गुरुवार, 4 दिसंबर 2008

काफिर कौन

जाने क्यों
वो हमें काफिर कहते हैं
दिखते तो हम
उनके जैसे ही हैं
ज़बान भी हमारी मिलती है..
फिर क्यों वो हमसे
नफरत करते हैं
हमें जानते नही
फिर भी हमें
ख़त्म करने की बात करते हैं
कैसे उन्हें समझाएं
की दिन के २४ घंटों में से
१० घंटे तो हम
ऑफिस में होते हैं
आठ घंटे सोते हैं
बाकी के ६ घंटे
खाना खाते हैं, नहाते धोते हैं
टी वी देखते हैं
हमें तो उनको याद करने की
या उनसे बेवजह नफरत करने की
फुर्सत ही नही होती
फिर वो क्यों हमारे बारे में
इतना सोचते हैं
कैसे उन्हें समझाएं
की उनके असल दुश्मन
तो वो ख़ुद हैं
जो नारकीय कर्म करके
जन्नत जाना चाहते हैं.
अगर जन्नत में हमें
उन जैसे लोग मिलें
तो अल्लाह हमपे रहम करना
हमें जन्नत मत भेजना..

1 टिप्पणी:

PD ने कहा…

मैं किसी भी ब्लौगर को(ब्लौग को नहीं:)) जब पढ़ना शुरू करता हूं तो सबसे पहले मैं उसकी पहली पोस्ट पढ़ता हूं.. अभी आपकी पोस्ट भी पढ़ी.. बहुत सही लिखा है आपने.. अगर ऐसे मुल्ला-पंडित स्वर्ग में रहते हैं तो हमारे लिये नर्क ही बेहतर है..