रविवार, 28 दिसंबर 2008

वो गुलिस्तां ही क्या जो
काँटों से बैर रखता हो
वो कमल कैसा जो
कीचड में न खिलता हो
वो दीपक क्या जो
ख़ुद को जलाकर न जले
और वो नौजवां क्या जो
खून पसीने से डरता हो
कलम की असल धार
इम्तिहान में पता चलती है
तारे को भी इज्ज़त
टूटने पर ही मिलती है
कुछ पाने के लिए
कुछ तो करना पड़ता है
अमर होने के लिए यारों
एक बार तो मरना पड़ता है ॥

3 टिप्‍पणियां:

Nirmla Kapila ने कहा…

अमर होने को एक बार तो मरना पडता है
बहुत खूब्

P.N. Subramanian ने कहा…

बहुत ही सुंदर. हमारा आज का ब्रेकफास्ट हो गया.

नीरज गोस्वामी ने कहा…

आप के इस ज़ज़बे को सलाम....बहुत खूब....
नीरज