शुक्रवार, 9 जनवरी 2009

इंतज़ार एक गांधी का

यूँ तो बस एक तिनका हूँ
महलों की दीवारों में मेरा किरदार नही,
फिर भी मुझसे आशियाना बनता है
है एक पंछी, जो मेरी खोज में निकलता है।

यूँ तो मैं एक सरिता हूँ
क्षितिज को छूता मेरा विस्तार नही,
पर बह के जा मिलती हूँ सागर से
लेकर दिशा उस पत्थर से जो राह में मिलता है।

एक बिन्दु सी सिमटी हूँ जगत के पृष्ठ पर
बाकी के बिन्दुओं से मुझे सरोकार नही,
पर हम सब मिलकर एक रेखा बनाते हैं
उस विद्यार्थी के बल पर, जो कलम लेकर चलता है।

एक अंश मात्र हूँ करोड़ों की जनसंख्या का
कितना भी चीख लूँ कोई देता कान उधार नही,
इंतज़ार है तो उस गाँधी जो करोड़ों को एक करे
और ले चले वहाँ, अमन जहाँ मिलता है। 

7 टिप्‍पणियां:

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

भावपूर्ण कविता के लिए बधाई| पर प्रश्न यह है की गांधीजी अगर आ भी जाएँ तो क्या हम उन्हें पहचान लेंगे?

जब भी आपके ब्लॉग पर आता हूँ इस क्यूट पिल्ले पर नजर ठहर जाती है, देखिये ना आंखों में न जाने कौन से जज्बात लिए है| आप इस पिल्ले पर कोई कविता क्यूँ नही लिखतीं?

Udan Tashtari ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण रचना, बधाई.

विवेक सिंह ने कहा…

देश में इतने सारे गांधी तो हैं . इन्हीं में से किसी से काम चला लें :)

राज भाटिय़ा ने कहा…

यूँ तो बस एक तिनका हूँ
महलों की दीवारों में मेरा किरदार नही
फिर भी मुझसे आशियाना बनता है
है एक पंछी, जो मेरी खोज में निकलता है.
बहुत ही सुंदर रचना कही आप ने धन्यवाद

Major Maneka ने कहा…

सुन्दर भावपूर्ण रचना, बधाई

विनय ने कहा…

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति है

---मेरा पृष्ठ
चाँद, बादल और शाम

राधिका बुधकर ने कहा…

bahut hi sundar kavita likhi hain aapne ,bahut hi bhavpurn.