सोमवार, 29 दिसंबर 2008

माँ को चैन कहाँ

नही मालूम, कि कितना
संघर्ष किया होगा।
ख़ुद को भूखा रखकर
मुझे अन्न दिया होगा।
नही मालूम कि  कैसे
दिन देखे होंगे। 
भीगी पलकों में कितने
सपने समेटे होंगे।
दरवाजे तक तो उसने
मुश्किल से रोका था,
मेरे जाते ही शायद
दरिया बहाए होंगे।
पढेगी लिखेगी
सयानी बनेगी
कांपते ह्रदय ने
सपने दिखाए होंगे।

मालूम है, तो बस ये
कि  रोज़ रात को
वो करवटें बदलती है,
कभ कभी बुरा सपना देखकर
घबरा जाती है,
रात के तीन बजे
मुझे फ़ोन लगाती है
और मेरी आवाज़ सुनकर
तसल्ली से सो जाती है। 

7 टिप्‍पणियां:

झरोखा ने कहा…

बहुत खूब वर्षा जी,
जितना बढ़िया मेरे ब्लॉग पर आपका कमेन्ट है उससे बढ़िया आपका ब्लॉग है ||
मेरी दो पंक्तियाँ आपकी इस पोस्ट के नाम :-
"ममता तो हर बीमारी की अचूक दवा होती है,
जो चंद खुशकिस्मतों के साथ सदा होती है ||"

Nirmla Kapila ने कहा…

bahut achhi lagi naya saal mubarak ho

mehek ने कहा…

mamta ko bahut sundar bhavna mein bayan kiya hai badhai

Udan Tashtari ने कहा…

बेहतरीन!!

Dr. Vijay Tiwari "Kislay" ने कहा…

सच है माँ के आगे सारे शब्द सारे भाव बौने पड़ जाते हैं वर्षा जी ,
अपने भाव भी रोक नहीं पा रहा हूँ---
माना तेरी उम्मीदों पर,खरा नहीं मैं उतरा हूँ..
लेकिन तुमको कहाँ पता मैं,किस पीड़ा से गुजरा हूँ...
हाथों का स्पर्शी मरहम,मुझे लगाने आ जाओ,
ममता के आँचल में फ़िर से मुझे सुलाने आ जाओ

- विजय

Mired Mirage ने कहा…

बहुत सुंदर लिखा है। जानती हूँ कि कैसे स्वयं को रोकना पड़ता है बेटियों को बार बार फोन करने से। कैसे पल पल उनकी याद आती है।
घुघूती बासूती

राज भाटिय़ा ने कहा…

हां मां ऎसी ही होती है,बहुत सुंदर कविता लिखी आप ने. धन्यवाद