शुक्रवार, 7 अप्रैल 2017

मौसीजी

                 
गर्मी बेतहाशा थी। राजस्थान बाॅर्डर से सटे रेगिस्तानी कस्बे में लू उठने लगी थी। लड़कियाँ दुपट्टे से मुँह ढाँके, लड़के फाइल सर पर चढाए काॅलेज निकलते। कोई रास्ता नहीं था, एसी वगैरह आम लोगों की पहुँच से बाहर थे, कोई ज्यादा ही रईस होता तो कूलर लगवा लेता।

हम लोगों के लिये एक सीनियर का रूम था जो थोड़ा पेड़वेड़ से ढंका था तो उतना नहीं गरमाता। सब लड़के मुँह उठाए वहीं धमक जाते। आड़े तिरछे उल्टे सीधे जैसेतैसे सब कोई हिस्सा कब्जाके मुँह खोलकर सोते रहते। सीनियर बड़े दिलवाला था, शुरू में जितनी रैगिंग लेता, बाद में उतना ही दुलार भी देता। सब कुछ ठीक था, बस इस रेगिस्तानी गर्मी को छोड़कर।

मैं थोड़ी मोटी खाल का था, काॅलेज के बाद अपने रूम में रहता। गर्मी एक सच था जिससे मैं भागकर किसी मिथ्या की शरण नहीं लेना चाहता था। पुराने से कैसेट प्लेयर में लकी अली की ‘सिफर’ डालता, और हर मुश्किल, हर पसीने की बूंद को भूलकर एकाध घंटे के लिये जिन्दगी से ब्रेक ले लेता। जहाँ गीत ले जाते, चल पड़ता।

पर पूरे हफ्ते की दौड़भाग के बाद वीकेंड जैसे एक बोझिल फिल्म की तरह आता। मेरे आसपास वाले सब अपनेअपने घरों के लिये बस पकड़ने निकल जाते, घरों में मम्मियों का लाड़ और फ्रिज का ठंडा पानी उनका इंतजार जो कर रही होती। पर मैं कहाँ जा सकता था, मेरा तो घर इतना दूर था कि आनेजाने में ही तीन दिन लगते। शुरुआत के दोचार हफ्ते वहीं रहा, पर फिर एक दिन मम्मी से टेलीफोन बूथ पर बात करते हुए मौसीजी का जिक्र आया।
और अगला फोन मैंने उन्हें ही कर डाला, बताने के लिये कि कल सवेरे पहुँच रहा हूँ।

*
मौसीजी मेरे काॅलेज के पास वाले शहर में थीं, ये बात मैं जानता था। जब पहले दिन पापा छोड़ने आए, तो उनसे मिलने गये भी थे। उन्होंने कहा भी था कि बेटा आते रहना जब भी छुट्टियाँ पड़ें। पर मैं तो मैं था, अपने अंतर्मुखी स्वभाव के सामने सुखसुविधा की किसी संभावना को बलि चढाने को तत्पर। वर्ना क्या मैं भी नहीं उन सीनियर के ठंडे रूम में जाकर डला रहता!

खैर, अब वीकेंड अझेल हो रहे थे, पापा रिटायर हो चुके थे तो मैं ज्यादा फिजूलखर्च भी नहीं करता था। गन्ने का रस भी सोचसोच कर पीता। ऐसा नहीं कि पिताजी कम पैसे भेजते थे, वो तो जितना माँगूँ उसका दुगुना देते थे, जाने कैसे। इसलिये मैं ही कम मांगता था। कोई भी कड़वा सच,  मुझे जिन्दगी से डगमगा नहीं पाता था। मैं और मेरी सहनशक्ति कभी एक दूसरे से सवालजवाब नहीं करते। मैं जो कहता, वो सर झुकाकर मान लेती। गर्मी सहनी है तो सहनी है। गन्ने का रस नहीं पीना है तो नहीं पीना है।

पर इस बार दबे शब्दों में मेरी सहनशक्ति ने पलटकर कह दिया था, एक बार होके तो आओ। चार साल इस रेगिस्तान में बिताने ही थे, एक बार मिल आने में क्या हर्ज था। कलेजे को नहीं तो ठंडा पानी पीके पेट को ही ठंडक मिले।

अगले दिन सुबह मैं मुँह उठाए उनके घर पहुँच गया। मेरे दिमाग में पूरा प्लान था, इस पहली ट्रिप में मौसीजी का व उनके परिवार का मेरे प्रति रिएक्शन देखना। एक भी नकारात्मक तरंग मेरे रडार में आई तो भावी यात्राएं कैंसिल। मैं स्वभिमानी था, किसी पर बोझ की तरह लदने वाला नहीं। मौसीजी मेरी माँ की चचेरी बहन थी, और बुरी खबर ये थी कि दोनों चाचाओं की आपस में कुछ खास नहीं बनती थी। चाचियों ने अलग ही होड़ लगा रखी थी, किसका बेटा कितनी मोटी तनख्वाह लाया, किसकी बेटी कितने अच्छे घर में ब्याही गई, बस यही सब। स्वाभाविक था कि अगली पीढी यानी मेरी माँ व मौसियों में भी थोड़ीबहुत होड़ लगती। तो अब जब मैं सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज पहुँच चुका था, और उनका बड़ा बेटा दुनियाभर की कोचिंग करके भी एक दूरदराज के प्राइवेट काॅलेज में बाकी के पैसे फुँकवा रहा था, तो मुझे अपना खुले दिल से स्वागत होने के आसार कम लग रहे थे।
खैर, ये सब तो सुनीसुनाई बातें थीं। हकीकत तो अब सामने आनी थी।

*
मौसाजी ऑफिस निकल चुके थे। छोटी बेटी जो अभी ग्यारहवीं कक्षा में गई थी, स्कूल जा चुकी थी। मौसीजी ने दरवाजा खोलते ही पूरी गर्मजोशी से मेरा स्वागत किया। नाश्ता दूध फल सब तैयार थे। मैंने नहाधोकर भरपेट नाश्ता किया। बड़े बेटे अजय का रूम खाली था तो मेरा दो दिन का डेरा वहीं जम गया। यूँ तो मैं भी जानता था कि ये सिर्फ गरमियों की बात थी, फिर तो इतना काम होगा कि मुझे फुरसत ही नहीं होगी वीकेंड में कहीं जाने की। खैर, वो सब बाद की बात थे।

नाश्ते के बाद मौसीजी ने खूब गप्पें मारीं। गाँव में कौन क्या कर रहा, सबकी खबर ली। अपने द्वारा जुड़ाए कुछ रिश्तों का बखान किया। किसी किसी बात पर नई पीढी को कोसा। पता नहीं क्यों, मुझे अपनी माँ की याद आ गई। ऐसी ही यो थीं वे, सब कुछ खुले दिल से कह देने वाली। घर आए मेहमान को ठूँसठूँसकर खिलाने वाली। एक पल भी मुझे नहीं लगा कि इन्होंने कभी अपने बेटे की तुलना मुझसे की होगी और कुढी होंगी।

दोपहर खाने के ठीक बाद उनके घर में दस्तक हुई। कोई दूर का रिश्तेदार था, शहर में किसी काम से आया था। मौसीजी ने झट से उन्हें खाना परोस दिया। वो भी आराम से खाने लगे जैसे जानते हों कि उनके लिये तो खाना बना ही होगा। पर जहाँ तक मुझे खबर थी, ये अकस्मात आए मेहमान थे। खैर, मैं आराम करने चला गया।

शाम को उठा तो मौसाजी भी आ चुके थे और छुटकी (उनकी बेटी) भी एक ट्यूशन से लौटके दूसरी को जा रही थी। चाय के साथ गप्पें चलीं, काॅलेज का माहौल, रैगिंग, प्लेसमेंट वगैरह, जो नौर्मल चिंताएं अभिभावकों को होती हैं। बड़े बेटे से मिली निराशा के बाद उन्होंने अपना ध्यान छुटकी पर लगा दिया था, पर मुझे ये भी बता दिया गया था कि इसके पीछे पैसा पानी की तरह नहीं बहा पाएंगे। आखिर इसकी शादी के लिये भी तो जोड़ने हैं। किसी सरकारी इंजीनियरिंग काॅलेज में निकल जाए तो ठीक है वर्ना कुछ और कर लेगी।

डिनर पर मैंने छुटकी से उसकी पढाई का हालचाल पूछा। कुछ अच्छी किताबों के नाम गिनाए। इतने में ही वो मुझसे इतनी प्रभावित हो गई कि अगले दिन कुछ फिजिक्स के डाउट्स लेके आ गई। मैंने भी थोड़ा यहाँ वहाँ के उदाहरण देके कांसेप्ट क्लीयर करवा दिया। आखिर सबसे प्रिय विषय था ये मेरा। फिजिक्स से इन्सान को या तो बहुत प्यार हो सकता है या बहुत नफरत। कोई बीच का रास्ता नहीं।

और शाम को जब मैं निकलने के लिये तैयार हुआ तो इससे पहले कि मैं अगले विजिट के बारे में कोई राय बना पाता, मौसीजी खुद मेरे पास आई। “इसी तरह आते रहना बेटा, छुटकी बहुत तारीफ कर रही थी तुम्हारी। थोड़ा थोड़ा तुमसे पढती रहेगी तो भविष्य बन जाएगा उसका। तेज है वो, बस सही गाइडेंस नहीं दे पा रहे हम उसको। अजय का तो मन नहीं लगता था पढने में, इसका खूब लगता है। इंजीनियर न सही, कुछ तो बन ही जाए।“

अब मुझे कुछ सोचने की जरूरत नहीं थी। अगले दो साल तक मैं बेझिझक कभी भी आ जा सकता था। छुटकी का भविष्य संवारने जैसा नेक काम थोड़ाबहुत मेरे कंधों पर खिसका दिया गया था, जिसकी मुझे खुशी ही थी। किसी के काम आऊँ अच्छा लगता था।

वो गरमियाँ अब उतनी अझेल नहीं रहीं थीं। हफ्तेभर की झुलस को दो दिन की ठंडक मिल जाती तो आगे की झुलस के लिये शरीर-मन तैयार रहता। पढाई भी ठीकठाक चल रही थी, मेरी भी व छुटकी की भी। फिजिक्स अब उसका पसंदीदा विषय था।

और मौसीजी के तो क्या कहने। वही माँ के हाथ वाला स्वाद, वही ‘कमजोर हो गया है एक परांठा और खा’ वाला अपनापन। धीरेधीरे मैं उनके परिवार से घुलमिल सा गया। और फिर उनकी अंदरूनी बातें मेरे कान में पड़ने लगीं।

 उनका घर शहर में था जहाँ हाॅस्पिटल से लेके दुनियाभर की परीक्षाओं का सैंटर पड़ा करते था। करीबी से लेके दूरदराज तक के सब दोस्त-रिश्तेदार मुँह उठाए चले आते थे। और मौसीजी सबकी यथासंभव सहायता करती, कभीकभी खुद के बजट में कटौती करके। मौसाजी व बच्चों को ये बात पसंद नहीं थी। उन्हें तो ये भी लगता था कि बड़े बेटे अजय के औसत रिजल्ट के पीछे इस मेहमाननवाजी का भी हाथ था। और पैसे भी नहीं बच पा रहे थे। खाने खिलाने में ही सब खप जाता था। कभी कभी तो छुटकी भी आवाज उठाने लगती थी। उसकी चिंता भी जायज थी, आगे की पढाई दाँव पर थी।

पर जाने क्यों, मौसीजी खुद को बदल नहीं पातीं। आना जाना, खाना-खिलाना लगा रहता। यह स्वभाव उनके खून में था,, भूखे को प्रेम से खिलाना। अक्सर मैं सोचता था कि दिन के किसी भी पहर कोई आ जाय, भूखा नहीं जाता था। पता नहीं कहाँ से खाना निकल आता। और सच तो ये था कि मैं नहीं चाहता था कि ये बदले। हम जैसों का भी यही तो सहारा था। घर से दूर, जीवन में संघर्षरत किसी को दो पल ठंडी छाँव मिलती तो उसका मनोबल ही बढता।

खैर, मैं कौन होता था अपनी राय देने वाला? आता, छुटकी को पढाता, खापीकर निकल लेता। दो साल गुजर गये। मुझे अब उतना वक्त नहीं मिल पाता। पर गर्मियों के वे अझेल वीकेंड तो वहीं कटते।

और फिर छुटकी का समय आया। बहुत अच्छे नंबरों से बोर्ड की परीक्षा में पास हुई थी, पर दुर्भाग्य से प्रतियोगी परीक्षा में इतनी अच्छी रैंक न आ पाई कि किसी सरकारी या कम खर्च वाले काॅलेज में दाखिला मिल सके। मुझे इसका अंदेशा था, इन परीक्षाओं का स्तर अलग ही होता था, बिना सही कोचिंग के,  सामान्य ट्यूशन्स से इनको पार करना मुश्किल था।
छुटकी उदास थी। मैंने उसे समझाया कि किसी अच्छे काॅलेज से साइंस में ग्रेजुएशन कर ले, फिर रिसर्च के लिये दुनियाभर के मौके मिलेंगे। एक इंजीनियर जिस फाॅरमुले का उपयोग करके काम करता है, वे किसी वैज्ञानिक ने बनाए होते हैं। बनना है तो वैज्ञानिक बनो, नए फाॅरमूले इजाद करो। एक रास्ता बंद हुआ तो दूसरा खुला भी है।

 पता नहीं उसने कितना सुना और कितना गंभीरता से लिया, पर उसके बाद मेरी उससे कभी मुलाकात नहीं हुई। मैं ही नहीं जाता था अब, मौसीजी के घर। क्या करता जाकर? पहले ही मौसीजी अपनी थाली से बचाबचाकर कितनों का पेट भरती थीं, घरवालों के ताने सुनती थीं। अब कमसे कम अपना बोझ तो न डालता।

*
काॅलेज खत्म हुआ। नौकरी मिली। शादी हुई। मौसीजी से संपर्क लगभग टूट गया था। अंतर्मुखी था, ज्यादा रिश्तेदारी निभाना आता नहीं था मुझे। पर एक हसरत थी कि कभी उनके पास जाकर एक अच्छी सी साड़ी उनके चरणों में रख दूँ। दिन महीने साल बीतते जाते पर हसरतें मन में रह जातीं। काफी दूर पोस्टिंग थी मेरी, उनकी तरफ आने की कोई वजह ही नहीं मिल पाती।

पर कल जब काम के सिलसिले में बैंगलौर गया था, पता चला कि छुटकी भी उसी शहर में है। मेरी माँ को सबकी खबर रहती थी, उन्होंने ही बताया था कि वो एक सरकारी रिसर्च इंटिट्यूट में कनिष्ठ वैज्ञानिक बन चुकी है। मेरे चेहरे पर संतोष भरी मुस्कान थी। अब तो मुझे उससे मिलना ही था, वर्ना फिर कब मौका मिले। मेरी मीटिंग काफी लेट चली थी, लंचटाइम में भी खिंच गई। तीन बजे छूटा, और छः बजे की लौटने की फ्लाइट थी। सौभाग्य से शनिवार था और उसकी छुट्टी थी। मैंने फोन किया और आधे घंटे में मैं उसके घर पर था।

उसने लंच के लिये पूछा तो मैंने कह दिया कि करके आया हूँ। फिर बहुत सी बातें हुईं, मौसीजी का हाल चाल पता चला। मैं सोच रहा था, क्या अब भी वो अपनी माँ के बारे में वही सोचती होगी जो स्कूल के वक्त सोचा करती थी। फिजूलखर्च करने वाली, मेहमानदारी जमाके पढाई में खलल डलवाने वाली? काश अब ऐसा न हो, आखिर उन जरूरतमंदों की दुआएं भी तो लगी होंगी, जो आज वो इस मुकाम पर है।

और फिर, थोड़ी देर में, वो खाने की थाली ले आई।  जाने कैसे वो जान गई कि मैं भूखा था। मैंने पूछा उसका खाना कहाँ है, तो बोली कि पहले ही खा लिया था।

मैं जानता था, कि वो झूठ बोल रही थी। अपना लंच मुझे खिला रही थी। मैं हँस भी रहा था, रो भी।


रविवार, 14 फ़रवरी 2016

थिंचौणी


बस आधा घंटा और था घर पहुँचने में। पहाड़ की सर्पीली सड़क में जीएमवीएन की बस दौड़ी जा रही थी। सबको घर पहुँचने की जल्दी थी शायद। अंगीठी के पास बैठकर   सर्द हो चुकी शाम से खुद को बचाने की चाह में।  अदरक डली चाय की चुस्कियों की चाह में। गप्पों, कहकहों संग भुनी मूंगफलियां तोड़ने की चाह में। और  घर जितना पास आता जाता था, नीतू की सिहरन बढ़ती जाती थी। वर्षों बाद अपनों से मिलने की सिहरन। जाने कैसा होगा वो घर, किस हाल में होंगी  उसकी माँ।  फ़ोन पर तो उनका बुढ़ापा साल दर साल बढ़ने की आहट देता था, अब बालों का रंग भी गवाही देगा।
 ऐसा क्यों था, क्यों अभिशप्त थे पहाड़ी लोग एक बार बाहर निकले तो फिर बरसों दूर रहने के लिए? क्यों यहाँ  आना जाना इतना आसान नहीं था जितना देश के बाकी हिस्सों में पहुँचना। और अब जब आर्यन चार साल का होने वाला था तो उसने जिद करके पति अजय को मायके चलने के लिए राजी किया था। अजय का घर तो ट्रेन से ओवरनाइट का सफर था, आधिकांश छुट्टियाँ वहीं बीत जाया करती थीं। पर अब पहाड़ नीतू को चीख चीखकर पुकारता था।  अब दूरी सही नहीं जाती थी।  कुछ क़र्ज़ था उस मिट्टी का, उस माँ का जो अब  चुकाना था। कुछ था जो पिछले कुछ सालों से अंदर ही अंदर उसको कचोटता जाता था,  खासकर जब से आर्यन के आने की पहली आहट   हुई थी।

"रुद्रप्रयाग  वाली सवारी आगे आ जाएँ। " बस कंडक्टर ने उन नए लोगों की खातिर ऎलान किया था जो पहली बार पहाड़ आ रहे थे। अजय ने सीट के नीचे से बैग निकाला। आर्यन जो खिड़की से पहाड़ और नदी को निहारने में मग्न था अब पहुँचने  की खबर सुनकर और भी खुश हो गया था। इतनी सुन्दर जगह तो अब तक टीवी में ही देखने को मिलती थी।

"मम्मा यहाँ आपका घर है?"
"हाँ बेटा , यहीं रहती थी आपकी मम्मा बचपन में। "
"कितनी सुन्दर जगह है! हम लोग हमेशा के लिए यहाँ नहीं रह सकते?"

कितना मासूम सवाल था , और इसके जवाब में उसके पास सिर्फ एक शब्द था।  काश।

*

" आज क्या आया है लंच में?" रोज दोपहर दो बजे स्वाति ये रूटीन प्रश्न करती थी और नीतू जैसे नींद से जागती थी। एक ही  कंपनी में जॉब करते थे पर विभाग अलग थे और थोड़े दूर भी।  लंच के बाद अक्सर चाय का प्लान बनाके कैंटीन पहुँच जाते थे। दिन भर के बोरिंग कामों का ब्यौरा एक दूसरे को देते थे।
"आज जो आया है वो अझेल है। "
"क्यों बैंगन आ गया लहसुन डला?"
"नहीं लौंकी है उबली वाली। "
"ओह फिर तो समोसे पे मिलते हैं। "
"हाँ यार कुछ तो खाना पड़ेगा ये डब्बा तो जान ले लेगा। " डब्बा सुबह ८  बजे उसकी कुक आके पका जाती थी। उसके पति को भी मिलता था यही खाना दूसरे डब्बे में। पास में ही ऑफिस था पर काम ज्यादा रहता था, मिलना नहीं हो पाता था।
और वो कैंटीन पहुँच चुकी थी, समोसे से अपनी भूख मिटाने के लिए। स्वाति पहले ही पहुँच चुकी थी, आर्डर भी दे दिया था।

"क्या खाने का मन करता है तेरा? मैं खिला दूँगी एक दिन। " स्वाति ने काफी गंभीरता से प्रश्न किया था।  गंभीर होने की बात भी थी। पहले की बात अलग थी, खाया न खाया कोई फर्क नहीं पड़ता था। पर अब बात अलग थी, नीतू प्रेग्नेंट थी। तीसरा महीना चल रहा था।

"कुछ नहीं, रहने दे। "
"बता न! मैं बनाके  खिलाऊँगी तुझे। "
"नहीं खिला पाएगी तू। "
"अरे बता न!   गूगल पर सबकी रेसिपी  मिल जाती है। मास्टर शेफ बन गई हूँ मैं!"
"अच्छा? तो थिंचौणी खिला दे। "
"थिंचौणी? ये क्या है? "
"मैंने कहा था न। रहने दे।  "
" तू रहने दे। मज़ाक सूझ रहा है!"
"नहीं। सच में। थिंचौणी ही खाने का मन कर रहा है। पहाड़ की डिश है, गूगल पे नहीं मिलेगी। "
स्वाति ने लम्बी साँस  ली।  थिंचौणी मज़ाक नहीं, हकीकत थी !
"तो तू रेसिपी बता दे मैं कोशिश करूंगी बनाने की। "
"नहीं यार, माँ के हाथ की। बस माँ के हाथ की। एक बार खा लूँ , तृप्त हो जाऊँगी। "
"और कैसे मिलेगी वो एक बार? न आंटी यहाँ आ सकती है न तू वहाँ जा सकती है !"
"वही तो। " नीतू काफी उदास थी।
"चल अब मुँह मत लटका। ये खुश रहने का वक़्त है। जो यहाँ मिलता हो उसी में खुश रह। देख समोसा भी आ गया !"

दोनों भुक्खड़ों की तरह समोसों पर टूट पड़े।

शाम को मम्मीजी ने बेटे बहू का डब्बा खोला।  अजय का खाली था, और नीतू का बचा हुआ।  कुछ दिनों से यही सिलसिला चल रहा था। नीतू का टेस्ट बदल रहा था। कुक का बनाया कुछ अच्छा नहीं लगता था। एकाध बार मम्मीजी ने खुद सब्जी बनाके भेजी तो डब्बा थोड़बहुत  खाली आया था। पर वो पहले वाली बात नहीं रही थी जब नीतू जो भी मिल जाए चाट पोंछके ख़त्म करती थी। कोई नखरे नहीं हुआ करते थे उसके खाने के मामले में, बिलकुल अजय की तरह।
और अब तो हर दिन ये टेंशन रहता था कि क्या बनवाएं जो डब्बा खाली आये।  आखिर प्रेग्नेंट थी नीतू, उसकी भूख और सेहत का ध्यान तो रखना था।

अगले दिन नीतू सुबह जल्दी उठी। एक तरफ चाय चढ़ाई और एक तरफ आलू  मटर की  सब्जी। माँ के हाथ का नहीं तो कमसे कम अपने हाथ का खाना मिल जाए, पेट तो भरे। मम्मीजी देख रही थीं। उसके ऑफिस निकलने के बाद उन्होंने वो सब्जी चखी, शायद देखने के लिए कि नीतू की पसंद कैसी है।  सब्जी में रस ज्यादा था, और मिर्ची भी। लाल और हरी दोनों डाली हुई थीं! तो ये राज़ था नीतू के टेस्ट का?

उन्हें समझ आ गया था।  सास के साथ वो एक माँ भी थीं। कभी इस दौर से वो भी गुजरी थीं।  पर तब तो पहली डिलीवरी मायके में होती थी, माँ के हाथ का खाना वैसे ही मिल जाता था। और दूसरा बच्चा होने तक बहू ससुराल की नब्ज़ पकड़ लेती थी , अपने घर जैसी सहज हो जाती थी।
यूँ तो अब भी पहली डिलीवरी मायके में ही होती थी, पर बहू का मायका था ही ऐसी जगह पहाड़ों  में, जहाँ आधुनिक सुविधा वाले अस्पताल दूर दूर तक नहीं मिलते थे।  ऐसे में कोई रिस्क कैसे ले सकते थे? इसलिए वही अपने पति को छोड़  शहर  आ गयी थीं बेटे बहू के पास।

आजकल की लडकियाँ यूँ तो शादी के बाद काफी सहज रहती थीं पर नीतू चाहकर भी अपनी बदली हुई पसंद घर पर जाहिर नहीं कर पा रही थी। ऐसा खाना वो लोग खा भी तो नहीं पाते।  अब नीतू ने सोच लिया था , कभी कभार खुद ही जल्दी उठकर सब्जी बना दिया करेगी। बाकी दिन कैंटीन के समोसे या चाउमीन तो है ही।

*

मिसेस रावत पिछले कुछ दिनों से परेशान सी लग रही थीं।  उनकी ये ख़ास बात थी कि मन में जो चल रहा होता था चेहरे पर दिख ही जाता था, कितना भी छिपाने की कोशिश करें। और इस बार भी उनकी बहू ने मन की बात पढ़ ली थी।
" क्या बात है माँजी ? तबियत ठीक है?"
"हाँ बेटा तबियत तो ठीक है। "
'फिर?'
मिसेस रावत कुछ देर सोचीं, फिर बोलीं।
"जब से नीतू की खबर मिली है, थोड़ी चिंता लगी रहती है। '
"चिंता की क्या बात है? उसकी सास तो आ गयी हैं साथ में। पूरा ध्यान रखती होंगी। "
"नहीं बेटा वो बात नहीं। "
"फिर?"
कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कही नहीं जा सकतीं। उन्हें समझना पड़ता है।  और ये काम सिर्फ माँ कर सकती है। "
"पर हमने तो बोला था उसको यहाँ आ जाने के लिए। वही लोग डर रहे हैं।  कभी पहाड़ से पाला नहीं पड़ा है न उनका। "
"हम्म। "
"पर आप परेशान क्यों हो रही हैं? कुछ कहा उसने फ़ोन पे? सास के साथ एडजस्ट करने में कुछ दिक्कत? "
"ना ना एडजस्ट तो मेरी बेटी कहीं भी कर लेती है। उसकी मुझे चिंता नहीं।"
"फिर ?"
"कुछ नहीं बेटा ऐसे ही। " उन्होंने टाल दिया।
पर मन से वो सवाल नहीं जाता था। कुछ दिन पहले नीतू ने फ़ोन पर 'गुड न्यूज़' दी थी। बहुत खुश हुई थीं वो, और पहली बात मुँह से यही निकली थी, घर कब आ रही है? फिर याद आया कि ये तो गलत प्रश्न था।  कोई शहर की सुविधाओं को छोड़कर पहाड़ थोड़ी लौटेगा डिलीवरी करवाने। और नीतू ने भी वही जवाब दिया था, डिलीवरी वहीं होगी। सासूमाँ आ जाएंगी उसका ध्यान रखने के लिए।  अब माँ की ज़रुरत किसको थी।
पर उसके बाद से नीतू का फ़ोन अक्सर आ जाता। और हर बार वो पूछती कि क्या बन रहा है खाने में। बहुत कैज़ुअली पूछती थी , पर माँ का दिल समझ जाता था कि बेटी को माँ के हाथ का खाना खाने का मन है। शुरू शुरू में तो बड़े चाव से बताती थीं कि आज कढ़ी है तो आज राजमा है तो आज थिंचौणी, पर फिर समझ गयीं कि फ़ोन के दूसरी तरफ उनकी बेटी की आँखें भर आई हैं, बात इतनी कैज़ुअल नहीं है।  उनका मन करता कि बस कहीं से पंख मिल जाते और वो उड़ जाती, पहुँच जाती अपनी बेटी के पास, जी भर के खिलाती अपने हाथ का खाना। पर बात फिर वहीं अटक जाती।  काश। 

*

स्वाति का मैसेज था। " समोसा?"
"नहीं, आज सिर्फ चाय !" नीतू ने रिप्लाई किया।  आज पसंद की सब्जी खायी थी पेट भर के।

चाय पर मिली तो काफी खुश लग रही थी नीतू।
" तुझे हँसी आ रही होगी न मुझे देखके? हर वक़्त खाने की ही बातें।  देश दुनिया की कोई परवाह ही नहीं !"नीतू चहकते हुए बोली।
" नहीं यार मैं समझ सकती हूँ। भूखे भजन न होय गोपाला!"
"हाहा !"
"और वैसे भी पहले हम कौन सी देश दुनिया की बातें कर लेते थे? वही कामवालियों की झिकझिक, इसको छुट्टी चाहिए उसको एडवांस ! हम लोग अफोर्ड थोड़ी कर सकते हैं इन सबसे ऊपर उठना। "
" हाहा! ये भी सही है। "
"आज अच्छी लग रही है। रोज टाइम निकालके अपनी सब्जी बना दिया कर। "
"देखती हूँ। मम्मीजी तो खराब तो नहीं लगेगा? कहीं वो कुक की छुट्टी करवाके खुद खाना बनाने न बैठ जाएँ !"
"उनके हाथ का भी तो बहुत टेस्टी होता है।  तूने ही बताया था। "
" हाँ पर इतनी सुबह उठेंगी वो भी ठण्ड में। जोड़ों में दर्द की शिकायत रहती है उनको। "
"ओह्हो। "
"और सच तो ये है कि अभी कोई मास्टरशेफ भी आके खिला दे तो भी याद माँ के हाथ के खाने की ही आएगी।  लार उसी के लिए टपकेगी। "
"हाँ मेरा भी वही हाल था अनीश के टाइम। लकिली मेरी माँ आके रही थीं साथ में। खूब बना बनाके खिलाया। "
"सच में लकी थी यार तू। "
"अरे ये क्या? चाय में मक्खी !"
" समीर!" नीतू ने  आवाज दी तो मैनेजर दौड़ा चला आया।  तुरंत एक आलसी स्टाफ को डाँट  के चाय बदलवाई।
"सॉरी मैडम। आगे से शिकायत का मौका नहीं मिलेगा। " कहकर समीर वापस काउंटर पर चला गया।
नीतू उसे जाते हुए देख रही थी। "पता नहीं इतने कामचोर लड़के रखे क्यों हैं इसने। खुद आधा काम करना पड़ता है। " समीर की कैटरिंग एजेंसी को यहाँ का कॉन्ट्रैक्ट दो महीने पहले ही मिला था। बाकी का स्टाफ ठीक था बस एक लड़का जीता जागता आलस की मूर्ति लगता था। पीक आवर्स में भी उसकी चाल हथिनी सी रहती थी। कभी प्लेट गन्दी मिले या खाने में मक्खी मिले तो सबका शक पहले उसी पर जाता था।

"खैर, तूने बताई नहीं चिंचौणी की रेसिपी ?"
"चिंचौणी नहीं थिंचौणी। "

*

फ़ोन बज रहा था।  नीतू का कॉल था।

"हाँ बेटा। कैसे हो?"
"बढ़िया। "
"अच्छे से खाना खा रही हो न? सही खुराक बहुत ज़रूरी है आजकल। " नीतू की दुखती रग पर हाथ रख दिया था माँ ने।
"हाँ खा तो रही हूँ। और आज क्या बन रहा है आपके किचन में ?"
माँ ने थोड़ा सोचा। बन तो थिंचौणी रही थी। 
"आज वही पुरानी अरहर की दाल। "
"यक्क ! उस दाल से तो मुझे उलटी आने लगती है आजकल। बंद करवा रखी है अपने लिए। "
"हाँ बेटा पर  यहाँ  आजकल  तुम्हारे पापा और भैया भाभी सबका कुछ कुछ  परहेज चल रहा है। ज्यादा मिर्च मसाले को मना कर दिए हैं डॉक्टर। खट्टा भी नहीं खाना तो कढ़ी भी बंद।  थाइरोइड के चक्कर में मूली से परहेज ! अब तो बस पीली दाल बची खाने के लिए !"
"ओह्हो! " पता नहीं क्यों ये सुनकर नीतू को एक सुकून सा मिला।   मतलब वो  कुछ मिस नहीं कर रही थी। मायके जाने से भी वही पीली दाल खाने को मिलती। 
माँ ने झूठ बोल तो दिया पर उस दिन एक निवाला उनके गले से नहीं उतरा।

*

समीर का पूरा दिन यूँ  तो आर्डर लेने या स्टाफ को डाँटने डपटने में निकल जाता था पर कभी कभार वो खुद के लिए वक़्त निकाल लेता था।  मोबाइल में गेम्स वगैरह खेल लेता था, गाने सुन लेता था । नीतू मैडम लोग जब चाय के लिए आते थे तो कैंटीन लगभग खाली रहती थी। बैठे बैठे उन लोगों की गप्पें उसके कानों में पड़ती रहती थीं। और उस दिन जब स्वाति ने नीतू को जोर से डाँटा तो उसके कानों तक आवाज पहुंची थी।

"पूरा डब्बा छोड़ दिया तूने? "
"नहीं खाया जा रहा था यार।  उलटी आ जाती। "
"अरे पर इतनी देर खाली पेट रहना, इस हालत में ! ये ठीक नहीं है नीतू। कुछ तो करना पड़ेगा।  ये कैंटीन के समोसे लंच की जगह नहीं ले सकते। पता नहीं कैसा तेल यूज़ करते होंगे। कितनी पुरानी सब्ज़ियाँ रहती होंगी। ये सब एक लिमिट में ही खाना है , समझी। ये लंच  को रिप्लेस  नहीं कर सकते।"

ऐसी हालत? किस हालत की बात कर रही है स्वाति मैडम ? तो क्या नीतू मैडम प्रेग्नेंट हैं?
एक अजीब सी सिहरन उठी थी समीर के अंदर।  उसके ऊपर एक प्रेग्नेंट महिला की जिम्मेदारी थी। उसे अपने खाने की क्वालिटी को उनके हिसाब से उच्च स्तर का रखना था।  कितना भरोसा करके आती होंगी नीतू मैडम उसकी कैंटीन।  कहीं यहाँ  के खाने से किसी दिन उनकी तबियत न गड़बड़ा जाय।  हे भगवान, ये कैसी जिम्मेदारी उसके कंधे पर डाल दी थी।
उसके बाद से समीर को जाने क्या हुआ, उन दोनों  का आर्डर वो खुद प्लेट में सर्व करता। हर चीज़ को पैनी निगाह से चेक कर लेता कि कहीं कोई गन्दगी तो नहीं है। काउंटर से टेबल तक प्लेट खुद ग्राहक को ले जानी होती थी। उससे पहले वो सब भलीभांति देख लेता। नीतू का उसकी कैंटीन में आना उसके लिए गर्व की बात हो गयी थी।  वो उन्हें बिलकुल शिकायत का मौका नहीं दे सकता था।
बीच में एक हफ्ता उसकी तबियत खराब थी तो छुट्टी लेने से पहले उसने अपने स्टाफ को अच्छे से समझाया। सबसे सीनियर लड़के को मैनेजर का जिम्मा भी दिया। उसको समझाया कि आलसी  मोनू को काबू में रखे।

*

"अजीब बात है। " नीतू आज समोसा खाते हुए दार्शनिक मूड में थी।
"क्या?"
"इस दुनिया में हर इंसान को खुश रखने लायक ख़ुशी बिखरी पड़ी है।  बस क्रॉस कनेक्शन हो जाता है, किसी को किसी की ख़ुशी मिल जाती है और वो उसकी कदर नहीं कर पाता। "
"कैसे ?"
"मेरी माँ अगर मेरे साथ होती तो वो भी खुश होतीं और मैं भी।  वो वहाँ हैं जहाँ उनकी पाक कला का कोई मोल नहीं।  मेरी सास भी बहुत स्वादिष्ट खाना बनाती हैं पर वो मेरे साथ हैं जिसके लिए उनके हाथ के खाने का मोल नहीं। सब कुछ उल्टापुल्टा नहीं है ?"
"है पर थोड़े समय के लिए। कुछ महीनों बाद सब नार्मल हो जायेगा। इतना फलसफा मत झाड़। "
"जो भी हो, पर एक बात तो है। "
"क्या ?"
"माँ की कदर माँ बनने पर ही होती है!"
" हाहा ! सही बात है। "

समोसे आ गए थे , और साथ में खाली प्लेट इन्हें शेयर करने के लिए। नीतू ने गौर से देखा तो उसमें जूठन लगी थी। उसने स्वाति को दिखाया। आज समीर भी नहीं था जिससे शिकायत कर सकते। दोनों चुपचाप उठकर चले गए।


*

शाम को घर लौटते हुए नीतू ने थोड़ी सी मूली खरीदी।  सुबह जल्दी उठकर  सिल बट्टे में उसको कूटा। दिमाग पे बहुत ज़ोर डालके माँ के हाथ की थिंचौणी याद करने की कोशिश की और उसी हिसाब से थिंचौणी बनाकर डब्बे में पैक कर दी। 
दोपहर को जब उसने चावल के साथ थिंचौणी खायी तो उसकी ख़ुशी की सीमा नहीं थी। वही मम्मी के हाथ का स्वाद भरा था उसमें। आज उसे तृप्ति मिल गयी थी। थिंचौणी नामक हव्वे पर उसने काबू पा लिया था। 

एक हफ्ते  बाद समीर जब काम पर लौटा तो हवा में एक अजीब सी खामोशी थी। समीर चार बजने का इंतज़ार कर कर रहा था जब उसकी मैडम लोग चाय पीने आतीं। पर आज चार से पाँच बज गए वो लोग नहीं आये। अगले दिन भी ऐसा हुआ।  समीर परेशान था, उसने काउंटर क्लर्क  सुधीर से पूछा तो पता चला कि आलसी मोनू ने गन्दी प्लेट परोस दी थी और वो लोग बिना कुछ कहे चले गए थे।  फिर लौटकर नहीं आये।  

"हमें तो इस बात का डर है साब कि कहीं उन्होंने हमारी शिकायत न कर दी हो ।" सुधीर ने अपनी बात ख़त्म की। 
"नहीं सुधीर , वो ऐसा नहीं करेंगी। पर.." 
"पर क्या ?"
बहुत बुरा हुआ सुधीर, बहुत बुरा हुआ। " बस इतना ही कह पाया समीर। 

शाम को घर आकर समीर ने बीवी सरिता के सामने ऐलान किया। 

"तुम्हारा भाई मोनू अब हमारे साथ नहीं रह सकता।  घर भेज दो उसको। "
"ऐसा कैसे ? " बीवी ने सवाल किया। 
"उसके कारण मेरा नाम खराब हो रहा है।  जिस काम में हाथ डालता है गन्दगी मचा देता है। कुछ सीखने का नाम नहीं लेता। बहुत मौका दे दिया उसको अब और नहीं। ग्राहकों को साफ़ सुथरा खाना चाहिए वरना वो लौटके नहीं आएंगे। "
" छोड़िये न बच्चा ही तो है। ज्यादा हो तो बिठाके रखिये उसे।  आप भूल रहे हैं मेरे चाचा की बदौलत आपको ये काम मिला है। "
" नहीं ये मेरा आखिरी फैसला है।  मोनू को घर भेजो। मेरे यहॉं उसके लिए जगह नहीं। बिज़नेस में रिश्तेदारी नहीं चलती। "

ये कदम समीर बहुत पहले से लेना चाहता था  पर रिश्तेदारी के कारण रुक जाता था।  पर अब जब उसकी प्रेग्नेंट मैडम नाराज़ होकर लौट गयी थीं तो उससे बर्दाश्त नहीं हुआ। हर धंधे का कुछ ईमान होता था, आज उसके ईमान को चोट पहुंची थी।   इस बात की सज़ा तो मोनू को मिलनी ही थी। हाँ सरिता ज़रूर उससे रूठ गयी थी , और उसे मनाने का उपाय समीर के पास फिलहाल नहीं था।

और अब अगला काम था मैडम लोगों को वापस लाना।  एक दिन उसने सुधीर को चाय पहुँचाने के बहाने नीतू के डिपार्टमेंट भेजा। सुधीर ने मैडम को ढूँढ निकाला और मोनू को भगाने वाली बात बतायी।

उसके जाने के बाद नीतू ने स्वाति को कॉल किया।
"वो हथिनी की चाल वाला लड़का भाग गया। "
"अच्छा! चल फिर समोसा हो जाय ?"
"बिलकुल!"

*
अगले दिन जब नीतू ने डब्बा खोला तो उसमें आलू मटर की तीखी और रस वाली सब्जी रखी थी। नीतू समझ गयी कि सासूमाँ ने बनायी होगी। उसके होंठों पर हलकी सी मुस्कान तैर गयी। तो क्या हुआ अगर माँ के हाथ का खाना नहीं मिला, उनके जैसा प्यार तो मिला। बस ऐसा ही चलता रहे।

दिन बीतते रहे।  आखिर के दिनों में स्वाति का ट्रांसफर दूसरे विभाग में हो गया जो काफी दूर था।  पर नीतू अकेली ही कैंटीन आती।  समीर उसकी टेबल तक चाय समोसा भिजवाता। फिर कभी नीतू को शिकायत का मौका नहीं मिला।

और फिर नीतू ने भी आना बंद कर दिया। मैटरनिटी लीव पर चली गयी। समीर का वो ग्राहक जिसके कारण उसने अपनी बीवी से बैर मोल ले लिया था, अब चला गया था, लम्बे वक़्त के लिए। धीरे धीरे वो भी सब भूलकर काम में मशगूल हो गया।
 पर काउंटर पर बैठे बैठे  उन दोनों की बातें सुनने से समीर को  एक बात
 जानने को मिली, जो शायद वो खुद कभी न जान पाता। बेटी  कोई भी हो, चाहे पढ़ लिखकर अफसर बन गयी हो या गृहणी, कुछ बातों में वे भीतर से एक जैसी होती हैं। माँ की याद सबको आती है।   प्रेगनेंसी में चटोरी सब हो जाती हैं। 

*

नीतू ने ड्यू डेट से एकाध हफ्ते पहले छुट्टी ले ली। अब वक़्त था आराम करने का , जीवन में शुरू होने जा रहे नए अध्याय का भरपूर आनंद लेने का।  अब नीतू अपनी पसंद का खाना बना पाती थी। मम्मीजी के साथ मिलकर कभी दही वड़े बनाती कभी भेल पूरी।

और फिर वो दिन भी आया जब ईश्वर ने उसकी  कोख में एक प्यारा सा बेटा दिया। नौ महीने के तमाम उतार चढ़ाव, नए नवेले अनुभव अब  जाकर अंजाम पर आये थे। सब लोग बहुत खुश थे। मम्मीजी फ़ोन पर अपनी सखियों को बताती नहीं  थकती थीं कि वो दादी बन गयी ! अजय दिन भर गोद में बच्चे को खिलाता रहता।

 एक दिन नीतू और अजय बच्चे को गोद में लिए बैठे थे तो नीतू ने उसे अपने मोबाइल में स्वाति को भेजे मैसेज दिखाए।
"उबली लौकी।  समोसा?"
"अझेल बैंगन।  समोसा ?"
"थकेला कद्दू।  समोसा?"
"यम्मी थिंचौणी! फाइनली! "

दोनों काफी देर तक पढ़ पढ़कर हँसते रहे। 

समीर को भी कुछ दिन बाद नीतू की खबर मिली।  बहुत खुश हुआ, उसके समोसे कसौटी पर खरे उतरे ! और भी एक बात पता चली, उसकी कैटरिंग एजेंसी इस कंपनी में ब्लैकलिस्ट होने से बाल बाल बची थी। एक भी शिकायत और ऊपर साहब तक पहुँचती तो वो एक्शन ले लेते। समीर मन ही मन नीतू मैडम का शुक्रिया अदा कर रहा था जिनके कारण उसने मोनू को भगाया और शिकायतें आनी बंद हुईं।
और अब जब वो उनके दायित्व से मुक्त था, अब वक़्त था अपनी रूठी हुई बीवी को मनाने का , जो उसे अच्छे से पता था कि कैसे करना है, मैडम लोगों की बातें सुन सुनकर। शाम को घर आकर समीर ने वो बात कही जिसे सुनने को सरिता के कान तरस गए थे।

" सामान पैक कर दो। कल तुम्हारी माँ के पास चल रहे हैं। "

सरिता को समझ नहीं आ रहा था कि पहले हैरान होना है या खुश।

*

घर आ गया था।   आर्यन का ख़ुशी का ठिकाना नहीं था। पूरे आँगन में दौड़ लगा रहा था। भाभी ने गरमागरम चाय पिलाई।  माँ वाकई बूढी हो चली थी, पर योग वगैरह करने से तबियत ठीक रहती थी। खाना अब भी वही बनाती थीं।
खाने की टेबल पर सब साथ में बैठे थे।  माँ ने बहुत प्यार से खाना बनाया था । मिर्च मसालेदार  थिंचौणी खासकर बनायी थी। नीतू ने एक निगाह सबकी प्लेट्स पर डाली। सबने वही खाना लिया था। पीली दाल नदारद थी।
"अरे आप हमारे कारण परहेज नहीं कर पा रहे! "
"परहेज?" भाभी हैरान थी, "यहाँ कौन परहेज करता है ? हम सब यही खाना खाते हैं। "
नीतू  और भाभी दोनों माँ की तरफ देख रही थी। माँ हौले से मुस्कुरा दीं। भाभी को पाँच साल पहले   उनकी कही बात याद हो आई।

"कुछ बातें ऐसी होती हैं जो कही नहीं जा सकतीं। उन्हें समझना पड़ता है।  और ये काम सिर्फ माँ कर सकती है। "



मंगलवार, 7 अप्रैल 2015

पिंजरे में मिश्रा



"क्या????"
"हाँ. ठीक ही सुना तुमने।"
"हाहाहा!"
"हँस लो, फिर बता देना। कल तक का टाइम है।"
"मतलब?"
"मतलब जब ये बात हजम हो जाए तो मेरे प्रपोजल का जवाब दे देना। कल सुबह से पहले।" 
"तुम्हारा प्रपोजल? मतलब उसको सीरियसली लेना है?" 
"हे भगवान! उठा ले मुझे। अभी के अभी।"
अरे नहीं नहीं भगवान काहे उठाएंगे, हम ही उठाएंगे। मतलब कोई बहुत धाँसू बन्दा आएगा तुम्हारी लाइफ में।"
"अच्छा? बन्दे को सामने से न्यौता दे रहे हैं तो उसे हजम नहीं हो रहा!"
"अरे हम थोडी कोई धाँसू बन्दे हैं! तुमको हो क्या गया है? रुको पानी मारते हैं तुम्हारे मुँह पर। शायद होश में जाओ।"
"रहने दो। चलते हैं। अब यही दिन देखना बाकी रह गया था कि लडकों को प्रपोज भी करो और उनके नखरे भी झेलो।"
"अरे अरे रुको तो! मुझे सच में हजम नहीं… अरे बाबा.."
लो, चली गयी! 
मिश्रा सोच रहा था, आज पहली अप्रैल तो नहीं? 
*
पूरी रात करवट बदलता रहा। रूमी शरद भी नोट कर रहा था, कुछ तो गडबड है। पर ये महाशय पहले खुद तो बात को हजम कर लेते तब तो किसी और को करवा पाते!
हम्म, तो कहाँ से हुई थी इस हसीन किस्से की शुरुआत! रोज की तरह एक आम दिन था। एक ऎसा दिन जो आमतौर पर कान खुजाते हुए उठने से शुरू होके बिस्तर पर धम्म से गिरके सो जाने पर खत्म हुआ करता था। पर आज सुबह सुबह जब नैना का मैसेज मिला "C u at 7pm Barista" तभी समझ गये थे कि कुछ तो बात है। ये कन्या उसकी प्रेमिका तो थी नहीं, बस औफिस के कलीग की बैचमेट हुआ करती थी कभी, तो इस अंजान शहर में इतनी सी जान पहचान भी अजनबियों के बीच अपनापन महसूस कराने के लिए काफी हुआ करती थी। और धीरे धीरे उनका एक अपना ग्रुप बन गया। - लोगों का। खूब मस्ती  चलती। वो लोग अक्सर शाम को  मूवीज देखते, घूमते फिरते, एक दूसरे की टाँग खिँचाई करते। पीजी में रहते थे तो लगता ही नहीं था कौलेज खत्म हो गया है और नौकरी चल रही है। पूरे शहर की खाक छान ली थी। प्यार हो गया था, शहर से, यारों से, और इनके साथ कदम मिलाती चलती जिंदगी से। 

पर ऎसा करते करते जब एक साल से ऊपर हो गया और खाक छानने लायक 10 किमी की परिधि में कुछ नहीं बचा तो उन्हें समझ आने लगा कि जिंदगी अब कुछ और चाहती है। ये चाहती है कि कुछ फैसले लिये जायें जो जिंदगी को ठहराव दें, भरोसा दें कि जिंदगी आगे भी यूँ ही हसीन रहेगी। वर्ना तो एक ही ढर्रे पर चलते हुए ये बदबू मारने लगी थी। 
और जिंदगी की इस उत्कंठा के सबूत थे मिश्रा के परिवार द्वारा  सुझाए वो सब प्रोफाइल्स जो मैट्रिमोनियल साइट्स पे बत्तीसी कुछ छुपाते कुछ दिखाते अपनी उपलब्धता की जानकारी दे रहे होते थे, वैसे ही जैसे परिवारवालों ने इधर इनकी उपलब्धता की जानकारी दी हुई थी। और जानकारी भी ऐसी कि मिश्रा खुद की प्रोफाइल देखकर पूछता ये कौन है! 
26/165/5'6" गौरवर्ण छरहरा उच्चकोटि कान्यकुब्ज ब्राह्मण प्रतिष्ठित परिवार इंजीनियर एमबीए MNC में कार्यरत वेतन छह अंकों में, हेतु सुयोग्य गोरी सुंदर स्लिम संस्कारी उच्चशिक्षित घरेलू / नौकरीपेशा कान्यकुब्ज ब्राह्मण वधू....
मिश्रा को शक होता कि घरवाले इस तरह के विज्ञापन देकर उसकी शादी इस जनम में कराना चाहते हैं कि नहीं। फिर मम्मी बताती कि बेटा ये तो छुपे हुए कान्यकुब्ज ब्राह्मणों को देश के कोने कोने से ढूँढकर निकालने के लिये है। एक बार सब औप्शन पता चलें तो फिर ऎलिमिनेशन राउंड, फिर चुनी हुई लडकियों को एक एक करके देखने जाना, फिर उन्हें घटते गोरेपन के अनुसार अरेंज करके सबसे गोरी के घर जाके बात पक्की करना, बस! हो गयी तेरा शादी! अब हम इतना भी नहीं करेंगे अपने सौरभ  के लिए? (सौरभ मतलब मिश्रा )
तो सबकुछ प्लान के अनुरूप चल रहा था। एलिमिनेशन राउंड के बाद तीन चार बढिया प्रोफाइल्स बचे थे जिनमें से अक्कड बक्कड करके एक को चुनना था। सब एक से बढकर एक गोरी और सुंदर। सब जौब भी करती थीं। पर हाँ कोई मिश्रा  के शहर में नहीं थी, सबको विस्थापित होना पडता। खैर वो कोई बडा मुद्दा भी नहीं था। गोरी सुंदर कान्यकुब्ज कन्या का आना लगभग तय था।
और फिर मिश्रा की जिंदगी में एक शाम बरिस्ता में कुछ यूँ हुआ।।
"क्या लोगी?"
"तुम बताओ।"
"बाकी लोग को नहीं बुलाई?"
"तुमसे कुछ बात करनी थी। तो तुमको बुलाया।"
"अच्छा! क्या बात है, हमसे बात करनी है, अकेले में। खीखीखी! "
"मुझसे शादी करोगे?"
"क्या???"
*
नैना की दिमागी हालत कुछ दिनों से ठीक नहीं चल रही थी ये बात तो मिश्रा जानता था, पर बात यहाँ तक पहुँच जाएगी कि वो उसको प्रपोज कर देगी? उसको? बात कुछ और थी। और मिश्रा को पता लगाना था। तो जब रूममेट सो गया तो मिश्रा ने लैपटाप खोला और एक एक्सेलशीट  बनाई, केस स्टडी नाम से।
प्रपोज करने के संभावित कारण: 
1: परिवार द्वारा लाये गये गुजरे रिश्तों से बेहतर की चाह
2: अच्छे रिश्तों के लिये पर्याप्त दहेजराशि का अभाव
3: सौरभ से सच्चा प्यार 

बस इतने ही संभावित कारण सूझ रहे थे उसको। उनमें से भी तीसरा वाला तो पढके उसे खुद हँसी गयी थी। वो लोग ज्यादातर ग्रुप में ही रहते  थे, पर हाँ उनकी बनती खूब थी। दोनों मिलके बाकियों की खूब खिँचाई करते थे। क्यूट सा माहौल रहता था। और दोनों का ह्यूमर लेवल गजब का था। उनकी बातचीत को कहीं अक्षरश: लिख दिया जाय तो बैस्टसैलिंग नौवल तैयार हो जाय। 
पर ये तो कोई कारण नहीं हो सकता प्यार व्यार के लिये! उसको तो हमेशा से पता था कि इत्तेफाक से किसी सजातीय गोरी सुंदर कन्या का उससे टकरा जाने के अलावा उसकी जिंदगी में लव शव का कोई स्कोप नहीं था। करना उसको मम्मी पापा के हिसाब से ही था। उनके कानपुर में तो ये बहुत बडी प्रतिष्ठा वाली बात होती थी। बडे भय्या ने भी उनका मान रखा था। फक्र से सर उठाकर चलते थे उसके मम्मी पापा। और वो भी तो कितनी इज्जत करता, कितना प्यार करता था उनसे। इतनी अच्छी परवरिश की थी उन्होंने उसकी। 
तो ऎसे में इस अचानक से मिले प्रपोजल का क्या किया जाय! ये तो बडी दुविधा की स्थिति बन गयी थी। हाँ अभी कर नहीं सकता था, चाहकर भी कुछ भी हो, उनकी दोस्ती तो दाँव पर लग चुकी थी। अब वो हँसते-खेलते, टाँग खीँचने वाले दिन खत्म हो चुके थे। एक मासूम रिश्ता अपने ख़त्म होने की तारीख बता गया था। आज वो बहुत दुखी था। किसी लडकी द्वारा सामने प्रपोज किये जाने का कोई आनन्द, कोई अभिमान नहीं। बहुत देर तक आँखें खोलकर लेटा रहा, करवट बदलता रहा। 
 अगले दिन उसने मोबाइल ही स्विच ऑफ कर दिया।  खुद को छिपाने की चाह में।
पूरे दिन मोबाइल बंद रहने से ऑफिस के भी कई ज़रूरी काम अटक गए, पर कोई और चारा भी नहीं था। किसी भी हालत में आज नैना का सामना नहीं कर सकता था। वैसे उसने सिर्फ सुबह तक की ही मोहलत दी थी।  ऐसा क्यों ? इतना कम वक़्त। कहीं जा तो नहीं रही थी वो ? पता करे तो कैसे ?
शाम को मोबाइल चालू किया तो तुरंत मम्मी का फ़ोन आया। दिन भर में काफी बार ट्राई किया था शायद, चिंतित लग रही थीं।
"खैर, अब से एक  चार्जर बैग में रखे रहना। "
"जी मम्मी। "
"और टिकट बुक कर लिया?"
"जी?"
"अरे? यहां आना है ? लड़की फाइनल करनी है कि नहीं? "
"ओह, हाँ। करता हूँ मम्मी। "
"जल्दी कर लेना, कोई और लड़का हमसे पहले आके रोका कर जाए। अच्छे घर की हैं सब, वैसे ही लाइन लगी होगी। " मम्मी वैसे ही चिंतित थी जैसे बिग बाजार में २६ जनवरी को लगने वाली सेल से पहले होती थीं।
फ़ोन रखने के बाद मिश्रा देर तक पंखे को निहारता रहा।  उसका इकलौता फ्लैटमेट शरद  कल रात से उसको नोटिस कर रहा था। समझ रहा था कुछ बात तो है।
"उषा लेक्सस  का है। "
"क्या?"
"पंखा, और क्या। "
"हाहाअरे नहीं यार, ऐसे ही पड़ा हूँ, मम्मी बुला रही कानपुर। वही सब सोच रहा।  "
" अच्छा, तो हो आओ कानपुर  कर आओ कोई कन्या बुक। "
"साला तू भी। "
" और क्या , जो है सो है। "
"तेरे घरवाले सही हैं , मालती को अपना लिए आराम से। "
"इतने आराम से भी नहीं अपनाये जितना तुझे लग रहा! पर तू काहे ये सब सोच रहा है, तेरी तो कोई बंदी नहीं ?"
"होने से भी क्या होता ! "
"अगर होती , तो कुछ कुछ ज़रूर होता। अब चल, खाने का जुगाड़ करते हैं।  कल टिकट कर लेना। "
अगर होती तो कुछ कुछ हो जाता। मिश्रा के कानों में ये बात गूँज रही थी।
*
दो तीन दिन बाद शरद से पता चला कि नैना लौट चुकी थी   ये भी पता चला कि जिस काम के लिए गयी थी वो हो गया।
मिश्रा हँस  रहा था। यही तो था , उनकी किस्मत में। इधर नैना की बात पक्की, उधर मिश्रा के कानपुर जाने भर की देर।  और हँसी  की बात ये थी कि ये देर जो कानपुर जाने की हो रही थी, बस वही एक चीज थी जो किस्मत के नहीं, मिश्रा के हाथों हो रही थी। रोज़ टिकट बुक करने बैठता, सीट घटते देखता , सीट शून्य होते देखता, और तब बुकिंग  शुरू करता जब वेटिंग शुरू हो जाती   किस्मत को बस इतना करना था कि उस वेटिंग वाली टिकट को कन्फर्म करना था।
और किस्मत ने ये बदस्तूर किया।  शुक्रवार सुबह करायी टिकट शाम तक कन्फर्म हो गयी। अब मिश्रा को सुकून था कि जो हुआ उसमें उसकी गलती नहीं है, ये तो किस्मत में लिखा था!
शनिवार शाम को मिश्रा कानपुर के लिए निकल गया।  छह बजे की ट्रेन थी। ऑफिस से दौड़ा भागा  स्टेशन पहुंचा था।
*
मालती की ज़िन्दगी में पिछले हफ्ते कुछ अजीब सी चीज हुई थी, पर वो किसी को बता नहीं पा रही थी, अपने बैस्ट फ्रेंड और मंगेतर शरद को भी नहीं  और आज शाम तो हद ही हो गयी।  मिश्रा का फ़ोन आया था, बताने के लिए कि निकल रहा है फाइनली। ऐसा लगता था जैसे मालती को नहीं खुद को बता रहा हो कि अब ये फाइनल है। इस पूरे हफ्ते मालती से टच में रहा, और बात घुमाफिराके नैना पर रुक जाती। फिर भले ही मिश्रा के पास कुछ नया होता पूछने के लिए मालती के पास कुछ नया होता बताने के लिए! और होता भी कैसे, नैना कुछ बोलती तब न। जब से घर से आई थी, थोड़ा अवॉयड ही कर रही थी ग्रुप को। पता नहीं सच में बिजी थी या बहाना कर रही थी।  पर आज जब उसने मालती को मिश्रा से बात करते सुना तो काम छोड़कर मालती के पास आई।
"निकल गया मिश्रा? "
"हाँ। अब तक तो ट्रेन चल दी होगी। "
"हम्म। फाइनली!"
"हाहा ! हाँ।"
नैना अपने रूम में चली गयी। एक अजीब सी चुप्पी थी जो अब चुभने लगी थी।
पर अब और नहीं, कानपुर की ट्रेन छूट चुकी थी। इंजन के उठते शोर की तरह नैना की खामोशी भी अब सिसकियों के रस्ते निकल चली थी। मालती हैरान परेशान उसके रूम में गयी तो नैना उससे लिपटकर देर तक रोती रही।  शायद ट्रेन के छूटने का ही इंतज़ार कर रही थी नैना।
और तब मालती को पता चला कि नैना की कोई बात वात पक्की नहीं हुई थी। वो यहां से सोचके ही निकली थी कि लड़के को रिजेक्ट कर देगी। और वही उसने किया था।  बहुत नाराज़  थी उसकी माँ , इससे अच्छा रिश्ता  अपने समाज से लाना उनके बस का नहीं था।  पापा के गुजरने के बाद जैसे तैसे बच्चों को बड़ा किया था। नैना बहुत ही काबिल लड़की थी और इस तरह अनजान इंसान से सिर्फ अपने समाज की खातिर शादी करना ये बात उसे हजम नहीं हुई थी।  और हाँ, मिश्रा उसे पसंद था, और उसने एक बार अपनी किस्मत खुद लिखने की कोशिश की थी।  पर फिर मिश्रा के रिस्पांस से समझ गया  था कि हर कोई अपने अपने पिंजरे में कैद था, बस फर्क इतना था कि मिश्रा का पिंजरा थोड़ा ज्यादा सुनहरा था।
"पर तूने झूठ क्यों बोला? "
"मिश्रा को और दुविधा में नहीं डालना था।"
मालती से ये सब बर्दाश्त नहीं हो रहा था। उनके अच्छे खासे ग्रुप की क्या दुर्दशा हो गयी थी ! तो क्या अब सब ख़त्म हो जायेगा ? मालती और शरद  एक तरफ, मिश्रा एक तरफ , नैना एक तरफ। और बीच में एक बात जो कभी बन नहीं पायी।  क्यों किया मिश्रा ने ऐसा? क्या कमी थी नैना में, बस गोरी ही तो थोड़ी कम थी उससे, और उसके जैसी उच्चकोटि ब्राह्मण नहीं थी ! बाकी सब गुण  ऐसे थे  कि मिश्रा की ज़िन्दगी संवार देती। कितने खुश रहते सब मिलके।
मालती से ये बोझ अकेले नहीं सहा जाता था।  उसने शरद को  कॉल किया। शरद भी हैरान था।
पर जो सच था, उसे बदला नहीं जा सकता था।  मिश्रा निकल चुका था, और नैना ने उसे जाने दिया था, अपना सच छुपाकर।  वो सच जिसे पता करने के लिए मिश्रा रोज़ टिकट बुक होते देखता था , हाथ से निकलते देखता था। पर अब जब वो निकल चुका था , क्या अब भी वक़्त था? क्या अब भी वो लौट आता अगर नैना का सच उसे बताया जाता ?
शरद ने फ़ोन लगाया, पर अफ़सोस, मिश्रा नेटवर्क से बाहर जा चुका था।
*
उस शाम मालती ने खुद से एक वादा किया, नैना की ज़िन्दगी बर्बाद नहीं होने देगी।  मिश्रा नहीं तो और सही,  और नहीं  तो और सही। उसके और शरद  के फ्रेंड सर्किल में बहुत लोग थे जो इन सब बातों को नहीं मानते थे। पहले नैना को इस हालत से बाहर निकालना था और फिर किसी तरह इन लड़कों से उसकी 'इत्तेफ़ाकन' मुलाकातें करवानी थीं।  मिश्रा को उसकी गलती का एहसास दिलाना था। नैना जैसी प्यारी लड़की को ठुकराने की गलती।  और ये कोई मुश्किल काम नहीं था, सच तो यही था कि नैना को कोई भी दो तीन मुलाकातों में पसंद कर सकता था, सिवाय उनके जो अपनी ख़ुशी से  पिंजरे में कैद थे।
इस काम में शरद भी उसका साथ देने को तैयार हो गया। अब वो दोनों 'मैच मेकर ' बनने जा रहे थे। ख़ुशी भी थी, और थोड़ा दुःख भी। रही सही कसर  मिश्रा ने कानपुर से लौटकर ये बताके पूरी कर ली कि बंदी फाइनल हो गयी है।  आलम ये था कि किसी ने उससे पार्टी भी  नहीं मांगी!
*
 नैना को नार्मल करने में मालती को एक दिन लगा।  कुछ किताबें खरीदके उसको गिफ्ट करने की देर थी।  और इस हफ्ते शरद को उसे किसी अच्छे प्रोस्पेक्टिव लड़के से मिलाना था।
और जब शरद ने मालती को अपने प्लान के बारे में बताया तो पहले तो उसे विश्वास नहीं हुआ।
"मिश्रा ने लड़की फाइनल कर ली, ट्रीट दे रहा है , और तुम चाहते हो कि मैं नैना को भी अपने साथ लाऊँ !! पगला गए हो ??"
"नहीं। तुमने पूरी बात नहीं सुनी। "
" हम्म। "
"उस दिन एक एलिजिबल बन्दा भी आएगा हमारे साथ।  नैना भी रहेगी तो वहीं के वहीं इंट्रोड्यूस करा देंगे। चल पड़ी तो मिश्रा की शकल देखने लायक होगी !"
" अरे वाह ! सही प्लान है ! एक तीर से दो शिकार। "
" वही तो। इसलिए नैना को कैसे भी करके उधर लाना तुम्हारी जिम्मेदारी है। "
"किधर होगी वैसे?"
"बरिस्ता। "
"क्या?"
"हाँ। मिश्रा की चॉइस है , कुछ कर नहीं सकते।  पर नैना स्ट्रांग लड़की है , वो आएगी। जो लड़के को सामने से प्रोपोज़ कर सकती है वो वक़्त आने पर उसे नानी भी याद दिला सकती है। "
"हम्म।  मिश्रा के लिए इतना नेगेटिव होना अच्छा नहीं लग रहा , पर क्या करें। "
"जो कहा वही करो।  मिश्रा तुम्हें और नैना को कॉल करेगा इन्वाइट करने के लिए। तुम्हें बस आना है बाकी मैं संभाल लूँगा। "
"ठीक है। "
*
शरद सही कह रहा था। नैना वाकई में स्ट्रॉन्ग बंदी थी।  उसने मिश्रा की खबर सुनके सामने से ही ट्रीट मांग ली। मिश्रा खुश था कि सब नार्मल है, उसे गिल्टी फील करने की ज़रुरत नहीं।
और संडे को सब लोग तय समय पर बरिस्ता पहुंचे। शरद के साथ वाकई एक हैंडसम लड़का आया था। मालती के कलेजे को ठंडक मिली। अब वक़्त था सोने के पिंजरे में रह रहे लोगों को आइना दिखाने का।
हैंडसम लड़के पर से मालती की नज़र  नहीं हट रही थी ! लड़का थोड़ा झेंप गया। फिर उसका कोई कॉल गया तो दूर जाके बात करने लगा।  मालती का दिल डूब गया , कहीं इसकी कोई गर्लफ्रेंड तो नहीं !
शरद ने इशारे से मालती को दरवाजे के पास बुलाया। शायद अपना प्लान बताना चाह रहा था।
और इस तरह, बरिस्ता के उस कॉफ़ी हाउस मेंमिश्रा और नैना बैठे हुए थे , उसी टेबल पे , आमने सामने।
और शायद इसी पल का इंतज़ार कर रहा था मिश्रा , क्योंकि अब उसके हाथ में कुछ था। एक प्यारी सी अंगूठी।
"नैना, चिराग लेकर ढूंढने से भी तुम्हें मेरे जैसा गधा इंसान नहीं मिलेगा, जानती हो ?"
"क्या???"
"अब इस गधे की डोर  तुम्हारे हाथ में है। करोगी इस नालायक नामुराद नासमझ गधे से शादी ?"
नैना को कुछ समझ  नहीं रहा था।  सर घुमाके देखा तो बाकी लोग नदारद थे।
"वो सब बाहर हैं, मैंने भगाया हुआ है ! "
"पर हम लोग तो कानपुर वाली लड़की की  ट्रीट खाने यहां आये थे!!"
"तुम अपनी बात पक्की होने का झूठ बोल सकती हो, मैं नहीं बोल सकता ? मैं तो कानपुर गया ही तुम्हारी बात करने था। इतनी तारीफ़ करी तुम्हारी कि पूरा कोटा उधर ही ख़त्म हो गया ! "
"पर तुमको तो ये बताया  था कि मेरा रिश्ता पक्का हो गया है ? फिर? "
"फिर क्या ? हम तो तुम्हारा रिश्ता तुड़वाके तुमसे शादी करने का आशीर्वाद लेने गए थे , जिस रिश्ते से हमारी नैना खुश ही दिखें वो हम होने देते? वो तो अच्छा हुआ तुमने खुद ही इतनी मेहनत से बचा लिया !"
नैना  को कुछ तो समझ नहीं रहा था या विश्वास नहीं हो रहा था।  मिश्रा को क्या समझा था और वो क्या निकला!
कॉफ़ी शॉप के बाहर बाकी लोग हाथ बांधे और दिल थामे इंतज़ार कर रहे थे।  जाने आज ट्रीट मिलेगी भी या नहीं।
नैना ने इशारे से उनको अंदर बुला लिया।  उनकी मौजूदगी में मिश्रा ने सबत्तीसी अंगूठी नैना को पहना दी।
"ये तुम रो काहे रही हो मालती?  इसी को ख़ुशी के आंसू बोलते हैं मिश्रा? " शरद सर खुजा रहा था।