शनिवार, 6 दिसंबर 2008

कुछ तो है..

कुछ तो है
इस रिश्ते में
जिसके आने का
आभास नही होता
जसके ठहरने का
एहसास नही होता
शहद की तरह जो
लहू में घुल जाता है
हर मुश्किल
पतझड़ के पत्तों सी
टूटकर बिखर जाती है
हर उम्मीद सुबह की किरण सी
खिड़की पर आती है
अलसाई आंखों पर
डेरा जमाती है
जाने क्या है
इस रिश्ते में
स्लेट पर चाक से
नाम तो बहुत लिखे होते हैं
एक रह जाता है
जो अधूरे किस्से को
मुकाम पर लाता है
कुछ तो है
इस रिश्ते में...

कोई टिप्पणी नहीं: