शनिवार, 27 दिसंबर 2008

मिटटी

मिटटी का रंग
उसकी सौंधी महक की तरह
भीतर तक उतरता जाता है।
पर्त दर पर्त
ये निखरता जाता है ।

जो पैदा हुआ है
मिटटी में समाया है ।
समस्त सभ्यताओं को
मिटटी ने बसाया है ।

जो इससे नही जुड़ा
वो महज़ एक छलावा है,
आसमां का पंछी है
झूठ है, दिखावा है ।

तुझमे राम का जन्म है,
तुझमे रावण का संहार है,
हे मिटटी, तुझ में ही तो
समस्त जीवन का सार है ।

2 टिप्‍पणियां:

संगीता पुरी ने कहा…

तुझमे राम का जन्म है,
तुझमे रावण का संहार है,
हे मिटटी, तुझ में ही तो
समस्त जीवन का सार है ।
बहुत सुंदर।

GURUDATT ने कहा…

अच्छा है। कुछ मुल्लू पर भी लिखना.....