मंगलवार, 13 जनवरी 2009

और मैंने घोडे बेच दिए..

बहुत नाजों से उन्हें पाला था
चुन चुनके अस्तबल में डाला था।
विलायती भूसे का ढेर उनके लिए रखते थे
जब मिलता नही ख़ुद को निवाला था।

सोचे थे एक दिन क़र्ज़ अदा करेंगे
और नही मेरी छाती पर मूंग दला करेंगे।
एक दिन जब जीतेंगे रेस पे रेस ये
लोग इनकी हिन्हिन पे करोड़ों रखा करेंगे।

हर रेस में पीछे से अव्वल आते रहे
पर भूसा उतनी ही मात्रा में खाते रहे।
जब बैलेंस शीट में कुछ बैलेंस नही रहा
तब भी जाने कहाँ से नालायक मुनाफ़ा  दिखाते रहे।

फिर एक दिन हमने अक्ल का काम किया
सारे घोडे बेचकर बैंक में FD कर दिया।
उसके व्याज से दो जून की रोटी मिल जाती है
वास्तव में घोडे बेचकर अच्छी नींद आती है॥

(यह रचना उन कंपनियों के ऊपर है जो निवेशकों को ग़लत आंकड़े दिखाकर व बेवकूफ बनाकर अपनी घिनोनी करतूतों से उनकी पूँजी डूबा देती है)

7 टिप्‍पणियां:

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

बहुत बढ़िया|

"हर रेस में पीछे से अव्वल आते रहे
पर भूसा उतनी ही मात्रा में खाते रहे"

"जब बैलेंस शीट में कुछ बैलेंस नही रहा
तब भी जाने कहाँ से नालायक प्रोफिट दिखाते रहे"

लाइए ऑडिट कर देते हैं|

"वास्तव में घोडे बेचकर अच्छी नींद आती है॥"
इन घोडों के मालिकों के लिए यह हिदायत अच्छी है|

करारा व्यंग्य कविता में और भी असर रखता है|

Udan Tashtari ने कहा…

सटीक करारी चोट करती रचना. बधाई.

विवेक सिंह ने कहा…

करारी चोट कर दी वर्षा जी !

राज भाटिय़ा ने कहा…

वर्षा जी, यह कम्पनीया भी तो ऎसे लोगो को ही चुना लगती है, जो अपने पेसे को बिना मेहनत के दुगना तीगना करना चाहते है, यानि लालची लोगो को, तो ठीक है ना , सयानो ने युही नही कहा लालच बुरी बला है,
धन्यवाद

विनय ने कहा…

बहुत बढ़िया

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आप भारतीय हैं तो अपने ब्लॉग पर तिरंगा लगाना अवश्य पसंद करेगे, जाने कैसे?
तकनीक दृष्टा/Tech Prevue

Jyotsna Pandey ने कहा…

कविता का विषय सम-सामयिक है ,बड़ी सरलता से प्रस्तुत किया गया है .

बधाई ........

Major Maneka ने कहा…

अच्छी हास्य रचना है !
मजा आ गया !

आपको बधाई !