सोमवार, 19 जनवरी 2009

शायद गांधीजी का ये तात्पर्य था!!




एक लड़की थी श्यामा, जो कोक्क्रोच से बहुत डरती थी जहाँ कोच्क्रोअच दिख जाता वहाँ से भाग जाती धीरे धीरे वो बड़ी होने लगी तो यह समस्या उसके लिए शर्म का कारण बनने लगी उसके सब दोस्तों को पता चल गया और वो उसका मज़ाक उडाने लगे


एक बार जब अति हो गई तो उसने हिम्मत करके चप्पल पकड़ा और एक कोक्क्रोच को मार डाला। वह नन्हा जीव तड़प तड़प कर मर गया श्यामा बहुत खुश हुई की उसने अपने डर पर फतह पा ली


उसके बाद जब भी कोई कोक्क्रोच दीखता तो वो उसे चप्पल पकड़कर मार देती



एक दिन उसकी माँ ने उसे ऐसा करते देख लिया श्यामा ने गर्व से बताया की उसने कोक्क्रोच पर फतह पा ली है इस पर माँ जोरों से हंसने लगी , बोली "अरी बेवकूफ, तब क्या करेगी जब तुझे उसे मारने के लिए कोई चप्पल मिले?" श्यामा सोच में पड़ गई


तब माँ ने प्यार से समझाया " बेटा डर पर फतह तो तब होगी जब कोक्क्रोच तेरे आस पास हो और तुझे उससे कोई फर्क पड़े, तू अपना काम करती रहे डर को दबाने से वह चला नही जाता, उसे भगाने के लिए उसका सामना करना पड़ता है"


शायद यही मतलब होता है इन्द्रियों को वश में करने का आपको चोकलेट बहुत पसंद है, इतनी की आप उसके लिए कुछ भी कर सकती हैं। लेकिन साथ ही आप अपनी स्वाद की ग्रंथि को वश में करना चाहती हैं क्या आपको चोकलेट से दूर भागना चाहिए? हो सकता है इससे आपकी समस्या हल हो जाए। लेकीन यदि ख़ुद चोकलेट चलकर आपके पास जाए तो क्या आप काबू कर पाएँगी? आपने तो चोकलेट को दूर किया, अपनी जीभ का तो कुछ नही किया



समस्या का समाधान तब होगा जब आप रोज चोकलेट की दूकान पर जाएँ, कभी कभार चोकलेट खाएं पर उसके स्वाद को अपने पर हावी होने दे। जब मन करे खाएं जब मन करे खाएं तब असली मर्ज़ आपके वश में होगा और असली फतह तब होगी जब आप कभी चोकलेट खरीदें (दुक्कन पर जाने के बावजूद), जब आपको ये याद भी रहे की इस दूकान में चोकलेट मिलती है। तब समझिये आपने अपनी स्वादेन्द्रियों पर फतह पा ली



अब आप सोचेंगे की ये सब मैं इसलिए लिख रही हूँ की पिछले एक दो दिनों चलन में आए चर्चा के विषय गांधीजी के 'प्रयोगों' को तर्कसंगत ठहराऊ ( डॉ अनुराग कविता जी के ब्लोग्स)



आप बिल्कुल ग़लत हैं हाँ यह तर्क दिया जा सकता है की ब्रह्मचर्य पाने के लिए अप्सराओं से घिरा रहना पड़ता है उस माहौल में मन को वश में करना होता है, इस विषय पर में नही जाना चाहूंगी क्योंकि गांधीजी के लिए मेरे मन में अपार श्रद्धा है उन्होंने जिस भारत का निर्माण किया है वह ढांचा समूचा विश्व अपनाए तो कोई समस्या रह जाए बाकी उनकी निजी ज़िन्दगी के बारे में कुछ लिखने से पहले मैं ख़ुद उन किताबों को पढ़ना चाहूंगी जिनके बारे में मेरे ब्लॉगर मित्रों ने जिक्र किया है



हाँ लेकीन जहाँ तक सेक्स की बात है मेरी समझ में जब तक आप इसे 'प्रेम' शब्द से अलग करके dतब तक इसकी पवित्रता का आभास कर पायेंगे



इसी सन्दर्भ में एक कहानी प्रस्तुत करती हूँ (एकदम मौलिक है जी!!!)


एक गुजराती लड़का था अमित. एक बार उसके एक बंगाली मित्र ने उसे बंगाली रसगुल्ला खिलाया. अमित को वो बहुत पसंद आया, इतना की उसकी तलाश में वो चल पड़ा.

रास्ते मैं राजस्थान पड़ा. वहाँ के हलवाइयों ने अमित को खूब रसगुल्ले खिलाये और कहा की आप यहीं रुक जाइए एक ही बात तो है ये भी तो रसगुल्ला ही है. पर अमित को तो बंगाली रसगुल्लों का भूत सवार था सो वो चलता गया. इसी तरह आगे MP और बिहार आए. अमित ने सब जगह के रसगुल्ले खाए पर उसका मन तो बंगाल में था सो वो चलता गया.


अंततः बंगाल गया और अमित ने जी भरके बंगाली रसगुल्ले खाए. फिर उसने पीछे मुड़कर नही देखा.
इस कहानी में बंगाली रसगुल्ले अमित का सच्चा प्रेम हैं और बीच के सारे रसगुल्ले अप्सराएं या वासना, जितना अमित वासना पर काबू करता गया उतना वो प्रेम के करीब आता गया. अगर निजात पानी है तो वासना से पाइए, प्रेम से नही. प्रेम तो इश्वर तक पहुँचने का मार्ग है.
आपके घर में बहुत कीमती सामान है, आपको ताला लगना है पर चाबी नही मिल रही. आपकी दरवार में बहुत चाबियाँ हैं, कोई सोने की कोई चांदी की, पर आपको तो वही चाहिए जो ताले में फिट हो जाए, वरना तो आपकी समस्या का समाधान नही होगा. फिर भले ही असली चाबी कितनी भी बेकार या बदसूरत क्यों हो, चाहिए तो वही


बिल्कुल वैसे ही प्रेम भी आपके जीवन का समाधान है, परमात्मा से मिलन का द्वार. बस प्रेम और वासना में फर्क करना जान लीजिये. प्रेम वो साधारण सी दिखने वाली चाबी है जो ताले का मकसद पूरा करती है, वासना वो बाकी की चाबियाँ हैं जो दिखावे में अच्छी होती हैं पर मतलब की नही होती.


12 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

इन बातों पर सबके अपने अपने तर्क वितर्क हैं..किन्तु आपने कथा बेहतरीन सुनाई, आभार.

हिमांशु ने कहा…

अच्छी प्रविष्टि, पर कुछ जगहों पर असहमत हुआ जा सकता है. गांधी जी को लेकर बातें करने का फ़ैशन रहा है भारत में आजादी के बाद से, वो सबका कुछ न कुछ भला कर ही जाते हैं.

AKSHAT VICHAR ने कहा…

‘गांधी’! यह शब्द आज भी मोहित करने में सक्षम है। आज भी प्रासंगिक हैं गांधी। ‘लगे रहो मुन्ना भाई’ इसिलिये लोगों को पसंद आई।

कुश ने कहा…

मैं भी अपने ब्रहम्चार्य का परीक्षण करना चाहता हू.. क्या आपकी नज़र मैं कोई महिला है जो इसमे मेरा साथ दे सके?

हालाँकि कहानी बहुत उम्दा है आपकी..

डॉ .अनुराग ने कहा…

कितने बंद करे खिड़की दरवाजे
सच को मगर फ़िर भी
भीतर आना है !

ARVI'nd ने कहा…

andaaj-e-bayan bahut hi accha hai aapka...aapne sahi mauke pe sahi udaharann pesh kiya.

Alag sa ने कहा…

समझ नहीं पाया कि किस चीज को स्थापित करना चाहती थीं आप। बहुत कुछ समेटने में कुछ-कुछ बिखर गया सा लगता है।

हरि ने कहा…

अनुराग ने जब से दिल की बात लिखी है तब से मुझे भी गांधी जी बहुत याद आ रहे हैं। गांधी और उनकी विचारधारा को मैं अभी तक समझ नहीं पाया हूं इसलिए क्‍या कहूं। हां,कथा के माध्‍यम से तर्क रखने का तरीका प्रभावशाली लगा।

varsha ने कहा…

उन बंधुओं के लिए जिन्हें इस लेख का असल मकसद दिख नही पाया, यह लेख मैंने पिछले कुछ लेखों व उन पर मिली टिप्पणियों को पढने के बाद जो कुछ मन में आया लिखती गई। मूलतः दो तर्क सामने रखना चाहती थी:
१) गांधीजी के ब्रह्मचर्य पर प्रयोगों के पीछे का तर्क (जिससे मैं भी पूर्णतः सहमत नही, पर तर्क सही ग़लत नही होता, सिर्फ़ तर्क होता है )
२) ब्रह्मचर्य का मकसद वासना पर काबू पाना होना चाहिए पर एक स्त्री पुरूष के बीच पवित्र व सच्चे प्रेम को वासना की परिभाषा से बाहर रखना चाहिए अर्थात यदि गांधीजी को कस्तूर्बाजी से पावन प्रेम होता तो उन्हें ये प्रयोग करने की जरूरत ही नही पड़ती, सच्चा प्रेम एक से ही हो सकता है और जब हो जाता है तो बाकी सब पुरूष भाई व स्त्रियाँ बहनें लगती हैं। ये मेरा तर्क है इससे आप असहमत भी हो सकते हैं॥

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

आखिरी कथा तो जबरदस्त थी| किताबी बातें दिमाग में नही घुसतीं लेकिन इस कथा ने कितनी सरलता से बात को समझा दिया| धन्यवाद आपको, आज एक अच्छी बात सीखी, दिन सफल हुआ|

"सच्चा प्रेम एक से ही हो सकता है और जब हो जाता है तो बाकी सब पुरूष भाई व स्त्रियाँ बहनें लगती हैं। ये मेरा तर्क है इससे आप असहमत भी हो सकते हैं॥" हम सहमत हैं लेकिन बात यह है की समाज गांधी जी की तरह नहीं सोचता, उसे सीधे सादी बातें पसंद होतीं हैं, समाज अगर इतना ही जागरूक होता तो न अंग्रेज आते न गांधीजी की जरुरत होती| समाज को उसी की भाषा में समझाया जा सकता है, गांधीजी समझा नही पाये, इसे मैं उनकी भूल मानता हूँ|

बेनामी ने कहा…

गाँधी जी को मात्र राजनीति के चलते महात्मा बना दिया गया है| देखा जाए तो उस समय ढेरों ऐसे व्यक्ति थे जो सही मायने में महात्मा थे, लेकिन कांग्रेस की स्वार्थी राजनीति के चलते गाँधी को "सुपर-ह्यूमन" तरीके से दिखलाया गया| अफ़सोस इस बात का है, की आज भी तमाम पढ़े लिखे लोग गाँधी को आँख मूँद कर पूजते है और उनके विषय में कोई भी ऐसी बात सुनने से कतराते हैं जो उन्हें आम आदमी की तरह पेश करे| कोई शक नही की गाँधी जी का आज़ादी में बहुत बड़ा योगदान था, लेकिन ये सोचना मूर्खता है की सिर्फ़ उनकी का योगदान था|

रौशन ने कहा…

हमने अभी तक अनुराग जी के ब्लॉग पर टिप्पणी नही की क्योंकि हमें लगा कि बात ढंग से रखनी चाहिए आर उसके लिए विचार जरूरी है.(क्या पता कब सही समय मिल पाये सोचने का )
लेकिन आपका ब्लॉग देखकर खुशी हुई कि आपने इतने बेहतर तरीके से उसे रखा
अनुराग जी ने जो लिखा वह वो था जो उन्होंने समझा (जिसके भी जरिये हो ), आपने जो लिखा वह वो है जो आपने समझा , हम जो लिखना चाह रहे हैं वह वो होगा जो हम समझ पाये पर गाँधी जी का आशय सिर्फ़ और सिर्फ़ उनके लेखन को सिर्फ़ और सिर्फ़ ख़ुद पढ़ कर समझा जा सकता है (किसी और कि समझ नही चाहे वो कितना भी बुद्धिमान क्यों न हो )
विवेक जी ने अनुराग जी के ब्लॉग पर सही ही कहा था कि गाँधी जी के पक्ष के बिना यह बेहद अप्रासंगिक बहस है
और कुश जी आपसे ऐसी टिप्पणी की उम्मीद नही थी
आपने पूछ ही लिया है तो यह भी जानिए जो बुद्ध ने कहा था, हिंदू धर्मग्रंथों में भी कहा गया है
"अपनी मुक्ति के लिए साधन ख़ुद ही खोजना होता है "