बुधवार, 21 जनवरी 2009

देश आजाद मगर मानसिकता??


क्यों थोड़ा और सींचा
अपने भी गुलशन को,
दूसरे की दूब हरा बताने से पहले।

क्यों कभी जिक्र किया
हमने आयुर्वेद का
अमेरिका के मोहर लगाने से पहले।

क्यों नही पूजा कभी
अपने भी भगवान् को
उनकेहरे रामगुनगुनाने से पहले

और क्यों निकाला
रंगभेद अपने दिलों से
ओबामा के दृश्य में आने से पहले

ये कैसी कुंठा है
ये कैसा परदा है
हमें हमसे रूबरू होने नही देता।

कितने भी वर्ष बीतें
कितनी २६ जन्वारियाँ आयें
आज़ादी का एहसास मगर होने नही देता।

8 टिप्‍पणियां:

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

ये कैसी कुंठा है
ये कैसा परदा है
हमें हमसे रूबरू होने नही देता।

बहुत अच्छा |

विवेक सिंह ने कहा…

सत्यवचन !

विनय ने कहा…

बिल्कुल सही पकड़ रहे हो, बधाई


---आपका हार्दिक स्वागत है
चाँद, बादल और शाम

PN Subramanian ने कहा…

कितनी अजीब बात है. बहुत सुंदर. आभार.

राज भाटिय़ा ने कहा…

अमेरिका के मोहर लगाने से पहले। ....
भाई हमे सब कुच अमेरिका मै ही दिखता है... जेसे वो हमारा भगवान है.
बहुत सुंदर कविता कही आप ने
धन्यवाद

Nawal ने कहा…

Shabash

राधिका बुधकर ने कहा…

क्या बात हैं वर्षा जी ,कितने कम शब्दों में कितनी बड़ी बात कह दी आपने .ग्रेट ...........

Sachin Malhotra ने कहा…

simply nice.....:)