पता न चला हो, पर धीरे धीरे पता चला की सब लड़कियों ने अपने नाम वापस ले लिए थे। अंत में पूरे स्कूल की तरफ़ से सिर्फ़ तीन लडकियां, हमें मिलाकर, कैंप के लिए रवाना हुई।
दिल बहुत खट्टा हो गया था। बाकी की दो लड़कियों में से एक तो मेरी ही कक्षा की थी पर हमारी कोई ख़ास बात नही होती थी, वो बड़े लोगों की चमचागिरी में व्यस्त रहती थी जो मैं नही थी।
दूसरी लड़की मेरी सीनियर थी यानी ८वि में। अंतर्मुखी होने के कारण मैं उससे घुल मिल नही पा रही थी। समझ नही आ रहा था की आगे के १० दिन कैसे बीतेंगे अजनबियों के साथ, वो भी इतने बेकार मूड के साथ!
खैर हम गए और काफ़ी नयी चीज़ें सीखी। पहली बार स्लीपिंग बैग्स में घुसकर सोये। कडाके की ठण्ड में ठिठुरते हुए घर की रजाइयों की बहुत याद आई।
खाने पीने में भी नयापन था। अपने बर्तन ख़ुद धोने होते, वो भी बर्फीले पानी में।
अकेलापन तो रहा, पूरे समय, क्योंकि कसबे के एकमात्र बालिका विद्यालय से ही अधिकतर लडकियां आई थी जो की आपस में खूब मस्ती कर रही थी और हमें तो पूछ भी नही रही थी!
जैसे तैसे हमने कैंप की गतिविधियों में दिल लगाना शुरू किया। नई नई बातें सिखाई जाती थी, नई जगहों पर घुमाने ले जाया जाता था।
चट्टानों पर रस्सी से चढ़ना, उतरना, तरह तरह की गाँठ बांधना, सुबह सुबह ६ बजे व्यायाम करना, बाप रे!!
उन्हीं में एक अध्याय था'एक मग पानी से स्नान'। नाम सुनकर हमें बड़ा अच्छा लगा, उत्सुकता हुई की कैसे यह सम्भव है। बड़े गौर से सुना, पर ऐसी कोई रोचक बात अध्याय ख़त्म होने पर नही मिली। बड़ा सीधा तरीका था एक मग पानी में तौलिया डुबाओ और शरीर पोंछ डालो! या फ़िर ऐसा ही कुछ, अब तो याद भी नही।
पर अंत तक जेहन में ये एक पंक्ति बनी रही, आज भी कानो में उसकी ध्वनि गूंजती है।
आखिरकार दस दिन पूरे हुए और हम जेल से छूटे कैदी की तरह दौड़कर घर पहुंचे। जिन छोटी छोटी बातों को पहले भाव नही देते थे वही आज कितनी अच्छी, कितनी अपनी लग रही थी। 'घर' का असली अर्थ तब समझ में आया था।
खैर वो सब तो पुरानी बात हुई अब तो ऐसा है की जंगल में भी छोड़ दो तो रह लें, पर उस एक पंक्ति से हमेशा का नाता जुड़ गया है...एक मग पानी से स्नान..ऐसा क्यों है, क्या पता।
अब पता चलता है की क्यों उस दिन कैंप में लडकियां नही आई थी। मुफ्त के कैंप में तो वो लोग जाते हें न जिनके घर पर खाने के लाले होते हें, जिन्हें अपने १० दिन का राशन बचता हुआ दीखता है। खाते पीते घर के लोग थोडी न उस तरह के मुफ्त के शिविरों में जाते हें। कहीं हमारी लडकियां छोटे घर की लड़कियों के साथ १० दिन बिताकर उनके जैसी न हो जाएँ, ऐसा ही कुछ सोचा होगा उनके अभिभावकों ने।
मेरे घर पर तो खाने के लाले नही थे, मेरे घरवालों का तो इतना दिमाग नही चल पाया। मै तो सही सलामत बल्कि और बेहतर होकर वापस लौटी।
खैर, इसे भी एक सबक की तरह पोटली में बाँध लिया, दुनिया ऐसी नही जैसी दिखती है। संसार में सिर्फ़ अच्छा या बुरा नही, और भी आयाम हें इसके। बड़े पेंचीदे।
बिल्कुल जलेबी की तरह गोल है दुनिया।




6 टिप्‍पणियां:

विवेक सिंह ने कहा…

ये तो हमें गुरु जी ने बताया था कि दुनिया गोल है .पर यह जलेबी की तरह गोल है यह आज ही जाना !

sanjay vyas ने कहा…

हमने कई जगह पढा था कि सच सिर्फ़ काला या सफ़ेद ही नही होता बल्कि उसमे धूसर रंगों के कई शेड्स होते है.आज इस पोस्ट से पहले का पढा स्पष्ट सा हो गया.

राज भाटिय़ा ने कहा…

यहां सारे गोरे यही तो करते है, फ़िर उपर से स्प्रे छिडक लिया, कभी कपडे उतारे तो नाक सड जाये.
एक मग पानी मे स्नान.
आप का लेख बहुत ही सुंदर लगां, ओर बहुत सी बातो का पता चल .
धन्यवाद

PD ने कहा…

कहानी बहुत बढ़िया लगी.. अपना बचपन भी खूब याद आया.. क्यों स्कूल के मास्टर हमें इतना भाव देते थे यह हम भी नहीं समझ पाते थे, मगर आजकल के बच्चे हर बात समझ लेते हैं.. :)
अपना ट्रेकिंग भी याद आया.. एक वीडियो हमने नेट पर भी डाल रखी है.. उसका लिंक यह रहा.. देखे और बताएं कि कैसी है? :)

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

मध्यमवर्गीय मानसिकता का सही चित्रण किया है - उन मान बाप के सयानेपन से नुकसान तो उनकी बेटियों का ही हुआ न.

kuhasa ने कहा…

वाकई ये मानसिकता बहुत आम थी, बल्कि अभी भी है