मंगलवार, 27 जनवरी 2009

कहीं लुप्त ना हो मानवता!!

प्रस्तर पूजन बंद करें
करें साधना कर्म की,
आओ मिलकर नींव रखें
अक्षत मानव धर्म की.
ऐसा धर्म, नही हो जिससे
आपस में दीवार खड़ी,
हाँ, जोड़े जो मानवता को
ऐसी ढूँढें एक कड़ी.
क्यों उलझें अब उन बातों में
जो भी ईसा पूर्व घटी थी,
टूटे होंगे मन्दिर मस्जिद
लांघी होंगी सीमायें भी।
किसने तोडे, किसने लांघी
सब तो अपना तर्क रखेंगे
पर जब तक हैं मसले जीवित
निर्दोषों के खून बहेंगे.
आओ इनका विधि विधान से
अब अन्तिम संस्कार करें,
भटकें न प्रेतात्मा बनकर
इनकी बरसी भी कर दें .
वरना इनका अंत न होगा,
मानवता हो अंत भले ही,
ईंटों का पत्थर हल हो तो
टूटेंगे फ़िर घर सबके ही,
आओ कुछ तो कदम उठाएं
अधिक देर होने से पहले,
कहीं लुप्त ना हो मानवता
लुप्तप्राय जीवों से पहले.

5 टिप्‍पणियां:

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत सुंदर भाव लिये आप की यह कविता.
धन्यवाद

इष्ट देव सांकृत्यायन ने कहा…

वो तो कब की लुप्त हो गयी है. थाने में ऍफ़ आई आर भी दर्ज है और पुलिस वाले तलाश में हैं. अगर गलती से भी कहीं बची-खुची दिख जाती है तो उसे पुलिस वाले पीट-पीट कर और दस-बीस उत-पतंग धाराएं लगा कर लुप्त कर देते हैं.

विवेक सिंह ने कहा…

मानवता लुप्त नहीं होगी . चिंता न करें !

PN Subramanian ने कहा…

कहीं लुप्त ना हो मानवता
लुप्तप्राय जीवों से पहले
Very beautiful.
आभार.

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत सुंदर...