शनिवार, 6 दिसंबर 2008

स्वप्न

मैं स्वप्न हूँ।
बंद पलकों में
मेरा बसेरा है,
शाम की दहलीज़ पर
मेरा सवेरा है।
मुझमे एक आस है
चाह है प्यास है,
आज का एहसास है
कल का विश्वास है।
बंद पलकों में ही सही
मुझे यकीन है
कि  और बंदिश
नही सहूँगा,
एक दिन हकीकत बनके रहूँगा। 

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