सोमवार, 26 जनवरी 2009

आओ मानव धर्म बनाएं, संविधान को ग्रन्थ बनाएं.

बचपन से लेकर अब तक बहुत कुछ देखने को मिला, देश में भी और दुनिया में भी। कभी कश्मीर की समस्या सुलझाने निकले तो ख़ुद में उलझ गए। इतिहास के पन्ने पलटे पर संतोषजनक उत्तर नही मिला। कभी देश की डेमोक्रेसी का उपहास देखने को मिला, जब चुनाव के एन पहले नेताओं को नोट बाँटते देखा, या धर्म जात के नाम पर वोट बाँटते देखा। कुछ समझ नही आता था की ये सब क्या है और जनता क्यों बेवकूफ बन जाती है। कभी लालूजी को जेल जाने से पहले अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनाते देखा। सर शर्म से झुक गया। कभी चंद लोगों को मोरल पुलिस का काम करते देखा या क़ानून अपने हाथ में लेते देखा। समझ में आया की किसे दोष दें, ढह चुकी क़ानून व्यवस्था को या उन नेताओं को जिनकी शह में लोग क़ानून जेब में लेकर घुमते हैं।

मैं अपने भारत पर बहुत गर्व करती हूँ क्योंकि मुझे विश्वास है की इसकी नींव एक बहुत ही सोचे समझे दिग्गजों द्वारा बनाए गए संविधान पर आश्रित है, जिन्होंने बहुत ही काबिलियत से देश के विभिन्न समुदायों को एक सूत्र में पिरोने का सूत्र लिखा। अगर हर हिन्दुस्तानी ईमानदारी से इसका पालन करे तो कोई शक नही की दुनिया के बाकी देश इसकी फोटोकॉपी बनवाने के लिए कतार में लग जायेंगे। सच मानिए, कोई युद्ध होगा, आतंक बचेगा, गरीबी होगी और भ्रष्टाचार। सब कुछ कितना अच्छा होगा। आपको शक है॥लीजिये हम समझाए देते हैं।



ज़रा सोचिये, इस दुनिया में कितने सारे धर्म हैं। लगभग सबकी नींव कोई कोई धार्मिक ग्रन्थ है। जैसे हिन्दुओं के लिए गीता, मुस्लिमों के लिए कुरान, ईसाइयों के लिए बाइबल। यह सभी ग्रन्थ कब लिखे गए, कैसे लिखे गए, हमें नही पता। हम तो तब जन्मे ही नही थे।
अब सोचिये, अगर इसी वक्त कोई प्रलय जाए, सब कुछ तबाह हो जाए, हमारी पूरी सभ्यता नष्ट हो जाए। कुछ सदियों बाद हमारी अगली पीढियां खुदाई करके हमारी सभ्यता के सबूत इकठ्ठा कर रही हों (जैसा हम किया करते हैं) और उनके हाथ कोई धार्मिक ग्रन्थ आए, बल्कि अरिंदम चौधरी के IIPM का brochure जाए, तो वो मासूम तो IIPM को मन्दिर और चौधरी जी को देवता बना बैठेंगे।
दूसरी तरफ़, अगर उनको खुदाई में भारत का संविधान मिल जाए, तो वो उसी को अपना धार्मिक ग्रन्थ मान कर एक नया धर्म बना लेंगे।


उस ग्रन्थ से उनको पता चलेगा की यूँ तो भारत में अनेक धर्म हुआ करते हैं, पर एक भारतीय नागरिक अपने संविधान को अपने धर्म से सर्वोपरि मानता है। उसे अपने त्यौहार मनाने की आज़ादी होती है, पर दूसरे धर्म के त्यौहार का सम्मान करना भी उसका फ़र्ज़ होता है। उससे अपेक्षा की जाती है की वो धर्म जाती के नाम पर देश की शान्ति सौहार्द में विघ्न पैदा करे। उसे अपने को व्यक्त करने की आज़ादी होती है, पर उसका फ़र्ज़ है की वो इस आज़ादी का ग़लत उपयोग करे।
पाठ्य पुस्तकों में पढ़ा था, भारतीय नागरिक को हर वो मौलिक अधिकार प्राप्त हैं जिनके दम पर वह एक सम्मानित जीवन जी सकता है। उसे देश की सरकार नही बताती की उसे क्या करना चाहिए, वो ख़ुद अपनी राह पर चलता है। सरकार उसे नही बताती की उसे कितने बच्चे पैदा करने चाहिए, किस विषय पर पुस्तक नही लिखनी चाहिए या समाचार पर देश के ख़िलाफ़ क्या नही बोलना चाहिए।
पर इन आजादियों के साथ यदि एक नागरिक पर कोई लगाम लगाई जाए तो समझिये क्या तमाशा हो सकता है। मानव स्वभाव इतना भी सीधा नही है की इन आजादियों का उल्टा सीधा इस्तेमाल करे। यह जानकर ही हमारे संविधान ने इन अधिकारों के साथ साथ हमें कुछ जिम्मेदारियों भी दी थी। अगर सब कुछ ठीक रहता तो ये अधिकार जिम्मेदारियों मिलकर एक ऐसे भारत का निर्माण करते जिसमें सबको आगे बढ़ने का अवसर मिलता, जो आगे बढ़ना चाहता उसे कम से कम मूलभूत सुविधाएं मिल जाती। आरक्षण का कोई स्थान रहता। लोग संविधान के आगे अपना धर्म जाती सब भूल जाते सब नागरिकों को बराबर का दर्जा मिलता, फ़िर वो स्त्री हो या पुरूष, हिंदू हो या मुस्लिम।
पर दुर्भाग्य से अब लगता है की अगली सभ्यता से पहले हमारे संविधान को कोई नही पूछेगा (पूजेगा तो दूर की बात!!)


लेकिन आज २६ जनुअरी के दिन मैंने एक सपना देखा है
मैंने देखा है की अगर भारत की इस बदहाल स्थिति का कोई समाधान है तो वह है हर भारतीय नागरिक द्बारा 'संविधान' को अपना धार्मिक ग्रन्थ मान लेना। इसकी पूजा करना। इसका उल्लंघन करने पर सजा दी जाने का भय होना


ज़रा सोचिये, अगर हम संविधान को अपना धर्म ग्रन्थ मान लें तो? हम सब भारतीय नागरिक एक ही धर्म के अनुयायी हो जायेंगे, मानव धर्म।
आप सोचेंगे..नही!!!!!!!!! एक और धर्म?? पहले क्या कम जटिलता थी जो एक और गया??
जी असल में यह कोई धर्म नही है, ये तो बस सब धर्मों का बाप है!!
जिस तरह से एक लाभ कमाने वाली कंपनी में कई सारे विभाग होते हैं, कोई उत्पादन, कोई सेवा, कोई मार्केटिंग, कोई वित्त। पर लाभ तो तभी होता है जब सब विभाग मिलकर काम करें।
तो हमारा जो मानव धर्म है , वो इस कंपनी का सीईओ है
मानव धर्म के अनुयायी सिर्फ़ भारतवासी बन सकते हैं, बल्कि वो सभी जो स्वयं को मानव मानते हैं और अपने पड़ोसियों को भी मानवता के चश्मे से देखना चाहते हैं।
(लेकिन मैं अपने सपने में पहले भारत को मानव धर्म का अनुयायी बनाना चाहती हूँ ताकि वह विश्व के सामने एक उदाहरण प्रस्तुत करे और दुनिया बाध्य हो जाय इसको सलाम करने के लिए और 'slumdog millionaire ' जैसी फिल्मों से मैला हो चुका भारतवर्ष अपना पुराना गौरव सिर्फ़ हासिल करे बल्कि बनाए रखे) आख़िर संविधान तो हम भारत का ही मानेंगे न॥


अब रहा सवाल इस मानव धर्म के पूज्य इश्वर का, तो एक हिंदू धर्म के जन्म लेने से गीता का अध्ययन करने से मैंने पाया है की हम शक्ति की ऊर्जा की उपासना करते हैं जैसे की सूर्य देवता, जिसका ही एक अवतार गीता में कृष्ण जी को बताया गया है। अब श्री कृष्ण को तो मैंने देखा इस पीढी में किसी ने, पर सूर्य को देवता मानने में हर्ज़ ही क्या है। इस ब्रह्माण्ड में कितने तारे हैं जो सूर्य से अधिक विशाल हैं, उससे अधिक ऊर्जा के स्रोत हैं, पर आख़िर हमें तो सूर्य ही ऊर्जा देता है।
यह तो आमतौर पर सभी विज्ञान की पुस्तकों में होता है की सूर्य सिर्फ़ सीधी तरह से ऊष्मा देता है बल्कि पेड़ पोधों को खाना बनाने में जिससे पूरी फ़ूड चेन शुरू होती है, और अंत में जिस कोयले को जलाकर हम इतनी बिजली पैदा करते हैं उसके बनने में योगदान सूर्य देव का भी तो है।
इस ब्रह्माण्ड में एक ऐसी अलौकिक शक्ति है जो हाड मांस में जीवन डालती है, उसे नियंत्रित करती है, वह शक्ति हमें दिखती है ही हमारे वैज्ञानिकों को सामख में आती है, पर उसके वजूद को कोई नही नकार सकता।
अगर हमें पूजना है तो उस शक्ति को पूजना चाहिए, उसे किसी नाम या रूप रंग में उकेरने की कोशिश नही करनी चाहिए। उसे कपडों में नही लपेटना चाहिए ही उसके अस्तित्व के सबूत किसी ग्रन्थ में ढूँढने चाहिए। यह मान लेना चाहिए की ऊपर वाला हम सबका बाप है और जीते जी तो उसका रहस्य हमें समझ में आने से रहा।
हम कुछ कर सकते हैं तो इतना की कम से कम इतना स्वीकार लें की धरती में उतने भगवान् नही हैं जितने विभिन् धर्म ग्रन्थ मिलकर बताते हैं, यह सब देखकर तो ऊपर वाला उपहास करता होगा। ज़रा सोचिये, हिन्दुओं के भगवान् कृष्ण ने कभी अमेरिका का या फिर ईशु मसीह ने भारत का दौरा क्यों नही किया

अगर इनमें से किसी एक धर्म के भगवान् सत्य हों तो वो अलग बात है, पर सब धर्मों के भगवान् एक साथ सत्य हों, माफ़ कीजिये मेरी समझ से बाहर।
मैं तो यही मानती हूँ की जितने भी ये सब धर्म ग्रन्थ लिखे गए इंसानों द्बारा लिखे गए। अगर इनमें से कोई भी ग्रन्थ भगवान् के द्बारा निर्देशित होता तो वह सारी दुनिया के लिए होता, आख़िर भगवान् क्यों एशिया यूरोप में भेद करने लगे। यह काम तो इंसान ही कर सकता है॥
इसीलिए इनमें से किसी एक धर्म को दिलो जान से मान लेने से अच्छा है की हम थोड़ा थोड़ा अंश हर धर्म से लें और एक नया धर्म बनाएं जिसका मैंने अभी जिक्र किया, मानव धर्म।

आप को कोई सुझाव देता है की भइया अमुक कंपनी के शेयर्स ले लो खूब अच्छा मुनाफा देगी, आप अपना सारा पैसा उसमें लगा लेते हैं कुछ समय बाद सत्यम की तरह किसी कारण से उसके भाव गिर जाते हैं और आपका सारा पैसा डूब जाता है। दूसरी तरफ़, अगर आपने थोड़ा थोड़ा पैसा अन्य कंपनियों में भी लगाया होता तो थोड़ा बहुत तो कहीं से मुनाफा होने के आसार बनते।
यहाँ बात मुनाफा कमाने की नही हो रही, बात हो रही है ग़लत होने की संभावना को कम करने की। थोड़ा थोड़ा हर धर्म को मानेंगे तो किसी किसी रास्ते तो खुदा मिलेगा, और अगर मिला तो मानव धर्म तो है , सब धर्मों का बाप।
विज्ञान की क्षात्रा होने के कारण अब तर्क करने की आदत हो गई है। पर इसमें ग़लत ही क्या है। किसी भी राह पर अंधों की तरह चलना क्योंकि उन लोगों ने बोला जिन्हें हमने देखा भी नही था, क्या वो राह आपको इश्वर तक ले चलेगी? ऐसी ही किसी दूसरी राह पर आपका पड़ोसी भी तो चल रहा है, उसका भी तो यही दावा है!!
मैं अपने पूर्वजों का पूरा आदर करती हूँ, बस यही कहना चाहती हूँ की उनके द्बारा बनाई गई प्रणालियाँ आज के समाज में मानव को मानव का शत्रु बना रही हैं। पहले ऐसा नही होता होगा, अब होता है।
इसलिए आवश्यकता है, एक नए ग्रन्थ की, एक नए ईश्वर की, जिसे हर वह मानव मान सके, जो अमन चैन में विश्वास करता हो। एक ऐसा धर्म, जिसके अन्दर बाकी धर्म वैसे ही समा जाएँ जैसे किसी पेड़ की शाखें। सबका अपना वजूद हो, पर कोई किसी को काटकर खाने की फिराक में हो।
मेरी नज़र में भारत के संविधान से बेहतर आज कोइ तारीख में कोई पुस्तक नही जिसे हम ग्रन्थ मानकर अनुसरण कर सकें।
मेरी राय में सूर्य से बेहतर कोई भौतिक वास्तु नही जिसमें हम इश्वर को देख सकें।
यह मेरी राय है , आपकी क्या राय है? पसंद आया मेरा मानव धर्म? बनना चाहेंगे इसके अनुयायी?

5 टिप्‍पणियां:

Udan Tashtari ने कहा…

मानव धर्म ही सर्वोपरि है-इसमें तो यूँ भी कोई संशय नहीं. मगर जबसे दानव धर्म के मतवाले सत्ता में, अधिकारों में, ताकत में आ लिए हैं-मानव धर्म दानव धर्म की न्यूसेन्स वैल्यू के कारण जरा परदे के पीछे हो लिया है-आयेगा एक दिन सामने.

सुन्दर आलेख.

जागेगा इन्सान, जमाना देखेगा (यह गाना बज रहा है इस वक्त मेरे कम्प्यूटर पर-बस, जैसे ही बिजली गुम-गाना बंद-इन्सान (हम):) पुनः सो जायेगा)

संगीता पुरी ने कहा…

बहुत अच्‍छा लिखा है.....आपसे सहमत हूं मैं.....मानव धर्म सर्वोपरि है .....संविधान के नियम मानव धर्म को ही परिभाषित करते हैं..... उनका पालन सभी कर लें तो किसी अदालत , किसी सजा की कोई जरूरत नहीं होगी।

रौशन ने कहा…

बहुत सुंदर विचार!
यकीन कीजिये बहुत कम उम्र से ही हमारा मन अपना संविधान पढने के लिए उत्सुक था और जब पढा तब से ही भारत का संविधान हमारे लिए धर्मग्रन्थ सरीखा हो गया
हमें महसूस होता है कि हर नागरिक को संविधान पढ़ना और समझना चाहिए. इससे कई परेशानिया दूर हो जाती हैं

Shriram Narasimhan ने कहा…

सार्वभौम मानव धर्म हेतु एक विकल्पात्मक प्रस्ताव: मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्तित्ववाद से: प्रणेता एवं लेखक: ए नागराज, अमरकंटक, म.प्र.
सर्व मानव ने शुभ चाहा है, शांति एवं सामंजस्य चाहा है | इस दिशा में आज तक कई प्रयास हुए हैं, परन्तु संतोष जनक परिणाम नहीं निकला | इन प्रयासों में विभिन्नताएं भी दिखती हैं| आदि काल से, हम मानवों का विकास हमारे स्वयं के बारे में समझ एवं अस्तित्व (वास्तविकता) के समझ पर निर्भर किया है| पत्थर कैसा है, जानवर कैसा हैं, इन सब में तो हम अधिकाँश मुद्दों पर एक-मत हो पाएं हैं, परन्तु मानव क्या है, क्यों है, कैसा है, इसपर एकमत होना, सार्वभौमिक होना अभी तक प्रतीक्षित है| अर्थात, हम सर्व देश में रहने वाले मानव, भौतिक क्रियाकलाप प्र विश्वास करते हैं, जबकि मानव के क्रियाकलाप पर विश्वास करना अभी तक बना नहीं| इस समस्या के चलते अभी तक मानव का मानवत्व, मानव का आचरण, मानव की मानसिकता, मानव की प्रकृति पर निश्चयन करना संभव नहीं हुआ हैं|
अमरकंटक निवासी श्री ए नागराज के २५ वर्ष के साधना एवं अनुसंधान से यह स्पष्ट हुआ है कि अस्तित्व (वास्तविकता) सह-अस्तित्व है, शून्य (स्पेस) में संपृक्त इकाइयों के रूप में है| ये इकाइयां ४ अवस्थाओं के रूप में प्रत्यक्ष हैं: जो पदार्थ, प्राण, जीव एवं मानव के रूप में है| इकाइयां स्वयं में व्यवस्था में हैं, एवं समग्र व्यवस्था में भागीदार हैं, अथवा सामंजस्य में हैं| मानव भी व्यवस्था में होना चाहता है, जो ज्ञान पूर्वक ही संभव हैं|
मानव की मूलभूत चाहना सुखी होने की है, जो समाधान से ही संभव हैं, सही समझ, ज्ञान से ही संभव है| मानव की समस्त समस्याएं समाधान, ज्ञान के अभाव के कारण ही है| अस्तित्व में व्यवस्था को समझना, चारों अवस्थाओं (पदार्थ, प्राण, जीव, मानव) में व्यवस्था को समझना ही मानव धर्म हैं| यही ‘समाधान’ हैं | प्रस्तु़त 'ज्ञान' निरपेक्ष है, प्रत्येक मनुष्य के लिए समान है, निश्चित है, सार्वभौम है| इस आधार पर सार्वभौम मानवीय आचरण एवं सार्वभौम मानवीय मूल्य स्पष्ट होता है, जिससे अखण्ड मानव समाज - सार्वभौम व्यवस्था की सम्भावना उदय होती है|
इस ‘समझ’ को शिक्षा विधि में लाने का स्वरूप तैयार किया जा चुका है, एवं भारत में पिछले १५ वर्षों में लगभग ३०,००० लोग इस दर्शन के परिचय शिविरों से गुजर चुके हैं| इसपर आधारित मूल्य-शिक्षा छत्तीसगढ़ राज्य स्कूल शिक्षा विभाग, उच्च-शिक्षण संस्थाऑ एवं, विश्वविद्यालयों में लागू हो चुके हैं| आज तक श्री नागराज जी से कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक, भारत के पूर्व राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राज्य मुख्य-मंत्री, धर्म गुरु, प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षा विद एवं जन सामान्य लोग भी मिल चुके हैं, इस प्रस्ताव को सुने हैं, इनमे से कुछ इसके अध्ययन में लगे हैं|
मध्यस्थ दर्शन के इस प्रस्ताव में यह प्रतिपादित किया गया है कि मानव जाति एक है, मानव धर्म एक है| मानव धर्म = सुख = समाधान = समझ | यह अनुसंधान हम मानवों को अपने संकीर्ण, सामुदायिक मानसिकता से निकलने के लिए आशा की एक नयी किरण है, एक सरल मार्ग प्रशस्त कर देता है, जिससे वास्तव में अखण्ड मानव समाज, सार्वभौम व्यवस्था इस धरती पर स्थापित हो सके|

इसी क्रम में एक सर्व धर्म सम्मेलन आयोजित किया गया हैं, जिसमे इस अनुसन्धान के फलस्वरूप ‘सार्वभौम मानव धर्म, मानव जाति एक, मानव धर्म’ एक का प्रतिपादन किया जायेगा| यह सभी धर्म के मानवों, एवं वे मानव जो अपने को किसी धर्म से जोड़कर नहीं भी देखते हो को इस प्रस्ताव को अपने ही सद्-विवेक से जांचने के लिए आमंत्रण है | इसके लिए सर्व धर्म सम्मेलन २३ अप्रैल, २०१२, को कानपुर में होगा | अधिक जानकारी के लिए: सम्मेलन वेब साईट:

www.madhyasth.info देखें, फोन: 9793919149, 9451522231

मध्यस्थ दर्शन मुख्य साईट के लिए क्लिक करें: www.madhyasth-darshan.info

Shriram Narasimhan ने कहा…

सार्वभौम मानव धर्म हेतु एक विकल्पात्मक प्रस्ताव: मध्यस्थ दर्शन, सह-अस्तित्ववाद से: प्रणेता एवं लेखक: ए नागराज, अमरकंटक, म.प्र.
सर्व मानव ने शुभ चाहा है, शांति एवं सामंजस्य चाहा है | इस दिशा में आज तक कई प्रयास हुए हैं, परन्तु संतोष जनक परिणाम नहीं निकला | इन प्रयासों में विभिन्नताएं भी दिखती हैं| आदि काल से, हम मानवों का विकास हमारे स्वयं के बारे में समझ एवं अस्तित्व (वास्तविकता) के समझ पर निर्भर किया है| पत्थर कैसा है, जानवर कैसा हैं, इन सब में तो हम अधिकाँश मुद्दों पर एक-मत हो पाएं हैं, परन्तु मानव क्या है, क्यों है, कैसा है, इसपर एकमत होना, सार्वभौमिक होना अभी तक प्रतीक्षित है| अर्थात, हम सर्व देश में रहने वाले मानव, भौतिक क्रियाकलाप प्र विश्वास करते हैं, जबकि मानव के क्रियाकलाप पर विश्वास करना अभी तक बना नहीं| इस समस्या के चलते अभी तक मानव का मानवत्व, मानव का आचरण, मानव की मानसिकता, मानव की प्रकृति पर निश्चयन करना संभव नहीं हुआ हैं|
अमरकंटक निवासी श्री ए नागराज के २५ वर्ष के साधना एवं अनुसंधान से यह स्पष्ट हुआ है कि अस्तित्व (वास्तविकता) सह-अस्तित्व है, शून्य (स्पेस) में संपृक्त इकाइयों के रूप में है| ये इकाइयां ४ अवस्थाओं के रूप में प्रत्यक्ष हैं: जो पदार्थ, प्राण, जीव एवं मानव के रूप में है| इकाइयां स्वयं में व्यवस्था में हैं, एवं समग्र व्यवस्था में भागीदार हैं, अथवा सामंजस्य में हैं| मानव भी व्यवस्था में होना चाहता है, जो ज्ञान पूर्वक ही संभव हैं|
मानव की मूलभूत चाहना सुखी होने की है, जो समाधान से ही संभव हैं, सही समझ, ज्ञान से ही संभव है| मानव की समस्त समस्याएं समाधान, ज्ञान के अभाव के कारण ही है| अस्तित्व में व्यवस्था को समझना, चारों अवस्थाओं (पदार्थ, प्राण, जीव, मानव) में व्यवस्था को समझना ही मानव धर्म हैं| यही ‘समाधान’ हैं | प्रस्तु़त 'ज्ञान' निरपेक्ष है, प्रत्येक मनुष्य के लिए समान है, निश्चित है, सार्वभौम है| इस आधार पर सार्वभौम मानवीय आचरण एवं सार्वभौम मानवीय मूल्य स्पष्ट होता है, जिससे अखण्ड मानव समाज - सार्वभौम व्यवस्था की सम्भावना उदय होती है|
इस ‘समझ’ को शिक्षा विधि में लाने का स्वरूप तैयार किया जा चुका है, एवं भारत में पिछले १५ वर्षों में लगभग ३०,००० लोग इस दर्शन के परिचय शिविरों से गुजर चुके हैं| इसपर आधारित मूल्य-शिक्षा छत्तीसगढ़ राज्य स्कूल शिक्षा विभाग, उच्च-शिक्षण संस्थाऑ एवं, विश्वविद्यालयों में लागू हो चुके हैं| आज तक श्री नागराज जी से कई प्रसिद्ध वैज्ञानिक, भारत के पूर्व राष्ट्रपति, सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश, राज्य मुख्य-मंत्री, धर्म गुरु, प्रशासनिक अधिकारी, सामाजिक कार्यकर्ता, शिक्षा विद एवं जन सामान्य लोग भी मिल चुके हैं, इस प्रस्ताव को सुने हैं, इनमे से कुछ इसके अध्ययन में लगे हैं|
मध्यस्थ दर्शन के इस प्रस्ताव में यह प्रतिपादित किया गया है कि मानव जाति एक है, मानव धर्म एक है| मानव धर्म = सुख = समाधान = समझ | यह अनुसंधान हम मानवों को अपने संकीर्ण, सामुदायिक मानसिकता से निकलने के लिए आशा की एक नयी किरण है, एक सरल मार्ग प्रशस्त कर देता है, जिससे वास्तव में अखण्ड मानव समाज, सार्वभौम व्यवस्था इस धरती पर स्थापित हो सके|

इसी क्रम में एक सर्व धर्म सम्मेलन आयोजित किया गया हैं, जिसमे इस अनुसन्धान के फलस्वरूप ‘सार्वभौम मानव धर्म, मानव जाति एक, मानव धर्म’ एक का प्रतिपादन किया जायेगा| यह सभी धर्म के मानवों, एवं वे मानव जो अपने को किसी धर्म से जोड़कर नहीं भी देखते हो को इस प्रस्ताव को अपने ही सद्-विवेक से जांचने के लिए आमंत्रण है | इसके लिए सर्व धर्म सम्मेलन २३ अप्रैल, २०१२, को कानपुर में होगा | अधिक जानकारी के लिए: सम्मेलन वेब साईट: www.madhyasth.info देखें, फोन: 9793919149, 9451522231
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