सोमवार, 2 फ़रवरी 2009

मैं अपने पसंद की चाय बनाउंगी!

क्या आपने कभी ऐसा महसूस किया है की जिस काम में आपको जी जान लगा देते हें, दिल निकाल के रख देते हें, उसका परिणाम दूसरों की अपेक्षा पे खरा नही उतर पाता. दूसरी तरफ़ जो काम आपको

चलते फिरते कर देते हें ज्यादा वक्त देते हें तवज्जो, वही आपके लिए उनकी नज़र मेंमील का पत्थर बन जाता है!
अक्सर ऐसा हुआ है की जब घर में खाना बनाने के लिए कुछ हो बस कुछ मात्रा अमुक कुछ मात्रा तमुक, और हमने उन सब को उनके उपयुक्त हिसाब से पकाकर कुछ नयाव्यंजनबना दिया हो. हमारे मित्रगन ऊँगली चाटकर घर से निकले हें!
और जिस दिन हम खून पसीना एक करके, रेसिपे बुक की एक एक पंक्ति चाटकर, तराजू से तोलकर दुनिया भर के उपकरणों की सहायता से कोई व्यंजन बनाने की कोशिश करते हें, अंत में एक ऐसी चीज खाने को मिलती है जो आपके मित्रों को उबले आलो मटर की सब्जी से अधिक नही लगती (भले ही आपको को ऐसा लगता हो)
ऐसी स्थिति में क्या किया जाय? क्या हार मान ली जाय? क्या ख़ुद को बेहतर बनाने की कवायद बंद की जाय. क्या छोड़ दिया जाय ख़ुद को अपने हाल पर.
इस दुनिया में जितने मनुष्य हें, उतनी ही विचारधाराएँ भी हें. सबका अपना स्वाद है, अपनी पसंद है.
हमें बचपन से ही चाय का शौक था. यूँ तो हम चाहते थे की हमें रोज़ सुबह बेड टी मिल जाया करे पर जब से माँ से दूर हुए तब से इस शाही शौक को दफना दिया. उसके बाद हम किराए के घर में रहे, हॉस्टल में रहे, मित्रों- रिश्तेदारों के घर रहे, पर चाय का सुख भोगने के लिए ख़ुद ही उठकर किचन में जाना पड़ा. इसी बहाने हमारे मित्रगनों को भी चाय मिल जाती थी. धीरे धीरे हमेंमाँका दर्जा दिया गया. हमें खुशी मिलती थी की चलो हमें नही दूसरों को तो वो खुशी मिल जाती पर उस दौर में हमें एक बात देखने को मिली, जिसने हमें जिंदगी के कटु सत्य से वाकिफ कराया.
हम हर किसी को खुश नही कर सकते
सीधी सी बात थी, जितने अधिक लोग होते, उतनी अधिक हमारी चाय में मीन मेख निकलती. किसी को चीनी अधिक लगती, किसी को दूध कम.
शुरुआत तो हमने अपनी पसंद की चाय बनाकर की थी, धीरे धीरे दूसरों की पसंद शामिल करते करते अपनी चाय पता नही कहाँ रह गई.
उसके बाद भी हमने महसूस किया की जितनी हमें तारीफें मिलती थी उनसे कहीं ज्यादा नसीहतें मिलती थी.
फिर एक दिन हमने फ़ैसला लिया की चाय बनेगी तो हमारे पसंद की, दूध ज्यादा शक्कर कम.
उसके बाद से कुछ नही बदला, तारीफें भी उतनी मिली नसीहतें भी उतनी. पर कम से कम अपनी पसंद की चाय पिने को मिल जाती है.
दुनिया में अरबों खरबों लोग हें, क्या कोई ऐसी चीज है जो सबको साथ में पसंद जाए?
कई बार हमें लगता है की हम सही हें पर लोग हमें समझ नही पा रहे हें, शायद रूढिवादी मानसिकता के कारण, शायद अपने पूर्वाग्रहों के कारण. हम सोचते हें की चलो ठीक है दूसरों को दुखी करके हमें कौन सी खुशी मिल जायेगी. हम ख़ुद को बदल लेते हें. पर भीतर कहीं वो तर्क रह जाते हें जो हम साबित नही कर पाये.
जो लोग सबको खुश करके चलते हें, किसी वाद विवाद में नही फंसते, उनकी मय्यत पे खूब भीड़ उमड़ती है. उनकी तारीफों के पुलरिटर्न गिफ्टकी तर्ज पर बांधे जाते हें.
जो लोग भीड़ से हटके चलते हें क्योंकि भीड़ उनको समझ नही पाती, वो अकेले भले ही पड़ जाते हें, पर जब वो ख़ुद को आईने में देखते हें तो उन्हें एक साथी नज़र आता है. एक ऐसा साथी, जो सौ करोड़ दुश्मनों के रहते उन्हें जीने की शक्ति देता है.
मैं भी उसी दिशा में बढ़ना चाहती हूँ. इतना चाहती हूँ की कभी अपनी अंतरात्मा के सम्मुख निरुत्तर रह जाऊं.
मैं वही करूंगी, जो मुझे आतंरिक तर्क वितर्क के पश्चात ठीक लगे. मैं अपने पसंद की चाय बनाउंगी. मैं सबको खुश नही कर सकती, पर मैं स्वयं को उस हद तक नही बदलूंगी जहाँ मैं आईने में ख़ुद को पहचान सकूं.

12 टिप्‍पणियां:

PN Subramanian ने कहा…

हम यह मानते हैं की अपनी ज़िन्दगी अपने तरीके से जीना ही सार्थक है. हाँ यदि सम्भव हुआ तो कुछ औरों को भी साथ कर लेने की कोशिश करेंगे, हम चाय बनते हैं और सब को अच्छी लगती है. आभार आपके इंटरेस्टिंग पोस्ट के लिए.

PD ने कहा…

मेरे भैया मुझे अक्सर एक बात कहते हैं.. आदमी भी एक अणु के समान ही होता है.. अगर उसका इंटर्नल स्ट्रक्चर बदल जाये तो उसमें उसका अपना कुछ भी नहीं बचता है.. सो खुद को वैसे ही बनाये रखिये जैसे की आप हैं..

sanjay vyas ने कहा…

चाहें तो आपकी पसंद की चाय में हमें भी शामिल करें:)

विवेक सिंह ने कहा…

हमें तो चाय बनानी आती नहीं दूसरों की बनी ही पीते हैं :)

रौशन ने कहा…

हमें तो अच्छी चाय अच्छी लगती है और बहुत बुरी न हो तब भी अच्छी लगती है .
बनाने वाले का अधिकार होना चाहिए कि वो कोई चीज कैसी बनाये
जिसे पसंद हो ठीक है जिसे न पसंद आए वो ख़ुद भी ट्राई करे फ़िर बुराई करे

Rashida K ने कहा…

So true!! Somewhere we all know ought never loose ourselves...but still, the world is an enchanting mistress..it keeps luring you back into doing things just to please others!!

Keep it up girl!!

chopal ने कहा…

wah! wah!

makrand ने कहा…

well said

राज भाटिय़ा ने कहा…

वर्षा जी किचन के बारे या चाय के बारे तो हमे मालुल नही लेकिन मेरा मानना है आप जब भी कोई काम मन लगा कर करो जरुर सही होता है, हां समाने वाला चाहे नखरे करे,
जब भी कभी हम घुमने जाते है तो दोपहर का खाना लेट हो जाता है, ओर हम घुमते घुमते थक जाते है... ओर फ़िर जेसा भी खाना मिले बहुत स्वाद लगता है, ओर सारे जने अपनी अपनी पलेट भी साफ़ कर देते है, इस लिये यह सब भुख पर भी निर्भर करता है.
चलिये एक कप चाय अपनी पसंद की हमे भी पिलायेधम
धन्यवाद

varsha ने कहा…

आप सभी मेरी पसंद की चाय पीने के लिए सादर आमंत्रित हैं।
मित्र लोगों ने जब मीन मेख निकाली थी तो हमने बुरा थोडी माना था, हमने भी तो उनकी maggi में नमक कम बताया था!! आपके सुझाव भी सर आंखों पर..

डॉ .अनुराग ने कहा…

जिंदगी रोज नए फलसफे तजुरबो की शक्ल में परोस देती है.....आप उसे कैसे लेती है ये आपको निर्णय लेना है..दुःख इन्सान को परखने के लिए ही नही उसे ओर सवेदनशील बनाने के लिए भी होता है.......

Smart Indian - स्मार्ट इंडियन ने कहा…

ज़रूर, चाय अपनी पसंद की ही बनाइये. अपनी पसंद का काम करने वाले संतुष्ट और आत्मविश्वासी होते हैं.