बृहस्पतिवार, 21 अप्रैल 2011

हूँ मैं वही..


ज़िन्दगी के पन्नों में मुरझाती सी इक कली हूँ
ढूंढो तो शायद खुशबुओं का पता मिलेगा.

आईने में जमी बरसों की परतों तले
तकती आँखों में ख्वाबों का मकां मिलेगा.

उम्र की बेतरतीब झुर्रियों में दफ़न कहीं
यौवन के हर मौसम का निशाँ मिलेगा.

हूँ मैं वही, बस नज़रिए ज़मानों के बदल जाते हैं.
हूँ मैं वही, बस पते ठिकानों के बदल जाते हैं.

शनिवार, 12 मार्च 2011

नश्वरता



पर्वतों की ऊंचाइयों में
कहीं खोकर रह जाएगा
सागर की गहराइयों में 
दफन होकर रह जाएगा

उन्मुक्त आंचल का विस्तार 
कभी तूफान समेट लेंगे
कभी तपते सूरज में
यह अस्तित्व पिघल जाएगा

कितना कुछ भी आर्जित कर लूं
सब कुछ पीछे रह जाएगा
 यह तन मिट्टी से उपजा था
मिट्टी में ही मिल जाएगा


शनिवार, 2 अक्तूबर 2010

मेरी अयोध्या


धू धू कर जलती है
मेरी अयोध्या
बरसों से ज़ख़्मी है
मेरी अयोध्या

धरती के उस खंड में
मुझे ईश्वर दीखता है
धरती के उस खंड में
उसे अल्लाह दीखता है
ईश्वर अल्लाह तो
प्रेम से रहते होंगे
पर खंडित होती है
मेरी अयोध्या

धर्म कब किसी को
अधर्म सिखाता है
भाई भाई को दुश्मन
धर्म कब बनाता है
यह मैल तो मेरे
दूषित मन में है
जिससे मलिन होती है
मेरी अयोध्या

कहती है ये अयोध्या
कि घोर कलयुग जाएगा
मेरी साख को बचाने
एक राम फिर आएगा
तब तक खामोश सी
तमाशा देखती है
सिसकियाँ भरती है
मेरी अयोध्या.

शुक्रवार, 1 जनवरी 2010

संतरे की वो फांक..

"मम्मी देखो कितनी छोटी फांक है!" वो  संतरा खा रही थी और एक छोटी सी फांक पर उसकी नज़र पड़ी.
"बेटा उसे फेंक दे."
"क्यों मम्मी?"
"क्योंकि ऐसी फांक खाने से.. तेरे पापा को भगवान् ले जाएगा."
"अरे ऐसा क्यों होगा? कहाँ लिखा है ऐसा? ये भी कोई बात हुई कि छोटी फांक खाने से पापा .."
"अब है तो है..मत खा उसे."
उसने  फांक छोड़ दी. आठ साल की थी वो. अंधविश्वास से बहुत अधिक पाला नहीं पड़ा था, मन नहीं मान रहा था पर जहां पापा कि ज़िन्दगी का सवाल था वहाँ रिस्क लेने की भी हिम्मत नहीं थी.

धीरे धीरे बड़ी हुई. बहुत से ऐसे अंधविश्वासों की उसने  धज्जियां उड़ा दीं. बिल्ली रास्ता काट जाती तो वो और खुश होकर आगे बढती. नाखून काटने की याद उसी दिन आती जिस दिन मंगलवार होता. शनिवार को दुनिया भर की शौपिंग करती (शनिवार को नयी चीज़ें खरीदने से मना किया जाता है खासकर धातु की पर उसकी  समस्या ये थी की पूरे सप्ताह में वही दिन होता था जब थोडा वक़्त मिलता था ये सब काम करने का)
विज्ञान  में उसकी  विशेष रुचि होने से इस प्रवृति को और संबल मिलता. वो किसी भी ऐसी वैसी हिदायत मिलने पर उसका कारण पूछती. कुछ कुछ बातों का उसे  तर्क भी मिल जाता और फिर वो उन्हें अंधविश्वास की श्रेणी से हटा देती.

लेकिन संतरे की कोई छोटी फांक मिलती तो वो उसे सीधे सीधे फेंक देती. उसका उसे कोई तर्क नहीं मिला, कैसे उसे खाने से पापा की जान को खतरा हो सकता है? पर मन नहीं मानता. छोटी मोटी बातों के लिए इतनी बड़ी चीज़ दांव पर लगाना, उससे  न हो पाता.
कल दोपहर में खाना खाने के बाद एक संतरा छीलते हुए  एक छोटी फांक पर उसकी  नज़र पड़ी. आदतन उसे फेंकने को हाथ उठाया, फिर याद आया..  पापा को तो भगवान् ले गए ..एक महीने पहले..वो  मिल भी नहीं पायी थी  उनसे..इतनी जल्दी सब कुछ हो गया..
जबकि उसने  भूल से भी कभी संतरे की वो छोटी फांक नहीं खायी थी..फिर भी.. अब क्या उसे  मान लेना चाहिए की वो एक अंधविश्वास था? अब क्या वो  उस आदत को बदल सकती थी ?

उसने एक हाथ से वह छोटी सी फांक अलग करके फेंक दी.


बृहस्पतिवार, 17 दिसम्बर 2009

अभी कहाँ कुछ देखा था आपने...


"क्या हावड़ा ब्रिज देखने को मिलेगा?"
"बिल्कुल, आप चलिए तो सही!"

उस दिन मैं अपने मम्मी पापा को कोलकाता घुमाने ले जा रही थी। पापा बहुत उत्साहित थे, उन्होंने अपने ज़माने की फिल्मों में हावड़ा ब्रिज देखा था और तब से उनकी दिली इच्छा थी उसे देखने की।

हावड़ा स्टेशन पहुँचने पर जब हम बाहर निकले, तो सामने हावड़ा ब्रिज गर्व से सीना ताने खडा था। मैंने पापा को इशारे से बताया। वो ठिठक गए, उन्हें विश्वास नही हुआ की कोलकाता पहुँचते ही उनकी यह इच्छा पूरी हो जायेगी। खड़े खड़े उसे निहारने लगे, शायद वो ज़माना याद आ गया जब उस पर फ़िल्म बनी थी।

थोड़ी देर रुक कर मैंने कहा "अब यहीं खड़े रहना है या कोलकाता भी घूमना है?"

और उनका जवाब अब तक मेरे कानो में गूंजता है। "हावड़ा ब्रिज देख लिया, सब कुछ देख लिया।"
उस दिन मैं भी भावुक हो गई थी, मुझे भी उस लोहे के पुल में जान दिखी थी, पर यह नही महसूस हुआ था की एक दिन मैं यह वाकया इस तरह सहेज कर रखूंगी, इस तरह लिखूंगी।

मुझे नही पता था की ज़िन्दगी के बारे में भी उनकी यही राय थी, इतना कुछ देख लिया, सब कुछ देख लिया।

अभी कहाँ देखा था, अभी तो हमें आपको और भी बहुत घुमाना था, बहुत कुछ दिखाना था...

सोमवार, 31 अगस्त 2009

चिन्ना की शह, मेहरू की मात

मेहरू और चिन्ना
बंद कमरे में बैठे थे
विभाजन करें या न करें
इस पर चिंतन करते थे

बोले चिन्ना “ ड्रा करते हें
“हाँ” आया तो विभाजन होगा
“ना” होगा तो बिन्दुस्तान
एक अखंडित वतन होगा.

मेहरू राज़ी हो गए
चिन्ना ने दो पर्चियां बनायी
दोनों में “हाँ” लिखकर
मेहरू को पर्चियां थमाई

मेहरू ने पर्ची उठायी
“हाँ ” देखकर आँख भर आई
देश का विभाजन हुआ
चिन्ना ने पर्चियां जेब में पहुंचाई.

चिन्ना को अलविदा कहते
मेहरू गले लगकर रोये
चिन्ना भी आश्चर्यचकित थे
इतना प्यार थे मेहरू छुपाये.

एक साल में चिन्ना को
यमलोक से बुलावा आया
जन्नत भेजें या जहन्नुम में
चित्रगुप्त को समझ न आया

बोले चिन्ना " ड्रा करते हें
“हाँ” होगा तो जन्नत होगी"
और जेब से पर्चियां निकाल
चित्रगुप्त को थमा दीं

चित्रगुप्त ने एक पर्ची खोली
और सदमे में आ गए चिन्ना
इन पर तो था ‘हाँ’ लिखा हुआ
अब क्यों इनपर दीखता है ना ’

गए जहन्नुम, देखा जाकर
खोली उसने दूसरी पर्ची
लिखा ‘ना' था उस पर भी
और लिखावट मेहरू की थी!

गले लगाकर जाते जाते
मेहरू ने ना प्यार जताया
धूर्त चिन्ना को उसी के दांव से
मेहरू ने जहन्नुम पहुंचाया.

शुक्रवार, 28 अगस्त 2009

लीची, आम, और मायाजाल


हाल ही में मैंने लीची व आम जैसे फलों से एक सारगर्भित बात जानी है। इससे मेरा माया-मोह पर से विश्वास एक साल के लिए उठ गया है।


क्या करें, लीची व आम मेरे सर्वाधिक पसंदीदा फल हें, लेकिन आने से पहले जाने की तारीख बता जाते हें। इस बार भी जब लीची बिकनी शुरू हुई तो मैंने पुराने अनुभवों से सबक लेकर झटपट खूब सारी लीचियां रोज खानी शुरू कर दीं। जब तक सीज़न ख़त्म हुआ मेरा मन भी लीची से भर चुका था। और अब मेरी नज़र थी आम पर! आम थोड़ा कम भाव खाते हें और आम जनता के साथ ज्यादा वक्त बिताते हें। तो मैंने पूरे तीन महीने आम का जायका लिया और जब वो पचास रुपये किलो मिलने लगे तो मैंने रास्ता नाप लिया।


लेकिन फ़िर मैं दुखी हो गई क्योंकि अब कोई और फल मुझे पसंद नहीं था। मैं बहुत परेशान सी रहने लगी और कमज़ोर भी हो गई। मैंने इश्वर से पूछा की क्यों वो ऐसे खेल मेरे साथ खेलता है, क्यों नही इन फलों को साल भर उपलब्ध कराता? पर कोई जवाब नहीं मिला।


फ़िर एक दिन मैं दुखी मन से सब्जी खरीद रही थी, की मेरी नज़र फूल गोभी पर पड़ी। मुझे याद आया की अब तो फूल गोभी का सीज़न शुरू होने वाला हैअब मुझे उम्मीद की वो किरण मिल गई जिसे थाम कर मैं यह सीज़न काट सकती।


फ़िर मैंने महसूस किया की यही तो इश्वर की लीला है, यही तो उसका मोह जाल है जो साल भर चलता है। जो जीवन का सही अर्थ जान गया वो इन सब मायाओं से परे होकर जब जो मिलता है उसी में खुश रहता है, बाकी लोग इस मौसम में उस मौसम की यादें लेकर रोते बिलखते हें, और उस मौसम में इस मौसम की!


फ़िर मैंने निर्णय लिया की जिस मौसम में जो मिलेगा उसी में संतुष्ट रहूंगी। लेकिन यह सिर्फ़ एक साल के लिए है, उसके बाद फ़िर लीची, फ़िर आम, और फ़िर वही मायाजाल!