बुधवार, 7 जनवरी 2009

मेरे गाँव के पहाड़

वो शीत की बर्फ से
अपने तन को सजाते हैं,
और धूप पड़ने पर उससे
गंगा यमुना बहाते हैं।

वो हैं, तो देश में
अमन है, राहत है।
आख़िर कौन ‘लश्कर’ है, जिसमें
उन्हें लाँघने की हिम्मत है!

वो ठंडे हैं, निर्मम हैं, पत्थर हैं
किसी कवि की कल्पना से मेल नही खाते हैं।
फिर क्यों वो इतने रूमानी लगते हैं
क्यों हम उनकी कोख में खींचे चले आते हैं। 

5 टिप्‍पणियां:

अजित वडनेरकर ने कहा…

अच्छी बात कही...

राज भाटिय़ा ने कहा…

अति सुंदर कविता कही आप ने धन्यवाद

विवेक सिंह ने कहा…

बहुत खूब !

शाश्‍वत शेखर ने कहा…

बहुत सुंदर कविता, भावों से भरी हुई|

P.N. Subramanian ने कहा…

सुंदर कविता कहने के अतिरिक्त कुछ और शब्द ही नहीं हैं. आभार.